भारतकोश
संग्रह पर लौटें

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

२६८ स्पन्दकारिका मन्त्रात्मिकाशक्ति—सभी प्रकार के मन्त्र (मन्त्राः) स्पन्दस्वरूपात्मिका संवित् शक्ति के साथ एकाकारता प्राप्त करने के फलस्वरूप सर्वज्ञता आदि (सर्वज्ञता, सर्वात्मक बोध, अप्रतिबंधित स्वातन्त्र्य, अपनी अनन्त शक्तियों का निर्बाध प्रसार, अनन्तशक्ति, शक्ति चक्रों के ऐश्वर्य, सर्वकर्तृत्व, सर्वव्यापकत्व, परम संतृप्ति आदि) आत्मबलों (बल) को अधि-गत करके यथाकांक्षित कार्यों के निष्पादन करने का अधिकार उसी प्रकार अधिगत कर लेते हैं जिस प्रकार शरीरी प्राणियों की इन्द्रियाँ अपने निजी संकल्प मात्र के द्वारा ही अपने समस्त आकांक्षित कार्यों का निष्पादन कर लेती हैं ॥ २६ ॥ भट्टकल्लट कहते हैं—समस्त प्रकार के मन्त्र आवरण शून्य चिद्रूपता (आत्म चैतन्य) के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेने के परिणामस्वरूप सर्वज्ञता आदि माहेश्वर बलों को प्राप्त कर लेते हैं तथा समस्त शरीरधारी जीवों की इन्द्रियों की भाँति अपनी अनुकम्पा आदि अधिकार सम्बद्ध कार्यों को निष्पादित करने लगते हैं । आत्मबल का संस्पर्श प्राप्त करने के बिना वे मन्त्र किसी आकारान्तर विशेष (शक्ति शून्य वर्णों, मन्त्रों और मात्राओं वाले विशेष रूप वाले) के द्वारा किसी भी कार्य का निष्पादन एवं फल- सिद्धि में समर्थ नहीं हो पाते । ‘तत् बलं निरावरणचिद्रूपमधिष्ठाय, मन्त्राः सर्वज्ञत्वादिन बलेन श्लाघा- युक्ताः प्रवर्तन्ते अनुग्रहादौ स्वाधिकारे, करणानि यथा देहिनाम्, नान्येन आकारादि विशेषेण ।।' ॥ २६ ॥ १ वहीं ये शान्त रूप एवं निरञ्जन (माया जन्य रागों से मुक्त) मन्त्र आराधकों के चित्त के साथ चिदाकाश में संलीन हो जाते हैं अतः ये समस्त मन्त्र शिव धर्मात्मक माने जाने चाहिए ॥ भट्टकल्लट कहते हैं—ये ‘शान्तरूप’ ‘निरञ्जन’ (मायाकालुष्यविवर्जित) मन्त्र सांसारिक भोगसिद्धि से निवृत्त होकर साधक के चित्त के साथ स्वभाव (निर्मल संवित् तत्त्व = स्वस्वभाव) में या सामान्य स्पन्दात्मिका शाक्त भूमि में विलीन हो जाते हैं । मन्त्रों का स्वस्वभाव है कि वे आत्मा का शिव के साथ तादात्म्य स्थापित कर देते हैं । इसी कारण समस्त मन्त्रों को शिवात्मक कहा जाता है । भट्टकल्लट के शब्दों में—‘तत्रैव स्वस्वभावव्योम्नि निवृत्ताधिकाराः प्रलीयन्ते, शान्तरूपाः, माया- कालुष्यरहिताः, सह साधकचित्तेन अनेन कारणेन शिव संयोजनास्वभावेन, इति शिवात्मिका उच्यन्ते ।।' २ ‘मन्त्र’ आवरणशून्य चिद्रूपता के साथ तादात्म्य (एकाकारता) अधिगत करने के अनन्तर ही सर्वज्ञता आदि माहेश्वर बल प्राप्त कर पाते हैं इसके पूर्व नहीं । मन्त्र के दो रूप हैं—(१) 'साञ्जन एवं (२) 'निरञ्जन' । सांसारिक भोगों की प्राप्ति की ओर उन्मुख मन्त्रों को साञ्जन मन्त्र कहा जाता है किन्तु जिनका प्रयोग निराकांक्ष होकर स्वस्वरूपा- भिव्यक्ति के लिए किया जाता है उन्हें 'निरञ्जन' कहा जाता है । १. 'स्पन्दसर्वस्व' । २. 'स्पन्दसर्वस्व' ।

द्वितीयः निष्यन्दः २६९ मन्त्रों का चिदाकाश में लय एवं उनकी शिवात्मकता— तत्रैव सम्प्रलीयन्ते शान्तरूपा निरञ्जनाः । सह साधकचित्तेन तेनैते शिवधर्मिणः ॥ २७ ॥ वे शान्त (शुद्ध संवित्) एवं निरञ्जन (मायिक आच्छादनों से शून्य) मन्त्र (निवृत्ताधिकार होकर) आराधक के चित्त के ही साथ वहीं (स्वस्वभाव व्योम, या स्पन्दात्मक बल या विशुद्ध चिद्रूप सामान्य स्पन्द रूप शाक्त भूमिका में) लीन हो जाते हैं । अतः वे (समस्त मन्त्र) शिवस्वरूप (ही) हैं ॥ २७ ॥

  • सरोजिनी * तत्रैव = 'स्वस्वभाव व्योम में' = विशुद्धचिद्रूपता में, तत्रैव = वहीं (स्पन्दात्मक बल में) ॥ (स्वस्वभाव व्योम में—भट्टकल्लट) निरञ्जनाः = अञ्जन+शून्य (कृतकृत्य होने के कारण निवृत्तअधिकारमल) ॥ कृतकृत्य = अपने पदार्थ या लक्ष्य प्राप्त करने पर आत्मतृप्त ॥ (निरञ्जनाः शान्तरूपाः मन्त्राः स्पन्दात्मके बले सम्यक् अभेदापत्या प्रकर्षेण अपुनरावृत्या लीयन्ते । अधिकार-मलान मुच्यन्ते आराधकचित्तेन सह ।¹ मन्त्र-विज्ञान—समस्त मन्त्र शिवधर्मी या शिवस्वरूप हैं । 'मन्त्र' अपने मूल रूप में आत्मा की किरणें हैं—चैतन्य की रश्मियाँ हैं—'मन्त्राश्चिन्मरीचयः' । 'प्रणव' (महा- मन्त्र) की १२ कलायें हैं । उनमें 'बिन्दु' नाद के रूप में विकसित होता है । नाद ही 'मन्त्र' के रूप में आकार ग्रहण करता है । मन्त्र भी अशुद्धियों से मुक्त हो जाते हैं और उनके कार्यों की अशुद्धियाँ भी, उनके द्वारा लक्ष्य-प्राप्ति के अनन्तर, लुप्त हो जाती हैं । ये मन्त्र एवं उनके स्वामी महेश्वर शिव के स्वभाव वाले हैं—शिवस्वभावी हैं—शिवधर्मी हैं—और स्पन्दसार हैं । ये स्पन्द से उत्पन्न होते हैं और उसी में लय हो जाते हैं ।² एक प्रश्न यह उठता है कि—मन्त्र एवं करणों का उदय तो समान स्रोत से होता हैं—उदय में तो दोनों समधर्मी हैं फिर करण सर्वज्ञात्मक क्यों नहीं हैं? परमेश्वर 'मायाशक्ति' के द्वारा शरीर एवं इन्द्रियों का आविर्भाव करता है और ये भेदपूर्ण हैं— द्वैतात्मक हैं । परमात्मा 'विद्याशक्ति' के द्वारा आकाश के माध्यम से मन्त्रों को जन्म देता है । इन मन्त्रों का सार तत्त्व अधिष्ठात्री शक्तियों में निवास किया करता है । मन्त्रों के द्वारा सर्वज्ञता आदि गुण एवं शक्तियाँ प्राप्त की जाती हैं यह संगत तथ्य है क्योंकि मायिक धरातल पर भी मन्त्र में (किसी देवी के वाचक के रूप में) शरीर एवं पुर्यष्टक की भाँति बोध-संकोचत्व (Limitation in knowledge) नहीं है प्रत्युत् उसमें सर्व- ज्ञत्वादि गुण निहित है ।³ इस पंक्ति की व्याख्या उपर्युक्त विधि से अनन्त भट्टारक के संदर्भ में भी की जानी चाहिए जो कि विद्यापाद पर स्थित है एवं सृष्टि करते हैं । १-३. स्पन्दनिर्णय ।

