भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 519 में से

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पृष्ठ 378

द्वितीयः निष्यन्दः २७७ सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी । सैषाऽऽभारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥' इस महासत्ता का रूप है अन्तःसंकल्प। उसमें शब्द एवं अर्थ-दोनों एक साथ स्फुरित होते हैं। अतः दोनों का अभेद ही प्रख्यात है। ग्रन्थकार कहते हैं—'शब्दानुवेधन के बिना प्रत्यय का उदय नहीं होता'— 'यतः शब्दानुवेधेन न बिना प्रत्ययोद्भवः ॥' 'वाक् का मूल संवित् है'। कहा भी गया है— जैसे निजात्मा संवित् से संपूर्ण जगत् अनुविद्ध है वैसे ही संवित् से सम्पूर्ण वाणी अनुबिद्ध है— 'यथा तथा जगद्विद्धं सर्वमेव निजात्मना । तथा तयाऽनुविद्धेयं सर्वतो भाति भारती ॥' योगिनाथ का कथन है कि—परतत्त्व में किसी भी वस्तु की सिद्धि के लिए वाणी को स्वीकार करना पड़ता है क्योंकि रूप के अनुसंधान से वस्तु का निश्चय होता है। उसकी उन्मुख वृत्ति से ही वस्तु के सद्भावना की कल्पना होती है। उसके बिना किसी को आत्मलाभ नहीं हो सकता क्योंकि उस अवस्था में केवल स्वरूप ज्योति रहती है। वहाँ विभाग और क्रम की अपेक्षा नहीं होती। उसका रूप योगिगम्य होता है। उसी उन्मुखता से चिन्तनमयी वाग्धारा बनती है। तदनन्तर विशिष्ट शब्द के विषय की स्फुरणात्मिका विवक्षा होती है। इसके बाद वह शब्द का रूप धारण करके अर्थ को प्रकट करती है। इसलिए संवित्प्रसूत वाणी के बिना किसी अर्थ का अवधारण नहीं हो सकता।'- 'तस्मात् सर्वस्य सिद्ध्यर्थं भारती कारणं परे । परेष्वप्या तदा रूपान्वेषणार्थं निश्चयात् ॥ तस्या औन्मुख्यवृत्त्यैव सद्भावपरिकल्पनात् । नहि तामन्तरेणैषा लभेताऽऽत्मानमम्बिके ॥ सा च तस्यामवस्थायां स्वरूपज्योतिरित्यते । निर्विभागक्रमापेक्षा योगिगम्यानुरूपिणी ॥ तत औन्मुख्यतश्चिन्तामयी भवति वाक् शिवे । विशिष्टशब्दविषयविवक्षास्फुरणात्मिका ॥ ततः शब्दात्मकत्वेन विवृतार्थमयी भवेत् । तदात्मतामन्तरेण यस्मान्नार्थावधारणम् ॥' इस प्रकार सर्वप्रकाशक संवित्स्वरूप की प्रभा के समान प्रकाशन शक्ति अन्तस्संकल्परूपा वाणी बनकर फिर वर्ण, पद, वाक्य को जीवन-दान करती है और पदार्थ के रूप में बाहर दीखती है। यह प्रबुद्धों के लिए स्वानुभवसिद्ध है।

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