भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 387

२८६ स्पन्दकारिका वा—'प्रथम अध्याय में प्रयुक्त (Involutive meditation) (निमीलन समाधि) ऐच्छिक बताने के लिए 'वा' प्रयुक्त हुआ है । ब्रह्माण्ड के साथ अपनी अभिन्नता या तादात्म्यभाव आवश्यक तो है किन्तु है कठिन । अतः उसका अर्थ इस प्रकार होगा—इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा या अवबोध (Recognition) केवल उस व्यक्ति को प्राप्त होता है जिसके कोई आगामी जन्म नहीं होते । जो अपुनर्भवता । जन्ममरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त कर लेता है वह संपूर्ण जगत् को क्रीड़ा के रूप में देखता है या वह चैतन्य के विकास के द्वारा विश्व की रचना करता है एवं संहार करता है तथा सतत् रूप से एकीकृत (United) है जैसे कि एक योगी होता है—'वे जो कि सदा एकात्म्यभाव से मुझ में ध्यान लगाकर मेरी अर्चना करते हैं'—(मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।। (गीता १२।२) अर्थात्—ऐसे योगी जगत् को खेल समझते हुए अपने संवित् के उन्मेष एवं निमेष द्वारा सृजन एवं संहार करते हुए नित्य उपासना करते हैं— 'अखिल जगत् क्रीड़ात्वेन पश्यन् निज संविदुन्मेषनिमेषाभ्यां सृजन् संहरन् नित्ययुक्ता उपासते ।।' ऐसा व्यक्ति जीवितावस्था में ही सारे बन्धनों को भस्मसात् कर देता है? कैसे करता है? ज्ञानाग्नि के द्वारा । वह भौतिक शरीर के पञ्चत्व प्राप्त करने पर शिव बन जाता है । वह जीवित रहकर भी कभी बन्धनग्रस्त (Feltered) नहीं होता ।। 'सततं समाविष्टो महायोगी जीवन्नेव प्राणादिमानापि विज्ञानाग्नि-निर्दग्ध-अशेषबन्ध्नो देहपाते तु शिव एव । जीवश्चेन्जीवन्मुक्तः । न तु कथञ्चित् बद्धः ।।' दीक्षा एवं मुक्ति—‘दीक्षादिना गुरुप्रत्ययो मुक्तिः' 'ईदृशात्तु ज्ञानात्समाचाराद्वा स्वप्रत्ययतो एव मुक्ति:'—योगी दीक्षा एवं गुरु की शक्तिपात की शक्ति पाकर मुक्त हो जाता है—'महासमापत्ति' प्राप्त कर लेता है ।'१ आत्म संवित् के मुख्यतः दो भाव हैं—(१) पशुभाव (२) पतिभाव ये भावद्वय ही आत्मा के द्विविध आसन हैं । यह चैतन्य सत्ता चाहे पशुभाव में अवस्थित हो या पतिभाव में किन्तु है तो वेदक ही । विश्व वेद्य है । वेद्य सत्ताओं की सत्ता का अधिष्ठान तो वेदक सत्ता ही है । 'यावन्न वेदका एते तावद्वेद्याः कथं प्रिये? वेदकं वेद्यमेकं तु ।।' भट्टकल्लट कहते हैं इस दृष्टि से तो मुख, हस्त, चरण आदि अंगों से युक्त पाञ्चभौतिक शरीर ही 'पशु' का शरीर नहीं है प्रत्युत् प्रत्येक वेद्य पदार्थ के संपर्क में आने पर या उसका संवेदन करने पर यह पशुप्रमाता उन वेद्य्रों में संवेदन के साथ अनुप्रविष्ट भी होता है अतः उनमें संवेदन द्वारा प्रविष्ट होने के कारण वे समस्त वेद्य पदार्थ भी उसके शरीर हैं और इसी कारण उनमें 'ममायं' की भावना एवं रागानुग समापत्ति हुआ करती है—तादात्म्य हुआ करता है । जीवात्मा (पशुप्रमाता, मितात्मा) भी विश्वशरीरी है । १. आचार्य क्षेमराजः 'स्पन्दनिर्णय' ।