२७० स्पन्दकारिका इस श्लोक के दूसरी व्याख्या भी की जानी चाहिए—दीक्षादिक में व्याप्त गुरुजनों की इन्द्रियों के रूप में समस्त 'मन्त्र' स्पन्द सिद्धान्त पर आश्रित हैं और वे साधक के मस्तिष्क के साथ स्पन्द में लय हो जाते हैं। दीक्षादिक में प्रवृत्त समस्त आचार्यादिकों के करण रूप समस्त मन्त्र उन स्पन्द तत्त्व रूप 'बल' को अधिगत करके—आराधक के चित्त के साथ भोगमोक्ष के साधन आदि के अधिकार के लिए प्रवृत्त होते हैं और वहीं शान्त, (वाचक शब्दात्मक शरीर रूप) एवं निरञ्जन (शुद्ध) रूप से लय हो जाते हैं। १ (१) मन्त्र स्पन्दसार हैं। मन्त्रों की स्पन्दरूपता एवं स्पन्दसारता का प्रतिपादन ही इस श्लोक का मुख्याभिप्राय है। शैव संप्रदाय के अनुसार (जिसमें ८ एवं १८ भेद हैं) 'मन्त्र' स्पन्द के साथ अभिन्न हैं। (२) मन्त्र, मन्त्रेश्वर आदि के रूप में होने वाली सृष्टि शुद्धसृष्टि है और शिवस्वभावा है किन्तु मायादिरूपा अशुद्ध सृष्टि भी शिव से भिन्न नहीं है प्रत्युत् शिवस्वरूपा ही हैं। शुद्धसृष्टि मन्त्ररूपता है और उनके अधिपति देवता शिव के स्वभाव वाले हैं। २ ये 'मन्त्र' साधक के चित्त की प्रवृत्ति एवं निवृत्ति के निमित्त से अर्थात् उसकी आधारभूत इच्छा से पुनः लीन हो जाते हैं—उसी शक्तिमान् स्वस्वभाव में लय प्राप्त कर लेते हैं। क्योंकि ये स्वस्वभाव के अनुगामी और शक्तिरूप हैं। यही बात 'कालपरा' नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—पर अक्षर रूप वृक्ष में अनेक शक्तियाँ विद्यमान हैं। उनके विवर्त शक्ति के वर्णों के रूप में प्रकट होते हैं और मुख के द्वारा निःसृत होते हैं— ३ पराक्षर तरोधर्तुर्माना शक्तेर्विवर्तगाः । शक्तयो वर्णदेहेषु वक्त्राद्दर्णत्वमागताः ॥ ये शक्तियाँ कृतकृत्य होने के कारण स्वयं शान्त हैं और निरञ्जन (कालुष्यरहित) है, या निरञ्जन तत्त्व से अनुप्राणित हैं। यही कारण है जो शिव शङ्कर में धर्म हैं वे ही मन्त्र में भी अर्थात् मन्त्र भी सर्वज्ञ एवं सर्वकर्ता हैं। सह साधक चित्तेन लीयन्ते तत्र यत् स्मृतम् । ४ शिवतात्मनि सर्वात्म्यात् चाहैतत्सोपपत्तिकम् ॥ साधक के चित्त में मन्त्र लीन हो जाते हैं अर्थात् आत्मा ही शिव है । ५ मन्त्र योग—ये शिवधर्मीमन्त्र जिस सीमा तक अधिकार-सम्पन्न हैं उस सीमा तक प्रवृत्त होते हुए, अञ्जन (वाच्योपराग मल से या वर्णादिरूप भावनात्मकता) से मुक्त होकर एवं शान्तरूप (शुद्ध अर्थात् संविन्मात्रावशिष्ट, एवं निर्विकार आत्मा के स्वरूप वाला) होकर तत्रैव—परमकारण एवं स्वस्वभावशिव में संप्रलीयन्ते—सम्यक् रूप से लीन हो जाते हैं अर्थात् उनके साथ ऐक्य प्राप्त कर लेते हैं। निरञ्जन—अञ्जनरहित । वाच्योपराग मल से या वर्णादिरूप भावनात्मकता से रहित । शान्तरूपाः = संविन्मात्रावशेष । शुद्ध एवं निर्विकार आत्मा वाले । १-२. स्पन्दनिर्णय । ३-५. स्पन्दप्रदीपिका ।

द्वितीयः निष्यन्दः २७१ तत्रैव = स्वस्वभाव, परमकारण शिव में । सम्प्रलीयन्ते—सम्यक् रूप से लय हो जाते हैं । उसके साथ एकाकार हो जाते हैं । एकता प्राप्त कर लेते हैं । शिवधर्मिणः = शिव अर्थात् परमेश्वर के अनन्यसाधारण सर्वज्ञत्वादि गुण (धर्म) वाले अर्थात् शिव से अभिन्न स्वरूप वाले । आराधकचित्तेन सह = आराधक के मन के साथ । कैसे चित्त के साथ? उस अवस्था में अभिसंधि उपाधि से रहित होने के कारण स्वाभाविक मात्रावशेष साधक-चित्त के साथ । इसके द्वारा इसे तात्त्विकमन्त्रवीर्यात्मक प्रतिपादित क्यों किया गया? क्योंकि मांत्रिक चेतना के उदय एवं अस्तमन की दशाओं की परमकारणस्वरूप शिव के साथ अभिन्नता है— 'मन्त्रचेतसोः उदयास्तमयदशयोः परमकारणात् शिवाभेदः ॥' इस प्रकार मन्त्रात्मक एवं साधक के चित्त के साथ एकात्मक होने के कारण स्वयं शिव एवं शक्ति ही वर्णसंकल्पादिरूपधारिणी होकर प्रकट हो जाती हैं और इस तरह होकर शिव की शक्ति स्वस्वभावबल का स्पर्श न पाने वाले साधकों में भेदविभ्रम उत्पन्न करती हुई केवल नियतार्थसाधनाधिकार को ही प्रवर्तित करती है । यथा प्रतिपादित स्वस्वभाव में ही सुदृढ़ आत्मप्रतिपत्ति हुआ करती है । १ 'मन्त्र सर्वार्थसाधनाधिकारी हुआ करते हैं: 'मन्त्राः सर्वार्थसाधनाधिकारिणो भवन्ति' जो यथाप्रतिपादित स्वस्वभाव में ही सुदृढ़ रूप से आत्मप्रतिपत्ति कर चुके हैं उनके उदय एवं अस्तमय (अस्तमन) के परिज्ञाता समस्त मन्त्र सर्वार्थसाधनाधिकारी होते हैं और वे इसके लिए उन-उन कर्तव्यों के साहित्य (एक साथ होना या रहना के नियमादिक की अपेक्षा भी नहीं रखते ) 'मन्त्राः सर्वार्थसाधनाधिकारिणो भवन्ति तत्तदितिकर्तव्यतासाहित्यनियमाद्यपेक्षां बिना' इस स्थिति में— मन्त्र विज्ञान— 'यद्यद्वचनं येन येनाभिसंधिना उच्चारयति तत तस्यामोघमन्त्रतामापद्यते ॥' अतः योगियों के द्वारा, स्वभावबलाक्रमण वाले, सिद्ध एवं स्वतः सिद्ध मन्त्रों के पराक्रम (सामर्थ्य) प्रत्यवमृष्टव्य हैं । मन्त्र शिवधर्मी हैं—'मन्त्रा एव शिवधर्मिणो' । जब तक कि कोई 'क्रिया' ज्ञान नहीं बन जाती एवं कोई 'कार्य' ज्ञेय नहीं बन जाता अर्थात् परतत्त्वाभेदापत्तिलब्धात्मक एवं (इस प्रकार) शिवात्मक नहीं बन जाते तब तक 'मन्त्र' शिवधर्मी नहीं बन पाते । २

१. स्पन्दकारिकाविवृतिः रामकण्ठाचार्य । २. स्पन्दविवृति (रामकण्ठाचार्य) ।

२७२ स्पन्दकारिका 'मन्त्र' द्विविध प्रकार हैं—(१) भोगरूप = 'साञ्जन' (२) मोक्षरूप = 'निरञ्जन' यहाँ निरञ्जन (मायाकालुष्य रहित) एवं शान्त मन्त्रों के विषयों में ही कहा गया है क्योंकि वे ही चिदाकाश में लीन होते हैं। इन मन्त्रों के द्वारा साधक की आत्मा शिवभाव के साथ तादात्म्य प्राप्त कर लेती है। 'मन्त्र' का स्वरूप—(१) 'मन्त्र' परावाक् स्वरूप है—देवतारूप हैं—कुण्डलिनी- शक्तिरूप हैं। 'कामधेनुतन्त्र' में वर्णमाला के प्रत्येक वर्ण को कुण्डलिनीस्वरूप कहा गया है। (२) 'मन्त्र' अहंविमर्शस्वरूप हैं। प्रत्येक विमर्श अभिलापात्मक ही होता है। अभिलाप तो वर्णात्मक होता है अतः प्रत्येक विमर्श शब्दात्मक होता है। वाणी या शब्द—(१) परा (२) पश्यन्ती (३) मध्यमा (४) वैखरी चार सोपानों पर व्यक्त होते हैं। शब्द (वाणी, वाक् तत्त्व) से पूर्णतः पृथक् 'विमर्श' संभव नहीं है। 'वर्ण' 'पद' एवं 'मन्त्र' ये तीनों शब्द के अध्व (मार्ग) हैं। 'कला' 'तत्त्व' एवं 'भुवन' ये तीन 'अर्थाध्व' हैं। इन्हीं ६ अध्वाओं (षडध्व) से समस्त जगत् की उत्पत्ति होती है। 'शब्द' एव 'अर्थ' शिव-शक्ति के रूप हैं। शब्दना-विरहित विमर्श की सत्ता संभव नहीं है। विमर्शात्मक शब्दना अपने उच्चतम शिखर पर 'परावाक्' कहलाती है। यह आन्तर शब्दना के स्वरूप वाली (स्पन्दात्मिका शब्दना) 'परावाक्' मयूराण्डरसवत् अपने भीतर समस्त वाचक एवं वाच्य (शब्दराशि) को अविभक्त रूप में अवस्थित रखती है और अहं रूप (बीजरूप) में अवस्थित है। समस्त 'मन्त्र' इसी अहमात्मक परावाक् के स्वस्वरूप हैं। 'परावाक्' 'सामान्य स्पन्द' है। सामान्य स्पन्द गतिशून्य होकर भी किंचित् चलता वाला है इसी 'परावाक्' से 'पश्यन्ती' 'पश्यन्ती' से 'मध्यमा' एवं 'मध्यमा' से 'वैखरी' का विकास होता है। 'वैखरी वाक्' में प्रसृत परावाक् अपने स्थूलतम सोपान पर आरूढ़ होती है और वैखरी वाक् के (१) पूर्व मालिनी (मातृका) एवं (२) 'मालिनी' दो स्तरों पर व्यक्त होती है। परावाक्-पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरी—(१) पूर्वमालिनी—अ से क्ष पर्यन्त वर्णमाला ('स्वच्छन्द तन्त्र' में भी मान्य) (२) मालिनी—न से क पर्यन्त वर्णमाला (मालिनी विजयोत्तर आदि तन्त्रों में प्रतिपादित) ॥ मालिनी का क्रम—न, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, थ, च, ध, ई, ण, उ, ऊ, ब, क, ख, ग, घ, ङ, इ, अ, व, भ, य, उ ढ, ठ, झ, ञ, ज, ष, र, ट, प, छ, ल, आ, स, अः, ह, ष, क्ष, म, श, अं, त, ए, ऐ, ओ, औ, द, क (मालिनीविजयोत्तरतन्त्र)। पशुप्रमाता एवं पतिप्रमाता में साम्य एवं सभी अवस्थाओं में शिवत्व की व्यापकता— यस्मात् सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवः । तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः ॥ २८ ॥ तेन शब्दार्थ चिन्तासु न साऽवस्था न यः शिवः । भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥ २९ ॥

