स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ स्पन्दकारिका (२) भावात्मक संवेद्यमानता—जब यह जीव शब्दादि विषयों को अपने से व्यतिरिक्त मानकर उनका स्वभिन्न वेद्य पदार्थ समझकर उनका परामर्श करता है तब उसकी वह संवेद्यमानता भावात्मक कही जाती है। इस प्रकार जीव संवेद्यमानता लक्षण वाले भावसंसर्ग की अवस्था में संवेद्यवस्तु से अव्यतिरिक्त होने के कारण सर्वमय, विश्वरूप होने पर भी वस्तु संवेदन तत्त्व परामर्श के उन्मिषित न होने के कारण सभी को आत्मा से व्यतिरिक्त कारणान्तरलब्धात्मक मानकर और सभी आत्माओं को अपने से भिन्न मानकर और अपनी आत्मा को देहादि अनित्य एवं अनात्म वेद्य में अहंबुद्धि स्थापित करके जन्ममरणादिक आवागमन के चक्र में फँसकर संसारी जीव कहलाने लगता है। किन्तु जब शिव रूपी सूर्य की शक्ति रूपी रश्मि के शक्तिपात से उत्पन्न प्रबोध से उन्मिषित विशद् दृष्टि वाला होकर स्फुटतर प्रकाश से प्रकाशित होकर अपने को अनित्य देहादिक से मुक्त होकर सत्यात्मस्वभाव में स्थित हुआ देखता है और जब यथावस्थित वस्तु संवेदन का यथार्थ परामर्श करता है तब वह संकल्पमात्रविलिखित-विचित्र-विश्वाभिव्यक्तिमय शक्तिचक्र वाला शिव बन जाता है। इसीलिए कहा गया है कि 'तत्संवेदनरूपेण तादात्म्याप्रतिपत्तिः' उन उन वस्तुओं के संवेदन स्वभाव के बल से जो तादात्म्य प्रतिपत्ति (संवेद्यमानवस्तु के साथ अभेद संवित्ति) होती है उससे समस्त भावों की उत्पत्ति होती है अतः तब जीव सर्वमय बन जाता है। उससे उसकी सर्वमयत्वप्रतिपत्ति के कारण ऐसी कोई अवस्था है ही नहीं जो कि शिव नहीं होती। 'सा अवस्था नास्ति या शिवमयी न भवति ॥' ऐसी स्थिति में भोक्ता ही ईश्वर बनकर भोग्यभाव से ईशितव्य वस्तु रूप में सदा सर्वत्र संस्थित रहता है। जिसकी ऐसी संवित्ति है वही 'जीवन्मुक्त' कहा जाता है। आत्मा ही विश्वरूप में स्थित है—'आत्मन एव विश्वरूपत्वेन स्थितिः ।' विश्वप्रपञ्च का कोई निमित्तान्तर नहीं है। ब्रह्मवादियों ने कहा भी है— 'कल्पयत्यात्म-नात्मानमात्मा देवः स्वमायया । स एव बुद्ध्यते भेदादिति वेदान्तनिश्चयः ॥ अन्य विद्वानों ने भी कहा है— विविधैरुपाधिभिरवस्थितैर्बहिः, स्फटिकादिवत्तव विचित्रतोच्यताम् । यदि ते कदाचन कथञ्चन क्वचिद्भवितुं क्षमास्त्वदवभासतः पृथक् ॥ परमाणु पाकपरिणाम विभ्रमा, द्युत वा विवर्त इति विश्वमिष्यताम् । विबुधोत्तमैर्यदिह तद्विकल्पना- स्तव शक्तिरेव न तथोपपादयेत् ॥ तदिहापि च प्रतिनिमेषमुन्मिष- त्रिमिषषद्विकल्पविविधाशु मण्डलः ।