स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ स्पन्दकारिका मन्त्रात्मिकाशक्ति—सभी प्रकार के मन्त्र (मन्त्राः) स्पन्दस्वरूपात्मिका संवित् शक्ति के साथ एकाकारता प्राप्त करने के फलस्वरूप सर्वज्ञता आदि (सर्वज्ञता, सर्वात्मक बोध, अप्रतिबंधित स्वातन्त्र्य, अपनी अनन्त शक्तियों का निर्बाध प्रसार, अनन्तशक्ति, शक्ति चक्रों के ऐश्वर्य, सर्वकर्तृत्व, सर्वव्यापकत्व, परम संतृप्ति आदि) आत्मबलों (बल) को अधि-गत करके यथाकांक्षित कार्यों के निष्पादन करने का अधिकार उसी प्रकार अधिगत कर लेते हैं जिस प्रकार शरीरी प्राणियों की इन्द्रियाँ अपने निजी संकल्प मात्र के द्वारा ही अपने समस्त आकांक्षित कार्यों का निष्पादन कर लेती हैं ॥ २६ ॥ भट्टकल्लट कहते हैं—समस्त प्रकार के मन्त्र आवरण शून्य चिद्रूपता (आत्म चैतन्य) के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेने के परिणामस्वरूप सर्वज्ञता आदि माहेश्वर बलों को प्राप्त कर लेते हैं तथा समस्त शरीरधारी जीवों की इन्द्रियों की भाँति अपनी अनुकम्पा आदि अधिकार सम्बद्ध कार्यों को निष्पादित करने लगते हैं । आत्मबल का संस्पर्श प्राप्त करने के बिना वे मन्त्र किसी आकारान्तर विशेष (शक्ति शून्य वर्णों, मन्त्रों और मात्राओं वाले विशेष रूप वाले) के द्वारा किसी भी कार्य का निष्पादन एवं फल- सिद्धि में समर्थ नहीं हो पाते । ‘तत् बलं निरावरणचिद्रूपमधिष्ठाय, मन्त्राः सर्वज्ञत्वादिन बलेन श्लाघा- युक्ताः प्रवर्तन्ते अनुग्रहादौ स्वाधिकारे, करणानि यथा देहिनाम्, नान्येन आकारादि विशेषेण ।।' ॥ २६ ॥ १ वहीं ये शान्त रूप एवं निरञ्जन (माया जन्य रागों से मुक्त) मन्त्र आराधकों के चित्त के साथ चिदाकाश में संलीन हो जाते हैं अतः ये समस्त मन्त्र शिव धर्मात्मक माने जाने चाहिए ॥ भट्टकल्लट कहते हैं—ये ‘शान्तरूप’ ‘निरञ्जन’ (मायाकालुष्यविवर्जित) मन्त्र सांसारिक भोगसिद्धि से निवृत्त होकर साधक के चित्त के साथ स्वभाव (निर्मल संवित् तत्त्व = स्वस्वभाव) में या सामान्य स्पन्दात्मिका शाक्त भूमि में विलीन हो जाते हैं । मन्त्रों का स्वस्वभाव है कि वे आत्मा का शिव के साथ तादात्म्य स्थापित कर देते हैं । इसी कारण समस्त मन्त्रों को शिवात्मक कहा जाता है । भट्टकल्लट के शब्दों में—‘तत्रैव स्वस्वभावव्योम्नि निवृत्ताधिकाराः प्रलीयन्ते, शान्तरूपाः, माया- कालुष्यरहिताः, सह साधकचित्तेन अनेन कारणेन शिव संयोजनास्वभावेन, इति शिवात्मिका उच्यन्ते ।।' २ ‘मन्त्र’ आवरणशून्य चिद्रूपता के साथ तादात्म्य (एकाकारता) अधिगत करने के अनन्तर ही सर्वज्ञता आदि माहेश्वर बल प्राप्त कर पाते हैं इसके पूर्व नहीं । मन्त्र के दो रूप हैं—(१) 'साञ्जन एवं (२) 'निरञ्जन' । सांसारिक भोगों की प्राप्ति की ओर उन्मुख मन्त्रों को साञ्जन मन्त्र कहा जाता है किन्तु जिनका प्रयोग निराकांक्ष होकर स्वस्वरूपा- भिव्यक्ति के लिए किया जाता है उन्हें 'निरञ्जन' कहा जाता है । १. 'स्पन्दसर्वस्व' । २. 'स्पन्दसर्वस्व' ।