द्वितीयः निष्यन्दः २७३ जिससे कि पशुप्रमाता सर्वमय है क्योंकि (पशुप्रमाता भी प्रति प्रमाता की भाँति जगत् के समस्त) भावों (घट, पट आदि) के साथ संवेदनस्वरूप तादात्म्य प्राप्त करके समस्त भावों की सृष्टि करता रहता है ॥ २८ ॥ अतः शब्द (वाचक) एवं अर्थ (वाच्य) की चिन्ताओं (विमर्शन) में ऐसी कोई अवस्था ही नहीं है जो शिवरूपात्मिका न हो । नित्य रूप से (सदैव) सर्वत्र भोक्ता (आत्मा) ही भोग्य (प्रमेय पदार्थ) के रूप में अवस्थित है ॥ २९ ॥

  • सरोजिनी * शिव सर्वत्र स्थित है, सदैव स्थित है, सर्वव्यापक है । इसी प्रकार जीव भी सर्वत्र स्थित है, सदैव स्थित है, एवं सर्वव्यापक है । जीव 'सर्वमय' है । शब्द एवं अर्थ के माध्यम से व्यक्त ऐसी कोई संवेदनात्मक अवस्था ही नहीं है जो शिवात्मक न हो ॥ सारांश यह कि—आत्मा ही शिव है । आत्मा ही जगत् है । यह सब जगत् आत्मा ही है । सब चिन्मय है । इस श्लोक में यह प्रतिपादित किया गया है कि—शुद्धसृष्टि तो शिवस्वभावा है ही किन्तु जो मायादि रूपा अशुद्ध सृष्टि है वह भी शिवस्वरूपा है ।¹ सृष्टि के दो रूप हैं—(१) शुद्धा सृष्टि (२) अशुद्धा सृष्टि । जीवात्मा समस्त विश्व के साथ अभिन्न है क्योंकि समस्त वस्तुओं का सृजन उसी एक के द्वारा किया गया है क्योंकि वह समष्टि का (हस्तामलकवत् एक साथ ही) ज्ञान प्राप्त करता है और सर्वव्यापक है—विश्वव्यापकत्व प्राप्त है । अतः ऐसी कोई अवस्था नहीं है जो कि शिव से अभिन्न न हो । अनुभविता सर्वत्र विद्यमान है और वह अनुभूत पदार्थ के रूप में भी विद्यमान है ।² यस्मात् = जिसके द्वारा । जिसके कारण । जीवः = प्राणी । ग्राहक । सर्वमयः = शिववद्विश्वरूप । शब्दार्थ = शब्द = वाचक । अर्थ = पदार्थ । अर्थ—वाच्य ॥ चिन्तासु = विकल्पज्ञान आदि रूपों में स्थित चिन्ताओं में । सावस्था = वह अवस्था । आदि-मध्य-अन्त रूप अवस्थायें । 'सर्वमेव शिव- स्वरूपम् इत्यर्थः ।।' ग्राहक, भोक्ता, चिदात्मा ही भोग्य भाव से देह-नील आदि के रूप में सदैव नित्य रूप से सर्वत्र विचित्र तत्त्वभुवनादिक पद में स्थित हैं । कोई भी भोग्य वस्तु भोक्ता से भिन्न नहीं है 'न तु भोग्यं नाम किंचिद् भोक्तुर्भिन्नमस्ति ।।'³ जीव—इस शब्द से प्रारंभ करके एवं 'शिव' शब्द से उपसंहार करने के द्वारा ग्रन्थकार ने—'जीवशिवयोर्वास्तवो न कोऽपि भेदः'—इस प्रकार देहादिक अवस्थाओं में १-३. स्पन्दनिर्णय । स्पं० १८

२७४ स्पन्दकारिका कोई अपूर्णमन्यता मन्तव्य नहीं है प्रत्युत् चिद्घनशिवस्वभावता ही भंग्योपदेश द्वारा यहाँ प्रतिपाद्य है ।¹ भट्टकल्लट ने 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इस कारिका की व्याख्या इस प्रकार की है—यह जीवात्मा सर्वमय है क्योंकि यह स्वीय संवेदनों के माध्यम से प्रत्येक भाव का सृजन करता है । अनुभव में आने वाला प्रत्येक पदार्थ उसके संवेदन का विषय बन जाता है । यह मितप्रमाता किसी भी बाह्य पदार्थ का अनुभव करने के अनन्तर उसे अपने शरीर के रूप में ग्रहण कर लेता है । इसका शरीर मात्र सिर, पैर आदि अंगों वाला शरीर नहीं रह जाता प्रत्युत् बाह्यार्थ भी अनुभव के विषय बन जाने पर उसका शरीर बन जाते हैं— 'सर्वात्मक एवायमात्मा सर्वानुभावोत्पत्तिद्वारेण अनुभूयमानस्यैव संवेदनात् बाह्यार्थ- मनुभूयमानमेव शरीरत्वेन गृह्णाति, न तु शिरः पाण्यादिलक्षितम् एकमेवास्य शरीरम्' ।। 'तेन शब्दार्थचिन्तासु ..... संस्थितः ।' इस कारिका की व्याख्या भट्टकल्लट ने 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इस प्रकार की है—'तेन तथाविधेन सर्वात्मकेन स्वभावेन, शब्दार्थयोः चिन्तासु न सा अवस्था या शिवस्वभावं न व्यञ्जयति, अतो भोक्तैव हि भोग्यभावेन सर्वत्रावस्थितो न त्वन्यत् भोग्यमस्ति ।। २९ ।। साधकों के चित्त में 'मन्त्र' लीन हो जाते हैं और इस प्रकार आत्मा ही शिव है । इसको प्रमाणित करने हेतु ग्रन्थकार ने २८, २९ कारिकायें कही हैं । उत्पलदेव कहते हैं— सह साधकचित्तेन लीयन्ते तत्र यत् स्मृतम् । शिवात्मनि सर्वात्म्यात् चाहैतत्सोपपत्तिकम् ॥ बोद्धा होने के कारण जीव या आत्मा सर्वमय, सर्वात्मक एवं विश्वरूप है । उत्पलदेव कहते हैं— 'यस्माज्जीव आत्मैव सर्वमयः सर्वात्मको विश्वरूपः बोद्धृरूपत्वात् । कहा भी गया है—तत्त्व ज्ञान के होते ही सब चिन्मय हो जाता है । वेद्य का ऐसा कोई भाग नहीं है जो कि वेदक से बाहर हो । 'वेद्य' ही वेदक है । 'वेदक' संवित् है । 'संवित्' आत्मा है ।' तब तो सबसे बड़ा यथार्थ यही है कि—आत्मा ही जगत् है । 'यदैव विदितं विश्वं तदानीमेव चिन्मयम् । यन्नास्ति भागो वेद्योऽसौ नाथ यो वेदकाद् बहिः ॥ वेद्यो वेदकतामाप्तो वेदकः संविदात्मकम् । संवित् त्वदात्मा चेत् सत्यं तदिदं त्वन्मयं जगत् ।।' छान्दोग्य श्रुति में भी कहा गया है— 'आत्मैवेदं जगत् सर्वं नेह नानास्ति किंचन' ।।' (छा० ३।९।१२) १. स्पन्दनिर्णय ।

