भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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द्वितीयः निष्यन्दः २८७ शिवसूत्र एवं स्पन्दशास्त्र - एक तुलना- (१) शुद्धविद्योदयाच्चक्रेशत्वसिद्धिः ॥ (१।२१) (२) विद्यासमुत्थाने स्वाभाविके खेचरी शिवावस्था (२।१५) (३) कलादीनां तत्त्वानांमविवेको माया (३।३) (४) धीवशात्सत्वसिद्धिः (३।१२) विद्याविनाशे जन्मविनाशः (३।१८) (५) कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः । (३।१९) (६) मात्रास्वप्रत्ययसंधानेनष्टस्य पुनरुत्थानम् । (३।२४) (७) शिवतुल्यो जायते । (३।२५) (८) भेदतिरस्कारे सर्गान्तरकर्मत्वम् (३।३६) (९) भूतकञ्चुकी तदा विमुक्तो भूयः पतिसमः परः । (३।४२) तदारूढप्रमितेस्तत्क्ष- याज्जीवसंक्षयः ॥ ४१ ॥ इसी कारिका में शक्ति के दो रूपों का परिचय दिया गया है जो निम्नांकित है- (१) भोग्य रूप- बन्धन (२) 'सर्वं शक्तिमयं जगत्' 'शक्तयोऽस्य जगत् कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः'- मानकर शक्ति का उपास्य रूप ग्रहण करके उसकी उपासना- मुक्ति ॥ 'बन्धयित्री' बन्धन प्रदान करने वाली । 'बन्धन' क्या है? क्षेमराज के कथनानुसार (१) शिवाभेदाख्यात्यात्मका ज्ञानस्वभावो अपूर्णमन्यतात्मकाणवमलसतत्त्वसंकुचितज्ञानात्मा बन्धः ॥ (२) आत्मनि अनात्मताभिमानरूपाख्यातिलक्षणाज्ञानात्मकं ज्ञानं केवलं बन्धो । (३) अनात्मनि शरीरादौ आत्मताभिमानात्मकम् अज्ञानमूलं ज्ञानमपि बन्ध एव ॥ (४) 'ज्ञानं बन्धः (शिवसूत्र १।२) (५) मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् ॥ स्वातन्त्र्य हानिर्बोधस्य स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता । द्विधाणवं मलमिदं स्वस्वरूपापहानितः ॥ अर्थात् आत्म तत्त्व में अनात्म तत्त्व का एवं अनात्म तत्त्व में आत्म तत्त्व की प्रतीति ही बन्ध है । मल या अज्ञान ही इस बन्धन रूप संसार का अंकुर है । 'क्रियाशक्ति' बन्धन एवं मोक्ष दोनों का कारण है । इस सिद्धान्त में जीवन्मुक्ति ही मुक्ति है । कहीं अन्यत्र जाने का नाम मोक्ष नहीं प्रत्युत् अज्ञानग्रंथि का उद्भेद ही मोक्ष है- नान्यत्र गमनं स्थानं मोक्षोस्ति सुरसुन्दरि । अज्ञानग्रंथिभेदो यः स मोक्ष इति उच्यते ॥ विशेष- त्रिकदर्शन में योगसाधना एवं कुण्डलिनी योग मान्य है अतः 'स्वमार्गस्था' का यौगिक अर्थ भी लिया जा सकता है । मूलाधार में अवस्थित कुल- कुण्डलिनी (शिव कला) ब्रह्ममार्ग के द्वार पर फण रखकर सो रही है । जब तक वह जागकर स्वमार्ग (अपने पति परमशिव के पास पहुँचने के मार्ग) (सुषुम्णा मार्ग) का

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