स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 380, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः निष्यन्दः २७९ इसका अभिप्राय यह है कि ज्ञान ही ज्ञेय के रूप में चमकता है, फैलता है। कहा भी गया है कि—'आपसे भिन्न जो भाव दिखायी पड़ते हैं, वे तो अपने आत्मा ही हैं, परन्तु मुग्धतावश अन्य भोग्य के रूप में मालूम पड़ते हैं। मूर्खजन पशु के समान उसके भोग के लिए संसार में भटकते हैं। जो इन दृश्य भावों को आपके वैभव के रूप में देखते हैं वे आपके समान ही प्रभु हो जाते हैं और विश्व को अपने वश में कर सकते हैं'— ज्ञान ही ज्ञेय रूप में प्रथित हो जाता है—'ज्ञानमेव ज्ञेयरूपतया प्रथत इति' । 'भोक्तुर्विभोर्ये भवतो विभिन्नः स दृश्यते मुग्धतया स्व आत्मा । ते भोग्यभूताः पशुवत् परेषां भोगाय भूयोऽत्र भवे भ्रमन्ति ॥ भवं भवद्रै भवभूतमेव विभावयन्तो भगवन् भवेयुः । भवद्गदेव प्रभुभावभाजो विश्वं वशे वर्तयितुं समर्थाः ॥' 'ज्ञानसंबोध' में कहा गया है कि—'ज्ञान' ही तीन रूपों में स्थित है (१) 'ज्ञाता' (२) 'ज्ञेय' (३) 'ज्ञान' ।१ गीता में— 'ब्रह्मार्पणं ब्रह्महवि ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना ॥' उत्पलाचार्य कहते हैं कि—द्रष्टा ही है। अज्ञानी जन इस दृश्य को अध्यात्मरूप से नहीं देखते। शीशे में प्रतिबिम्ब के समान यह जगत् द्रष्टा और दृश्य के रूप में दो प्रकार से भासित हो रहा है। बोधानुवेध से ही घट पटादि बाह्य सद्भाव प्राप्त करते हैं अतः ज्ञानाद्वैत ही सत्य है। कहीं भी ज्ञेय की सत्ता है ही नहीं। 'ज्ञानसंबोध' की दृष्टि इस प्रकार है— 'ज्ञाता ज्ञेयं ज्ञानमिति ज्ञानस्यैव त्रिधा स्थितिः । ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविरित्यत्रोक्तं तदेव यत् ॥'२ उत्पलाचार्य की दृष्टि इस प्रकार है— 'द्रष्टैवाऽस्ति न दृश्यमेतदबुधैरध्यात्मना ज्ञायते । आदर्श प्रतिबिम्बवज्जगदिदं भिन्नं द्विधा भाति यत् ॥ सत्तां यान्ति घटादयो बहिरमी बोधानुवेधात् सदा । ज्ञानाद्वैतमतः स्वतोऽस्ति न पुनज्ञेयस्य सत्ता क्वचित् ॥'३ 'आत्मसप्तति' में कहा गया है कि—यह जो कुछ दीख रहा है वह दर्शन से भिन्न नहीं है। 'दर्शन' द्रष्टा से भिन्न नहीं है अतः द्रष्टा ही जगत् है।' 'यदिदं दृश्यते किंचिद्दर्शनात्तन्न भिद्यते । दर्शनं द्रष्टृतो नान्यद् द्रष्टैव हि ततो जगत् ॥'४ 'संकर्षण सूत्र' में भी कहा गया है कि—जिससे यह विश्व दृष्टिगत होता है, जो समस्त विश्व का द्रष्टा और जो चराचर रूप में दृश्य हो रहा है उसी का नाम है विष्णु— १-४. स्पन्दप्रदीपिका ।