द्वितीयः निष्यन्दः २७५ अर्थात् इदम् के रूप में प्रतीयमान यह सब जगत् आत्मा ही है। आत्मा में नानात्व किंचिन्मात्र भी नहीं है। समस्त भावों का समुद्भव आत्मा से ही होता है। संविद् के आरोहण से ही 'परा' 'पश्यन्ती' 'मध्यमा' आदि वाणियों का उदय होता है और समस्त सत्तायें इसीसे सिद्ध होती है। आचार्यों ने भी कहा है कि—सभी के कारण तुम्हीं हो क्योंकि घट में मृत्तिका के समान सभी में तुम्हारा अन्वय है। जब संवित् के बिना विश्व की सिद्धि हो ही नहीं सकती—संपूर्ण विश्व संविद्—समन्वित है—तब तो असंवित् विश्व का कारण कैसे हो सकता है? संवित् ही सत् है और सत् ही संवित् है। संवित् की उपासना किये बिना वहीं संपूर्ण सत् है—यह अनुभव में नहीं आ सकता— त्वत्कारणत्वं सर्वस्मिन्नपि ज्ञातं त्वदन्वयात् । संवित्समन्विते विश्वे नाऽसंवित् कारणं भवेत् ॥ संविदायतनं ज्ञातं तत् सदाख्यां प्रपद्यते । तावतैव न लभ्या स्यादनुपासितसंविदा ॥ तथा यह भी कहा है कि— त्वदात्मकत्वं भावानां विवदन्ते न केचन । यत्प्रकाशदशां याता नाऽप्रकाशः प्रकाशते ॥ अर्थात् सभी भाव तुम्हारे ही स्वरूप है इसमें किसी का विवाद नहीं है क्योंकि सब प्रकाशित होते हैं। क्या कहीं अप्रकाश भी प्रकाशित होता है? और भी कहा गया है— 'तुम प्रकाशक एक ही हो। सर्जन भाषण और बोधन-ये तीनों तुम्हारे प्रकाश हैं। तुम अन्य प्रकाशों से व्यतिरिक्त हो, जैसे दूसरे प्रकाशक सूर्य आदि। किन्तु तुम्हारे प्रकाश के उदय के बिना कोई दूसरा प्रकाश प्रकाशित नहीं हो सकता। श्रुति, पंचरात्र भी तो यही कहते हैं कि वहाँ सूर्य चन्द्र आदि का प्रकाश नहीं है। उसी के प्रकाश से यह सब प्रकाशित हो रहा है— 'सृजन् वदन् ज्ञापयंश्च त्रिधैकस्त्वं प्रकाशकः । व्यतिरिक्तः प्रकाशेभ्यो न यथाऽन्ये प्रकाशकाः । न प्रकाशाः प्रकाशन्ते त्वत्प्रकाशोदयं विना ॥' पंचरात्र में भी कहा गया है कि—'न तत्रादित्यो भाति' अर्थात् वहाँ सूर्य-चन्द्रादि प्रकाश नहीं है। उसी के प्रकाश से यह सब प्रकाशित हो रहा है। संवित् सर्वमय है—इसका अन्य उदाहरण भी है। जितने संवेद्य हैं वे संवेदनरूप अनुभव के द्वारा ही संविदित होते हैं। उनसे तादात्म्य होता है। तद्भावरूपता होती है और अभेद का संवेदन होता है। 'स्वात्मसप्तति' में कहा गया है—सभी वस्तुएं ज्ञानस्वभाव का ही विषय होती हैं और उसके साथ तादात्म्य प्राप्त हो जाती है। जीव ज्ञान स्वरूप है अतः वह सर्वमय है—

२७६ स्पन्दकारिका 'यद्वद् वस्तुस्वभावेन ज्ञानेन विषयीकृतम्। तद्वत्तादात्म्यमायाति जीवः सर्वमयो ह्यतः॥' 'संवित्प्रकाश' में कहा गया है—अग्नि से समाविष्ट सब अग्निरूप ही दिखता है, वैसे ही ज्ञान समाविष्ट सब ज्ञानरूप ही देखिए'— 'यथाऽग्निना समाविष्टं सर्वं तद्रूपमीक्ष्यते। तथा ज्ञानसमाविष्टं सर्वं तद्रूपमीक्ष्यताम्॥' 'आगमरहस्य' में भी कहा गया है—ज्ञान से आकार वर्ग भासित होता है अतः यह विश्वमयी विभूति ज्ञान ही है। तुम्हीं विश्वात्मक हो, यह केवल शास्त्रसिद्ध ही नहीं है, आत्मसंवित् से संविदित् होने के कारण अनुभवसिद्ध भी है— आकार वर्ग उपरि प्रतिभासतेऽस्य, ज्ञानस्य सापि तव विश्वमयीविभूतिः। विश्वात्मकस्त्वमिति नाऽऽगमसिद्धमेतत्, किन्तु स्वसंविदितरूपतयापि सिद्धम्॥ संवित् तत्त्व ही प्राण के माध्यम से वाणी का रूप धारण करता है—'संविदेव प्राणद्वारेण वायूरूपतां धत्ते॥' इसीलिए कहा भी गया है—संवित् तत्त्व वाणी का रूप-अर्थात् परा-पश्यन्ती- मध्यमा एवं वैखरी भी बन जाता है। इन चारों वाणियों का वक्ता निर्विशेष परमस्थायी और नित्योदित निजाकृति है। सूर्य के समान तेज का विस्तार करता हुआ वह हृदय में प्रकाशित होता है और चिदिच्छा-शक्ति से संबुद्ध है और आत्मबल ही उसका बल है— स्थानेषु विवृते वायौ कृतवर्णपरिग्रहा। वैखरी वाक् प्रयोक्तॄणां प्राणवृत्तिनिबन्धना॥ केवलं बुद्धयुपादानात् क्रमरूपानुपातिनी। प्राणवृत्तिमतिक्रम्य मध्यमा वाक् प्रवर्तते॥ अविभागात्तु पश्यन्ती सर्वतः संहृतक्रमा। स्वरूप ज्योतिरेवान्तः सूक्ष्मा वागनपायिनी॥ स्वयं रौति य एषोन्तर्निर्विशेषनवात्मकः। स परः परमः स्थायी नित्योदित निजाकृतिः॥ चिदिच्छाशक्तिसम्बुद्धः स्पन्द आत्मबलेरितः। सवितेव स तेजांसि विचिन्वन् हृदि राजते॥ 'प्रत्यभिज्ञा' में भी कहा गया है—प्रत्यवमर्शात्मा चिति ही सरस परावाक् है। परमात्मा का यह स्वातन्त्र्य ही मुख्य ऐश्वर्य है। वह सर्वदेशकाल में स्फुरित होती हुई सभी का आधार है और परमेश्वर का हृदय है—और उसका रूप है अन्तः संकल्प— 'चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता। स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः॥

द्वितीयः निष्यन्दः २७७ सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी । सैषाऽऽभारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥' इस महासत्ता का रूप है अन्तःसंकल्प। उसमें शब्द एवं अर्थ-दोनों एक साथ स्फुरित होते हैं। अतः दोनों का अभेद ही प्रख्यात है। ग्रन्थकार कहते हैं—'शब्दानुवेधन के बिना प्रत्यय का उदय नहीं होता'— 'यतः शब्दानुवेधेन न बिना प्रत्ययोद्भवः ॥' 'वाक् का मूल संवित् है'। कहा भी गया है— जैसे निजात्मा संवित् से संपूर्ण जगत् अनुविद्ध है वैसे ही संवित् से सम्पूर्ण वाणी अनुबिद्ध है— 'यथा तथा जगद्विद्धं सर्वमेव निजात्मना । तथा तयाऽनुविद्धेयं सर्वतो भाति भारती ॥' योगिनाथ का कथन है कि—परतत्त्व में किसी भी वस्तु की सिद्धि के लिए वाणी को स्वीकार करना पड़ता है क्योंकि रूप के अनुसंधान से वस्तु का निश्चय होता है। उसकी उन्मुख वृत्ति से ही वस्तु के सद्भावना की कल्पना होती है। उसके बिना किसी को आत्मलाभ नहीं हो सकता क्योंकि उस अवस्था में केवल स्वरूप ज्योति रहती है। वहाँ विभाग और क्रम की अपेक्षा नहीं होती। उसका रूप योगिगम्य होता है। उसी उन्मुखता से चिन्तनमयी वाग्धारा बनती है। तदनन्तर विशिष्ट शब्द के विषय की स्फुरणात्मिका विवक्षा होती है। इसके बाद वह शब्द का रूप धारण करके अर्थ को प्रकट करती है। इसलिए संवित्प्रसूत वाणी के बिना किसी अर्थ का अवधारण नहीं हो सकता।'- 'तस्मात् सर्वस्य सिद्ध्यर्थं भारती कारणं परे । परेष्वप्या तदा रूपान्वेषणार्थं निश्चयात् ॥ तस्या औन्मुख्यवृत्त्यैव सद्भावपरिकल्पनात् । नहि तामन्तरेणैषा लभेताऽऽत्मानमम्बिके ॥ सा च तस्यामवस्थायां स्वरूपज्योतिरित्यते । निर्विभागक्रमापेक्षा योगिगम्यानुरूपिणी ॥ तत औन्मुख्यतश्चिन्तामयी भवति वाक् शिवे । विशिष्टशब्दविषयविवक्षास्फुरणात्मिका ॥ ततः शब्दात्मकत्वेन विवृतार्थमयी भवेत् । तदात्मतामन्तरेण यस्मान्नार्थावधारणम् ॥' इस प्रकार सर्वप्रकाशक संवित्स्वरूप की प्रभा के समान प्रकाशन शक्ति अन्तस्संकल्परूपा वाणी बनकर फिर वर्ण, पद, वाक्य को जीवन-दान करती है और पदार्थ के रूप में बाहर दीखती है। यह प्रबुद्धों के लिए स्वानुभवसिद्ध है।

