स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः निष्यन्दः २६७ (४) ‘सेयमेवंविधा भगवती संविद्देव्येव मन्त्रः ।’१ (५) ‘सर्वक्रोडीकारो स्थितत्वाद् देव्येव मन्त्रः ॥’२ (६) ‘चिदग्निसंहारमरीचिमन्त्रः संविद्विकल्पान् ग्लपयन्नुदेति’ ।३ (७) मन्त्राश्चिन्मरीचयः । (८) जब तक कि मन्त्र निर्मल नहीं हो जाते तब तक ये सिद्ध नहीं हो सकते— ‘यावन्न निर्मला मन्त्रास्तावत्सिद्धिः कथं भवेत्? (१६।४४ ने०तं०) । (९) पशुप्रमाताओं के लिए तो मन्त्र एक ‘करण’ है किन्तु आचार्य ‘कारण’ हैं—और शिवस्वरूप हैं— मन्त्राकरणरूपास्तु पशुकार्यस्य साधने । आचार्यः कारणं तत्र शिवरूपो यतः स्मृतः ॥ (ने०तं० १६।३।१६०) (१०) मन्त्रोदय होता कैसे है? इन्हें शिवात्मक क्यों कहते हैं? शिवशक्तिनियोगाच्च मन्त्राणामुदयः परः । सर्वत्रकलदा मन्त्रा यतस्तेऽतः शिवाः स्मृताः ॥ (ने०तं० १६।४६) (११) मन्त्र शक्ति का प्रभाव क्या है? अचिन्त्य है— यद्यत्प्रकुरुते ज्ञानी शिवशक्तिसमाश्रयात् । तत्तत्प्रसिद्ध्यते तस्य शिवशक्तिप्रभावतः ॥ (नेत्रतन्त्रः १६।७०) तस्य वै संमुखा मन्त्रा दृष्टप्रत्ययकारकाः । क्षणेन कुरुते सर्वं शिवः परमकारणम् ॥ (नेत्रतन्त्रः १६।७१) तं प्रबोध्येत यस्तु ज्ञानयोगबलान्वितः । मन्त्रशक्तिप्रभावेण स दीक्ष्यान्दीक्षयेत्प्रिये । क्षयं नयत्यसौ पाशान् ददात्येव परं पदम् ॥ (नेत्रतन्त्र १६।७४) अचिन्त्या मन्त्रशक्तिर्वै परमेशमुखोद्भवा । (ने०तं० १६।७०) (१२) मन्त्र-सिद्धि के उपाय—(१) दीपन (२) बोधन (३) ताडन (४) अभिषेचन (५) विमलीकरण (६) इंधन (७) निवेशन (८) सन्तर्पण (९) गुप्तिभाव— एवं नव प्रकारेण मन्त्रवादमशेषतः । यो जानाति स जानाति मन्त्र-साधन-साधनम् ॥ मन्त्र और मन्त्रविज्ञान—श्लोक क्र० २६ एवं २७ में कारिकाकार ने यह प्रति- पादित किया है कि योगियों की जो पवित्र भारती है उसमें आत्मशक्ति का सञ्चार हो जाता है और उनके द्वारा उच्चारित मन्त्र वर्णमात्र नहीं रहते प्रत्युत् वे ‘सर्वज्ञबलशाली’ बन जाते हैं और किसी भी इच्छित आकांक्षा को पूर्ण करने वाले एवं सारे कार्यों का निष्पादन करने वाले होते हैं । १-३. महार्थमञ्जरी ।