भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 382

द्वितीयः निष्यन्दः २८१ शब्द = अर्थप्रत्यायक पदसमूह । अर्थो = जात्यादिभेद से बहुविध अभिधेय वस्तुजात । चिन्ता = उसकी चिन्ता उस-उस प्रकार की विकल्पना । अनन्त चिन्तनीय वस्तुओं के प्रति अपने उपराग से विचित्र ज्ञान से युक्त व्यवहारों से सम्बद्ध शब्द एवं अर्थों में उत्पन्न चिन्ताओं में । सा अवस्था—वह दशा । (वह दशा कोई नहीं है न तो शब्द रूपा चिन्ता और न तो अर्थरूपा चिन्ता जो कि साक्षात् शिव न हो ।) भोक्तैव = अनुभविता ही, ईश्वर ही । सदा = नित्य । सर्वत्र = समस्त अवस्थाओं में । भोग्यभावेन = अनुभवनीयवत् स्वात्मा द्वारा । स्थितेः = अवस्थित है । (भोग्य पदार्थ कोई भिन्न पदार्थ नहीं हैं ।) चूँकि तत्त्वों के अनवमर्शमात्र से भोक्तृभोग्य विभाजन रूप द्वैत विजृंभित (प्रकटीभूत) हुआ है । ऐसा क्यों कहा गया? इसलिए कि—‘न सावस्था न या शिवः ॥’ यस्मात् जीवः = जिससे कि आत्मा । सर्वमयः = विश्वरूप ॥ परस्पर व्यतिरिक्त (भिन्न) प्रतिपत्ति (उपलब्धि) । जीव का जो व्यवहार है वह भी वेद्य-वेदकाभेदपूर्वक ही उपपन्न है । लेकिन यह कहाँ से?—इसके उत्तर में ग्रन्थकार कहता है—‘तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपातिप्रतिपत्तितः सर्वभावसमुद्भावात् सर्वमयो जीवः ।’ —उस किसी संवेद्य का (घट, सुख-दुःखादिक का) जो संवेदन या ज्ञान होता है उसका जो ‘रूप’ (स्वभाव) है उसके कारण—‘तादात्म्य प्रतिपत्ति’ (अभेदसंवित्) होती है और इसके कारण जो ‘सर्वभावसमुद्भव’ (समस्त भावो की उत्पत्ति) है उसके निर्वर्तमान हो जाने के कारण जीव सर्वमय हो जाता है । यह आत्मा अपने विषय को जानकर ही उनका समुद्भव (सृजन करती है अन्यथा नहीं क्योंकि संवेद्यमान वस्तु ही रूप प्राप्त कर सकती है असंवेद्यमान वस्तु नहीं । संवेद्यमानता क्या है? यह है उन-उन रूपों द्वारा प्रकाशमानता । प्रकाशमानता क्या है? प्रकाशमानता है—प्रकाश से अव्यतिरिक्तता । इसीलिए न्यायवादी भी कहता है—चेतना- च्चापि वेद्यत्वादतद्रूपाप्रवेदनात् ॥’) इस प्रकार यह जीव जिस-जिस वस्तु को जानता है वह उसका शरीर ही बन जाता है । संवेद्यमानता सामान्यतः द्विविध प्रकारी है—(१) ‘भूतात्मक’ (२) ‘भावात्मक’। (१) भूतात्मक संवेद्यमानता—माया शक्ति के वैभव से विस्मारित तात्विकस्वभाव वाला होने के कारण वस्तु संवेदनावसर पर स्वरूप के अपरामर्शत्व के कारण मुकुलित सामर्थ्य वाला होकर यह जीव अविच्छिन्न अहंकार का आस्पद बन कर शिर-पाणि आदि शरीरांगों से युक्त शरीर को अपना स्वरूप समझने लगता है और यह जन्ममरणादि के चक्र में फँस जाने से इसकी भूतात्मक संवेद्यमानता हुआ करती है ।