२७८ स्पन्दकारिका है। अन्तस्थ भावों को जो स्वामी है, वही उन्हें प्रकाशित करता है, बिना उसकी इच्छा, अमर्श स्वल्प भी प्रवृत्त नहीं हो सकते— चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद् बहिः। योगीव निरुपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ॥ स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य भावजातस्य भासनम्। अस्त्येव न विना तस्मादिच्छामर्शः प्रवर्तते ॥ इसके अतिरिक्त—'जो कुछ बाहर दिखाई पड़ रहा है वह सब तुम्हारे ही भीतर है आँख बन्द करके जैसे सब कुछ भीतर देखा जा सकता है वैसे ही यह समस्त प्रपंच है— 'यत्किंचदाभाति बहिस्तदीश नूनं तवास्त्येव समस्तमन्तः। निमीलिताक्षा हृदि लक्षयेयुस्तथैव सर्वं कथमन्थया ॥' इस प्रकार 'स्वभाव' ही सर्वरूप में स्थित है। इस सर्वात्मक स्वभाव के कारण शब्द और अर्थ की चिन्ता करने पर ऐसी कोई अवस्था नहीं मिलती जो शिवस्वभाव को प्रकट नहीं करती हो—अर्थात् चित्स्वरूप न हो। संविद् में सब एक है उसी में सभी का अस्तित्व स्थित है। कहा भी गया है— 'जिन-जिन कारणों से भाव-नदियाँ पृथक्-पृथक् प्रवाहित होती हैं। उन्हीं-उन्हीं कारणों से बोध-समुद्र में एक हो जाती हैं'— 'येन येन विभिद्यन्ते हेतुना भावनिम्नगाः। तेन तेनैक्यमायान्ति बोधोदधिसमागताः ॥' ग्रन्थकार ने पहले ही कहा है कि—शारीरिक, शाब्दिक या मानसिक ऐसा कोई व्यवहार नहीं है जिसके प्रारंभ में आप विराजमान न हों। अतः ठीक ही कहा गया है कि संविदात्मा भोक्ता अर्थात् अनुभविता ही भोग्य भाव से अनुभाव्य के रूप में सर्वदा और सर्वत्र स्थित हैं। उससे पृथक् भोग्य नाम का कोई पदार्थ नहीं है।१ श्रुति कहती है—मैं अन्न भी हूँ और भोक्ता भी हूँ—'अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्। अहमन्नादोऽहमन्नादोऽहमन्नादः ॥'२ 'तत्त्वविचार' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—'स्वभावस्थित भाव' ही परस्पर भोक्ता और भोग्य के रूप में सम्बद्ध होते हैं। उनकी कोई पृथक् सत्ता नहीं है। 'ज्ञान' के ये ही नाम हैं—द्रष्टा, अनुभविता, स्मर्ता, ग्राहक, भोक्ता वेदक, कर्ता, उपलब्धा, संवेत्ता और ज्ञाताः—३ 'स्वस्वभावस्थिता भावाः संबध्यन्ते परस्परम्। भोग्यभोक्तृत्वभावेन न कदाचित् स्वभावतः ॥ द्रष्टाऽनुभविता स्मर्ता ग्राहको भोक्तृवेदकः। कर्तोपलब्धा संवेत्ता ज्ञातेति ज्ञानसंज्ञकाः ॥' १-३. स्पन्दप्रदीपिका।

द्वितीयः निष्यन्दः २७९ इसका अभिप्राय यह है कि ज्ञान ही ज्ञेय के रूप में चमकता है, फैलता है। कहा भी गया है कि—'आपसे भिन्न जो भाव दिखायी पड़ते हैं, वे तो अपने आत्मा ही हैं, परन्तु मुग्धतावश अन्य भोग्य के रूप में मालूम पड़ते हैं। मूर्खजन पशु के समान उसके भोग के लिए संसार में भटकते हैं। जो इन दृश्य भावों को आपके वैभव के रूप में देखते हैं वे आपके समान ही प्रभु हो जाते हैं और विश्व को अपने वश में कर सकते हैं'— ज्ञान ही ज्ञेय रूप में प्रथित हो जाता है—'ज्ञानमेव ज्ञेयरूपतया प्रथत इति' । 'भोक्तुर्विभोर्ये भवतो विभिन्नः स दृश्यते मुग्धतया स्व आत्मा । ते भोग्यभूताः पशुवत् परेषां भोगाय भूयोऽत्र भवे भ्रमन्ति ॥ भवं भवद्रै भवभूतमेव विभावयन्तो भगवन् भवेयुः । भवद्गदेव प्रभुभावभाजो विश्वं वशे वर्तयितुं समर्थाः ॥' 'ज्ञानसंबोध' में कहा गया है कि—'ज्ञान' ही तीन रूपों में स्थित है (१) 'ज्ञाता' (२) 'ज्ञेय' (३) 'ज्ञान' ।१ गीता में— 'ब्रह्मार्पणं ब्रह्महवि ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना ॥' उत्पलाचार्य कहते हैं कि—द्रष्टा ही है। अज्ञानी जन इस दृश्य को अध्यात्मरूप से नहीं देखते। शीशे में प्रतिबिम्ब के समान यह जगत् द्रष्टा और दृश्य के रूप में दो प्रकार से भासित हो रहा है। बोधानुवेध से ही घट पटादि बाह्य सद्भाव प्राप्त करते हैं अतः ज्ञानाद्वैत ही सत्य है। कहीं भी ज्ञेय की सत्ता है ही नहीं। 'ज्ञानसंबोध' की दृष्टि इस प्रकार है— 'ज्ञाता ज्ञेयं ज्ञानमिति ज्ञानस्यैव त्रिधा स्थितिः । ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविरित्यत्रोक्तं तदेव यत् ॥'२ उत्पलाचार्य की दृष्टि इस प्रकार है— 'द्रष्टैवाऽस्ति न दृश्यमेतदबुधैरध्यात्मना ज्ञायते । आदर्श प्रतिबिम्बवज्जगदिदं भिन्नं द्विधा भाति यत् ॥ सत्तां यान्ति घटादयो बहिरमी बोधानुवेधात् सदा । ज्ञानाद्वैतमतः स्वतोऽस्ति न पुनज्ञेयस्य सत्ता क्वचित् ॥'३ 'आत्मसप्तति' में कहा गया है कि—यह जो कुछ दीख रहा है वह दर्शन से भिन्न नहीं है। 'दर्शन' द्रष्टा से भिन्न नहीं है अतः द्रष्टा ही जगत् है।' 'यदिदं दृश्यते किंचिद्दर्शनात्तन्न भिद्यते । दर्शनं द्रष्टृतो नान्यद् द्रष्टैव हि ततो जगत् ॥'४ 'संकर्षण सूत्र' में भी कहा गया है कि—जिससे यह विश्व दृष्टिगत होता है, जो समस्त विश्व का द्रष्टा और जो चराचर रूप में दृश्य हो रहा है उसी का नाम है विष्णु— १-४. स्पन्दप्रदीपिका ।

२८० स्पन्दकारिका 'येनेदं दृश्यते विश्वं द्रष्टा सर्वस्य यः सदा । दृश्यश्चराचरत्वे यः स विष्णुरिति गीयते ॥' 'जाबालिसूत्र' में भी कहा गया है कि—द्रष्टा, स्प्रष्टा, श्रोता, घ्राता, रसयिता, मन्ता, बोद्धा, जिसके चैतन्यस्वभाव का कभी लोप नहीं होता वही जगत् की उत्पत्ति- स्थिति-प्रलय का एकमात्र कारण है—भगवान् वासुदेव अर्थात् आत्मा— 'द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धाऽपरिलुप्तचैतन्यस्वभावो जगदुत्पत्ति- स्थितिलयैकहेतुर्भगवान् वासुदेव आत्मेति ॥' पञ्चरात्रोपनिषद् में कहा गया है—'ज्ञाता च ज्ञेयं च वक्ता च वाच्यं च भोक्ता च भोग्यं च ॥' वहीं यह भी कहा गया है कि—सर्वान्तर, स्वयंज्योति, स्वसंबोध्य एवं स्वयंभू वही है—'सर्वान्तरं सर्वबाह्यं स्वयंज्योतिः स्वयं सम्बोध्यं स्वयंभूरिति च ॥' श्रुति भी कहती है—वही ज्ञाता, वही ज्ञान, वही मन्त्रात्मा है अतः मन्त्र भी शिव- रूप ही है । 'स एव ज्ञाता तज्ज्ञानमिति' । 'एवमेष एवं मन्त्रात्मा । तेषां चात एव शिवधर्मित्वं सिद्धम् ॥' अब पक्षान्तरोपन्यासभंगिमा से प्रकरणारंभ करते हुए स्वस्वभाव शिव के विश्वाभिव्यक्तिमय शक्तिचक्रविभवन शीलत्व को उपपत्तियों एवं उपलब्धियों द्वारा प्रतिपादित किया जा रहा है । इस प्रकरण का सम्बन्ध इस कारिका से है— 'यस्य इति वा संवित्तिः स जीवन्मुक्तः ॥' यस्य = जिस साधकोत्तम का । संवित्तिः = सम्यक् ज्ञान । सततम् = निरन्तर, अव्यवधानपूर्वक सभी अवस्थाओं में । युक्तः = समाहित । स्वभावबल परिशीलन से अप्रमत्त एवं एकाग्रचित्त । स जीवन्म् = नियतदेहाधिकरणों एवं प्राणों को धारण करते हुए भी मुक्तः = सर्वव्यापक सर्वात्मक, सर्वेश्वर, स्वतन्त्र, स्वस्वभावाहङ्कारी, जन्ममरणादि के चक्र से निष्क्रान्त परमेश्वर । न संशयो = भ्रान्ति या सन्देह नहीं है । क्या करते हुए जीवन्मुक्त? अखिलं = अशेष-अनन्त-वस्तु-व्यक्ति-विचित्र विश्व को स्वनिर्मित चराचर को क्रीडनक मानते हुए और सृष्टि को लीला मात्र समझते हुए विभावित करते हुए । इस प्रकार विश्व को अपनी क्रीड़ा के रूप में देखते हुए एवं जीते हुए मुक्त जीवन्मुक्त है । टीकाकार पूछता है? 'कथं यस्य संवित्ति?' उसी के उत्तर स्वरूप— उन्तीसवाँ श्लोक कहा गया है— 'तेन शब्दार्थचिन्तासु .... संस्थितः ॥' तेन = वक्ष्यमाण कारण से । तेन वक्ष्यमाणहेतुना 'शब्दार्थचिन्तासु सा अवस्थैव नास्ति या न शिवः'—इति यस्य संवित्तिः स जीवन्मुक्त इति ।'

