स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७८ स्पन्दकारिका है। अन्तस्थ भावों को जो स्वामी है, वही उन्हें प्रकाशित करता है, बिना उसकी इच्छा, अमर्श स्वल्प भी प्रवृत्त नहीं हो सकते— चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद् बहिः। योगीव निरुपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ॥ स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य भावजातस्य भासनम्। अस्त्येव न विना तस्मादिच्छामर्शः प्रवर्तते ॥ इसके अतिरिक्त—'जो कुछ बाहर दिखाई पड़ रहा है वह सब तुम्हारे ही भीतर है आँख बन्द करके जैसे सब कुछ भीतर देखा जा सकता है वैसे ही यह समस्त प्रपंच है— 'यत्किंचदाभाति बहिस्तदीश नूनं तवास्त्येव समस्तमन्तः। निमीलिताक्षा हृदि लक्षयेयुस्तथैव सर्वं कथमन्थया ॥' इस प्रकार 'स्वभाव' ही सर्वरूप में स्थित है। इस सर्वात्मक स्वभाव के कारण शब्द और अर्थ की चिन्ता करने पर ऐसी कोई अवस्था नहीं मिलती जो शिवस्वभाव को प्रकट नहीं करती हो—अर्थात् चित्स्वरूप न हो। संविद् में सब एक है उसी में सभी का अस्तित्व स्थित है। कहा भी गया है— 'जिन-जिन कारणों से भाव-नदियाँ पृथक्-पृथक् प्रवाहित होती हैं। उन्हीं-उन्हीं कारणों से बोध-समुद्र में एक हो जाती हैं'— 'येन येन विभिद्यन्ते हेतुना भावनिम्नगाः। तेन तेनैक्यमायान्ति बोधोदधिसमागताः ॥' ग्रन्थकार ने पहले ही कहा है कि—शारीरिक, शाब्दिक या मानसिक ऐसा कोई व्यवहार नहीं है जिसके प्रारंभ में आप विराजमान न हों। अतः ठीक ही कहा गया है कि संविदात्मा भोक्ता अर्थात् अनुभविता ही भोग्य भाव से अनुभाव्य के रूप में सर्वदा और सर्वत्र स्थित हैं। उससे पृथक् भोग्य नाम का कोई पदार्थ नहीं है।१ श्रुति कहती है—मैं अन्न भी हूँ और भोक्ता भी हूँ—'अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्। अहमन्नादोऽहमन्नादोऽहमन्नादः ॥'२ 'तत्त्वविचार' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—'स्वभावस्थित भाव' ही परस्पर भोक्ता और भोग्य के रूप में सम्बद्ध होते हैं। उनकी कोई पृथक् सत्ता नहीं है। 'ज्ञान' के ये ही नाम हैं—द्रष्टा, अनुभविता, स्मर्ता, ग्राहक, भोक्ता वेदक, कर्ता, उपलब्धा, संवेत्ता और ज्ञाताः—३ 'स्वस्वभावस्थिता भावाः संबध्यन्ते परस्परम्। भोग्यभोक्तृत्वभावेन न कदाचित् स्वभावतः ॥ द्रष्टाऽनुभविता स्मर्ता ग्राहको भोक्तृवेदकः। कर्तोपलब्धा संवेत्ता ज्ञातेति ज्ञानसंज्ञकाः ॥' १-३. स्पन्दप्रदीपिका।