द्वितीयः निष्यन्दः २८१ शब्द = अर्थप्रत्यायक पदसमूह । अर्थो = जात्यादिभेद से बहुविध अभिधेय वस्तुजात । चिन्ता = उसकी चिन्ता उस-उस प्रकार की विकल्पना । अनन्त चिन्तनीय वस्तुओं के प्रति अपने उपराग से विचित्र ज्ञान से युक्त व्यवहारों से सम्बद्ध शब्द एवं अर्थों में उत्पन्न चिन्ताओं में । सा अवस्था—वह दशा । (वह दशा कोई नहीं है न तो शब्द रूपा चिन्ता और न तो अर्थरूपा चिन्ता जो कि साक्षात् शिव न हो ।) भोक्तैव = अनुभविता ही, ईश्वर ही । सदा = नित्य । सर्वत्र = समस्त अवस्थाओं में । भोग्यभावेन = अनुभवनीयवत् स्वात्मा द्वारा । स्थितेः = अवस्थित है । (भोग्य पदार्थ कोई भिन्न पदार्थ नहीं हैं ।) चूँकि तत्त्वों के अनवमर्शमात्र से भोक्तृभोग्य विभाजन रूप द्वैत विजृंभित (प्रकटीभूत) हुआ है । ऐसा क्यों कहा गया? इसलिए कि—‘न सावस्था न या शिवः ॥’ यस्मात् जीवः = जिससे कि आत्मा । सर्वमयः = विश्वरूप ॥ परस्पर व्यतिरिक्त (भिन्न) प्रतिपत्ति (उपलब्धि) । जीव का जो व्यवहार है वह भी वेद्य-वेदकाभेदपूर्वक ही उपपन्न है । लेकिन यह कहाँ से?—इसके उत्तर में ग्रन्थकार कहता है—‘तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपातिप्रतिपत्तितः सर्वभावसमुद्भावात् सर्वमयो जीवः ।’ —उस किसी संवेद्य का (घट, सुख-दुःखादिक का) जो संवेदन या ज्ञान होता है उसका जो ‘रूप’ (स्वभाव) है उसके कारण—‘तादात्म्य प्रतिपत्ति’ (अभेदसंवित्) होती है और इसके कारण जो ‘सर्वभावसमुद्भव’ (समस्त भावो की उत्पत्ति) है उसके निर्वर्तमान हो जाने के कारण जीव सर्वमय हो जाता है । यह आत्मा अपने विषय को जानकर ही उनका समुद्भव (सृजन करती है अन्यथा नहीं क्योंकि संवेद्यमान वस्तु ही रूप प्राप्त कर सकती है असंवेद्यमान वस्तु नहीं । संवेद्यमानता क्या है? यह है उन-उन रूपों द्वारा प्रकाशमानता । प्रकाशमानता क्या है? प्रकाशमानता है—प्रकाश से अव्यतिरिक्तता । इसीलिए न्यायवादी भी कहता है—चेतना- च्चापि वेद्यत्वादतद्रूपाप्रवेदनात् ॥’) इस प्रकार यह जीव जिस-जिस वस्तु को जानता है वह उसका शरीर ही बन जाता है । संवेद्यमानता सामान्यतः द्विविध प्रकारी है—(१) ‘भूतात्मक’ (२) ‘भावात्मक’। (१) भूतात्मक संवेद्यमानता—माया शक्ति के वैभव से विस्मारित तात्विकस्वभाव वाला होने के कारण वस्तु संवेदनावसर पर स्वरूप के अपरामर्शत्व के कारण मुकुलित सामर्थ्य वाला होकर यह जीव अविच्छिन्न अहंकार का आस्पद बन कर शिर-पाणि आदि शरीरांगों से युक्त शरीर को अपना स्वरूप समझने लगता है और यह जन्ममरणादि के चक्र में फँस जाने से इसकी भूतात्मक संवेद्यमानता हुआ करती है ।

२८२ स्पन्दकारिका (२) भावात्मक संवेद्यमानता—जब यह जीव शब्दादि विषयों को अपने से व्यतिरिक्त मानकर उनका स्वभिन्न वेद्य पदार्थ समझकर उनका परामर्श करता है तब उसकी वह संवेद्यमानता भावात्मक कही जाती है। इस प्रकार जीव संवेद्यमानता लक्षण वाले भावसंसर्ग की अवस्था में संवेद्यवस्तु से अव्यतिरिक्त होने के कारण सर्वमय, विश्वरूप होने पर भी वस्तु संवेदन तत्त्व परामर्श के उन्मिषित न होने के कारण सभी को आत्मा से व्यतिरिक्त कारणान्तरलब्धात्मक मानकर और सभी आत्माओं को अपने से भिन्न मानकर और अपनी आत्मा को देहादि अनित्य एवं अनात्म वेद्य में अहंबुद्धि स्थापित करके जन्ममरणादिक आवागमन के चक्र में फँसकर संसारी जीव कहलाने लगता है। किन्तु जब शिव रूपी सूर्य की शक्ति रूपी रश्मि के शक्तिपात से उत्पन्न प्रबोध से उन्मिषित विशद् दृष्टि वाला होकर स्फुटतर प्रकाश से प्रकाशित होकर अपने को अनित्य देहादिक से मुक्त होकर सत्यात्मस्वभाव में स्थित हुआ देखता है और जब यथावस्थित वस्तु संवेदन का यथार्थ परामर्श करता है तब वह संकल्पमात्रविलिखित-विचित्र-विश्वाभिव्यक्तिमय शक्तिचक्र वाला शिव बन जाता है। इसीलिए कहा गया है कि 'तत्संवेदनरूपेण तादात्म्याप्रतिपत्तिः' उन उन वस्तुओं के संवेदन स्वभाव के बल से जो तादात्म्य प्रतिपत्ति (संवेद्यमानवस्तु के साथ अभेद संवित्ति) होती है उससे समस्त भावों की उत्पत्ति होती है अतः तब जीव सर्वमय बन जाता है। उससे उसकी सर्वमयत्वप्रतिपत्ति के कारण ऐसी कोई अवस्था है ही नहीं जो कि शिव नहीं होती। 'सा अवस्था नास्ति या शिवमयी न भवति ॥' ऐसी स्थिति में भोक्ता ही ईश्वर बनकर भोग्यभाव से ईशितव्य वस्तु रूप में सदा सर्वत्र संस्थित रहता है। जिसकी ऐसी संवित्ति है वही 'जीवन्मुक्त' कहा जाता है। आत्मा ही विश्वरूप में स्थित है—'आत्मन एव विश्वरूपत्वेन स्थितिः ।' विश्वप्रपञ्च का कोई निमित्तान्तर नहीं है। ब्रह्मवादियों ने कहा भी है— 'कल्पयत्यात्म-नात्मानमात्मा देवः स्वमायया । स एव बुद्ध्यते भेदादिति वेदान्तनिश्चयः ॥ अन्य विद्वानों ने भी कहा है— विविधैरुपाधिभिरवस्थितैर्बहिः, स्फटिकादिवत्तव विचित्रतोच्यताम् । यदि ते कदाचन कथञ्चन क्वचिद्भवितुं क्षमास्त्वदवभासतः पृथक् ॥ परमाणु पाकपरिणाम विभ्रमा, द्युत वा विवर्त इति विश्वमिष्यताम् । विबुधोत्तमैर्यदिह तद्विकल्पना- स्तव शक्तिरेव न तथोपपादयेत् ॥ तदिहापि च प्रतिनिमेषमुन्मिष- त्रिमिषषद्विकल्पविविधाशु मण्डलः ।

द्वितीयः निष्यन्दः २८३ अथ चाति शुद्धवपुरद्भुतैकभूः, स्फुरसि त्वमेव शिव चिन्मयो मणिः ॥ इसे विवृति में पृथक्-पृथक् रूप से व्याख्यात किया गया है— ‘सर्वात्मक एवायमात्मा’ आदि द्वारा, ‘तेनतथाविधेन’—आदि द्वारा एवं—‘एवं स्वभावे यस्य’ आदि ग्रन्थों के द्वारा व्याख्यात किया गया है। १ पशुप्रमाता जीव सर्वमय है क्योंकि (वह भी पति प्रमाता शिव की भाँति) यह भी समस्तभावों (घटपदादिक भावों) के साथ संवेदनात्मक तदात्मकता रखने के कारण उनका सृजन करता रहता है ॥ २८ ॥ भट्टकल्लट कहते हैं—यह जीवात्मा सर्वात्मक है क्योंकि यह व्यक्तिगत संवेदन के माध्यम से विश्व के भावों (पदार्थों) का सृजन करता रहता है जो भी पदार्थ उसके अनुभव में आता है वही उसके संवेदन का आलम्बन बन जाता है । यह पशुप्रमाता (जीवात्मा) जिस किसी भी वस्तु का संवेदन (अनुभव) करता है उसको आत्मीकृत करके उसे अपने शरीर के रूप में स्वीकार कर लेता है । परिणामस्वरूप इस पशुप्रमाता का यह शिर हाथ आदि अंगों से युक्त शरीर ही उसका एक मात्र शरीर नहीं रह जाता प्रत्युत् संवेदन में आने वाले प्रत्येक पदार्थ उसके शरीरांग बन जाते हैं— ‘सर्वात्मक एवायमात्मा सर्वानुभावोत्पत्तिद्वारेण अनुभूयमानस्यैव संवेदनात् बाह्यार्थमनुभूयमानमेव शरीरत्वेन गृह्णाति, न तु शिर पांण्यादिलक्षितम् एकमेवास्य शरीरम् २ ॥ २८ ॥ वाचकवाच्यात्मक वस्तुओं की संवेदनाओं (अनुभवों) की ऐसी कोई भी अवस्था नहीं है जो शिवस्वरूप न हो । प्रत्येक स्थान पर भोक्ता (आत्मा) ही भोग्य (पदार्थ = प्रमेय) के रूप में अवस्थित है । भट्टकल्लट कहते हैं कि चूँकि आत्मा सर्वमयस्वभाव है अतः शब्दों एवं अर्थों से सम्बद्ध ऐसी कोई अवस्था नहीं है जोकि शिवात्मक स्वभाव को व्यक्त न करती हो अर्थात् जो शिव न हो । प्रत्येक स्थान में यह भोक्तारूप वेदकसत्ता आत्मा ही भोग्य पदार्थों (वेद्य पदार्थ) के रूप में अवभासित एवं उल्लसित हो रही है । भोग्य (संवेद्य = प्रमेय) पदार्थ भोक्ता (संवेदक = चेतन प्रमाता) से पृथक् नहीं है ॥ २९ ॥ ‘तेन तथाविधेन सर्वात्मकेन स्वभावेन, शब्दार्थयोः चिन्तासु न सा अवस्था या शिवस्वभावं न व्यञ्जयति, अतो भोक्तैव हि भोग्यभावेन सर्वत्रावस्थितो, न त्वन्यत भोग्यमस्ति ॥ २९ ॥ (‘ऐसी कोई अवस्था नहीं है जो शिवस्वरूप न हो’ तथा ‘समस्त प्रमेय मुझ प्रमाता का ही शरीर है’—) इस प्रकार का, जिस योगी का, संवेदन हो वह निःशेष जगत् को अपनी आनन्दात्मिका क्रीड़ा के रूप में देखता हुआ, अपने सत्स्वरूप के साथ एकाकार हो जाता है अतः वह योगी निःसंशय जीवन्मुक्त है । १. रामकण्ठाचार्यः ‘स्पन्दकारिकाविवृति’। २. स्पन्दसर्वस्व ।

२८४ स्पन्दकारिका भट्टकल्लट कहते हैं—जिस योगी का यह विश्वात्मक स्वभाव हो अर्थात्—'यह समस्त जगत् मन्मय है'—वह समस्त जगत् को अपनी क्रीड़ा के रूप में देखते रहने तथा नित्ययुक्त (अपने चिरन्तन आत्मस्वभाव से अपृथक्) रहने के कारण जीवित रहता हुआ भी ईश्वर के समान मुक्त रहता है तथा उसकी शरीरादिक वस्तुओं पर कोई भी (प्रतिबन्धात्मक, आवरणात्मक मायात्मक) बन्धन नहीं रहता (अर्थात् सारे बन्धनों से मुक्त रहता है) ।¹ जीवन्मुक्ति का स्वरूप— इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ ३० ॥ जिसका (जिस योगी का) ऐसा संवेदन हो कि समस्त विश्व मेरी क्रीडा है—वह संपूर्ण विश्व को अपनी क्रीडा के रूप में देखता हुआ चारों ओर से (सभी जागतिक भावों के साथ) युक्त (समस्त पदार्थों के साथ तद्रूपतावश उनसे एकाकार) होता हुआ 'जीवन्मुक्त' (कहलाता) है—इसमें कोई शंका नहीं है ॥ ३० ॥

  • सरोजिनी * इस कारिका में आत्मा की विश्व के साथ अभेदात्मकता एवं 'विश्वोऽहं' के विमर्श में 'जीवन्मुक्तित्व' का प्रतिपादन किया गया है । परमात्मा तो विश्ववपु है ही किन्तु मितात्मा भी विश्ववपु है । परमात्मा तो अपनी अखण्ड स्पन्दात्मिका विमर्श शक्ति के द्वारा अनन्त प्रमाता-प्रमेयों, वेदक-वेद्यों से पूर्ण जगत् को अस्तित्व प्रदान करके उन्हें अपने शरीर के रूप में धारण करता है किन्तु मितात्मा (पशु) अपने संवेदनों के द्वारा प्रत्येक भूतात्मक एवं भावात्मक पदार्थ की सृष्टि करके उन्हें अपने शरीर के रूप में ग्रहण करके अवस्थित रहता है अतः वह भी ईश्वरवत् है । संवित्ति = ज्ञान । संवेदन । अखिल = समग्र । वा = 'वा' शब्द का प्रयोग स्वार्थ में है । वा = किं बहुना ॥ कहाँ तक कहें? इति = इस प्रकार (उक्त प्रकार रूप) । क्रीडात्वेन = क्रीडाराम, खेलने का बगीचा । 'खेलने के बगीचे के रूप में ।।' पश्यन् = विभावयन् । विभावित करता हुआ । जीवन्मुक्ति = जीते हुए भी ईश्वरवत् मुक्त ।² जीवन्मुक्ति और उसका स्वरूप— स्पन्दशास्त्र में मुक्ति का स्वरूप = 'जीवन्मुक्ति'—बहुत कहाँ तक कहें? जिसको इस प्रकार की 'संवित्ति' (ज्ञान) हो गया है कि समस्त दृश्यमान जगत् मेरा ही स्वरूप है—मन्मय है वह समग्र जगत् को अपने खेल के बगीचे के रूप में देखता है क्योंकि वह नित्ययुक्त एवं नित्यमुक्त है । बन्धन के कारण अज्ञान के नष्ट हो जाने पर एवं प्रबोध की १. स्पन्दसर्वस्व । २. स्पन्दप्रदीपिका ।

द्वितीयः निष्यन्दः २८५ प्राप्ति हो जाने से वह साधक जीवितावस्था में ही ईश्वरवत् मुक्त है। आत्मबोध में सम्यक् विश्रान्ति हो जाने पर जो अलुप्तानुभव है रूप में स्थित है वह तत्त्ववित् विषयोपभोग करता हुआ भी जीवन्मुक्त रहता है— ‘सम्यक् स्वबोधविश्रान्तौ योऽलुप्तानुभवः स्थितः । विषयानपि सोऽश्नन् स्याज्जीवन्मुक्तस्तु तत्त्ववित् ॥’१ जिन लोगों की यह मान्यता है कि उत्क्रान्ति के बिना मोक्ष नहीं होता उनका पक्ष असमीचीन है क्योंकि—‘यदि स्वभाव का अनुभव किये बिना ही केवल उत्क्रान्ति के बल से पुरुष को कैवल्य की प्राप्ति हो जाय तो जो मूर्ख फाँसी पर चढ़कर मरता है उसको भी मोक्ष मिल जाय’। ‘बिना स्वभावानुभवेन पुंसः कैवल्यमुत्क्रान्तिबलाद्यदि स्यात् । अत्राऽपि पक्षे ननु मोक्षभाक्त उद्बन्धनं यः कुरुते प्रमूढः ॥’ यह भी कहा गया है कि ‘गुण वासना वासित पुरुष भी प्रलयकाल में विदेह होने पर भी बद्ध ही रहते हैं। विशुद्ध ज्ञान के आश्रय से शरीरधारी भी मुक्त हो जाते हैं।’— ‘विदेहा अपि बुद्ध्यन्ते प्रलये गुणवासिताः । शरीरिणोऽपि मुच्यन्ते विशुद्धज्ञानसंश्रयात् ॥’२ ‘ज्ञानगर्भ’ में भी कहा गया है—‘हे त्रिलोकीनाथ! जो मनुष्य आपकी उपासना करके किल्बिष रूप उपद्रवों का नाश कर चुके हैं उन्हें बहुत शीघ्र ही अद्वैत भावना के आवेश से यह अनुभव प्राप्त हो जाता है कि मुझमें ही यह भावना के आवेश से यह अनुभव प्राप्त हो जाता है कि मुझमें ही यह समस्त जगत् स्थित है। मैं ही सब हूँ एवं मैं ही सर्वत्र हूँ।’ यह संवित् किस स्वरूप का है?—इसी अभिप्राय से कहा गया है— ‘तेन शब्दार्थचिन्तासु न साऽवस्था न यः शिवः । भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥’ —जिसकी इस प्रकार की संवित्ति है वह ‘जीवन्मुक्त’ है।३ अर्थात् शब्द चिन्तारूप एवं अर्थचिन्तारूप ऐसी कोई भी अवस्था नहीं है जो शिव न हो—यही संवित्ति ‘जीवन्मुक्ति’ है। जीवन्मुक्त कौन है? ‘Who possess this sort of recognition or he who regards this whole universe as a play and is always united, is beyond doubt liberated in life’. वा—यह शब्द प्रथम निष्यन्दोक्त निमीलन समाधि को विकल्पित करते हुए उसकी समापत्ति की दुर्लभता को ध्वनित करता है। अतः उसका यह अर्थ है—इस प्रकार की संवित्ति दुर्लभा है। इसका ज्ञान केवल उसको होता है जो जन्म-मरण के चक्र से निर्मुक्त है। १-२. स्पन्दप्रदीपिका। ३. रामकण्ठाचार्य (स्पन्दकारिकाविवृति)।

२८६ स्पन्दकारिका वा—'प्रथम अध्याय में प्रयुक्त (Involutive meditation) (निमीलन समाधि) ऐच्छिक बताने के लिए 'वा' प्रयुक्त हुआ है । ब्रह्माण्ड के साथ अपनी अभिन्नता या तादात्म्यभाव आवश्यक तो है किन्तु है कठिन । अतः उसका अर्थ इस प्रकार होगा—इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा या अवबोध (Recognition) केवल उस व्यक्ति को प्राप्त होता है जिसके कोई आगामी जन्म नहीं होते । जो अपुनर्भवता । जन्ममरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त कर लेता है वह संपूर्ण जगत् को क्रीड़ा के रूप में देखता है या वह चैतन्य के विकास के द्वारा विश्व की रचना करता है एवं संहार करता है तथा सतत् रूप से एकीकृत (United) है जैसे कि एक योगी होता है—'वे जो कि सदा एकात्म्यभाव से मुझ में ध्यान लगाकर मेरी अर्चना करते हैं'—(मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।। (गीता १२।२) अर्थात्—ऐसे योगी जगत् को खेल समझते हुए अपने संवित् के उन्मेष एवं निमेष द्वारा सृजन एवं संहार करते हुए नित्य उपासना करते हैं— 'अखिल जगत् क्रीड़ात्वेन पश्यन् निज संविदुन्मेषनिमेषाभ्यां सृजन् संहरन् नित्ययुक्ता उपासते ।।' ऐसा व्यक्ति जीवितावस्था में ही सारे बन्धनों को भस्मसात् कर देता है? कैसे करता है? ज्ञानाग्नि के द्वारा । वह भौतिक शरीर के पञ्चत्व प्राप्त करने पर शिव बन जाता है । वह जीवित रहकर भी कभी बन्धनग्रस्त (Feltered) नहीं होता ।। 'सततं समाविष्टो महायोगी जीवन्नेव प्राणादिमानापि विज्ञानाग्नि-निर्दग्ध-अशेषबन्ध्नो देहपाते तु शिव एव । जीवश्चेन्जीवन्मुक्तः । न तु कथञ्चित् बद्धः ।।' दीक्षा एवं मुक्ति—‘दीक्षादिना गुरुप्रत्ययो मुक्तिः' 'ईदृशात्तु ज्ञानात्समाचाराद्वा स्वप्रत्ययतो एव मुक्ति:'—योगी दीक्षा एवं गुरु की शक्तिपात की शक्ति पाकर मुक्त हो जाता है—'महासमापत्ति' प्राप्त कर लेता है ।'१ आत्म संवित् के मुख्यतः दो भाव हैं—(१) पशुभाव (२) पतिभाव ये भावद्वय ही आत्मा के द्विविध आसन हैं । यह चैतन्य सत्ता चाहे पशुभाव में अवस्थित हो या पतिभाव में किन्तु है तो वेदक ही । विश्व वेद्य है । वेद्य सत्ताओं की सत्ता का अधिष्ठान तो वेदक सत्ता ही है । 'यावन्न वेदका एते तावद्वेद्याः कथं प्रिये? वेदकं वेद्यमेकं तु ।।' भट्टकल्लट कहते हैं इस दृष्टि से तो मुख, हस्त, चरण आदि अंगों से युक्त पाञ्चभौतिक शरीर ही 'पशु' का शरीर नहीं है प्रत्युत् प्रत्येक वेद्य पदार्थ के संपर्क में आने पर या उसका संवेदन करने पर यह पशुप्रमाता उन वेद्य्रों में संवेदन के साथ अनुप्रविष्ट भी होता है अतः उनमें संवेदन द्वारा प्रविष्ट होने के कारण वे समस्त वेद्य पदार्थ भी उसके शरीर हैं और इसी कारण उनमें 'ममायं' की भावना एवं रागानुग समापत्ति हुआ करती है—तादात्म्य हुआ करता है । जीवात्मा (पशुप्रमाता, मितात्मा) भी विश्वशरीरी है । १. आचार्य क्षेमराजः 'स्पन्दनिर्णय' ।

द्वितीयः निष्यन्दः २८७ शिवसूत्र एवं स्पन्दशास्त्र - एक तुलना- (१) शुद्धविद्योदयाच्चक्रेशत्वसिद्धिः ॥ (१।२१) (२) विद्यासमुत्थाने स्वाभाविके खेचरी शिवावस्था (२।१५) (३) कलादीनां तत्त्वानांमविवेको माया (३।३) (४) धीवशात्सत्वसिद्धिः (३।१२) विद्याविनाशे जन्मविनाशः (३।१८) (५) कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः । (३।१९) (६) मात्रास्वप्रत्ययसंधानेनष्टस्य पुनरुत्थानम् । (३।२४) (७) शिवतुल्यो जायते । (३।२५) (८) भेदतिरस्कारे सर्गान्तरकर्मत्वम् (३।३६) (९) भूतकञ्चुकी तदा विमुक्तो भूयः पतिसमः परः । (३।४२) तदारूढप्रमितेस्तत्क्ष- याज्जीवसंक्षयः ॥ ४१ ॥ इसी कारिका में शक्ति के दो रूपों का परिचय दिया गया है जो निम्नांकित है- (१) भोग्य रूप- बन्धन (२) 'सर्वं शक्तिमयं जगत्' 'शक्तयोऽस्य जगत् कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः'- मानकर शक्ति का उपास्य रूप ग्रहण करके उसकी उपासना- मुक्ति ॥ 'बन्धयित्री' बन्धन प्रदान करने वाली । 'बन्धन' क्या है? क्षेमराज के कथनानुसार (१) शिवाभेदाख्यात्यात्मका ज्ञानस्वभावो अपूर्णमन्यतात्मकाणवमलसतत्त्वसंकुचितज्ञानात्मा बन्धः ॥ (२) आत्मनि अनात्मताभिमानरूपाख्यातिलक्षणाज्ञानात्मकं ज्ञानं केवलं बन्धो । (३) अनात्मनि शरीरादौ आत्मताभिमानात्मकम् अज्ञानमूलं ज्ञानमपि बन्ध एव ॥ (४) 'ज्ञानं बन्धः (शिवसूत्र १।२) (५) मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् ॥ स्वातन्त्र्य हानिर्बोधस्य स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता । द्विधाणवं मलमिदं स्वस्वरूपापहानितः ॥ अर्थात् आत्म तत्त्व में अनात्म तत्त्व का एवं अनात्म तत्त्व में आत्म तत्त्व की प्रतीति ही बन्ध है । मल या अज्ञान ही इस बन्धन रूप संसार का अंकुर है । 'क्रियाशक्ति' बन्धन एवं मोक्ष दोनों का कारण है । इस सिद्धान्त में जीवन्मुक्ति ही मुक्ति है । कहीं अन्यत्र जाने का नाम मोक्ष नहीं प्रत्युत् अज्ञानग्रंथि का उद्भेद ही मोक्ष है- नान्यत्र गमनं स्थानं मोक्षोस्ति सुरसुन्दरि । अज्ञानग्रंथिभेदो यः स मोक्ष इति उच्यते ॥ विशेष- त्रिकदर्शन में योगसाधना एवं कुण्डलिनी योग मान्य है अतः 'स्वमार्गस्था' का यौगिक अर्थ भी लिया जा सकता है । मूलाधार में अवस्थित कुल- कुण्डलिनी (शिव कला) ब्रह्ममार्ग के द्वार पर फण रखकर सो रही है । जब तक वह जागकर स्वमार्ग (अपने पति परमशिव के पास पहुँचने के मार्ग) (सुषुम्णा मार्ग) का