स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
२८२ स्पन्दकारिका (२) भावात्मक संवेद्यमानता—जब यह जीव शब्दादि विषयों को अपने से व्यतिरिक्त मानकर उनका स्वभिन्न वेद्य पदार्थ समझकर उनका परामर्श करता है तब उसकी वह संवेद्यमानता भावात्मक कही जाती है। इस प्रकार जीव संवेद्यमानता लक्षण वाले भावसंसर्ग की अवस्था में संवेद्यवस्तु से अव्यतिरिक्त होने के कारण सर्वमय, विश्वरूप होने पर भी वस्तु संवेदन तत्त्व परामर्श के उन्मिषित न होने के कारण सभी को आत्मा से व्यतिरिक्त कारणान्तरलब्धात्मक मानकर और सभी आत्माओं को अपने से भिन्न मानकर और अपनी आत्मा को देहादि अनित्य एवं अनात्म वेद्य में अहंबुद्धि स्थापित करके जन्ममरणादिक आवागमन के चक्र में फँसकर संसारी जीव कहलाने लगता है। किन्तु जब शिव रूपी सूर्य की शक्ति रूपी रश्मि के शक्तिपात से उत्पन्न प्रबोध से उन्मिषित विशद् दृष्टि वाला होकर स्फुटतर प्रकाश से प्रकाशित होकर अपने को अनित्य देहादिक से मुक्त होकर सत्यात्मस्वभाव में स्थित हुआ देखता है और जब यथावस्थित वस्तु संवेदन का यथार्थ परामर्श करता है तब वह संकल्पमात्रविलिखित-विचित्र-विश्वाभिव्यक्तिमय शक्तिचक्र वाला शिव बन जाता है। इसीलिए कहा गया है कि 'तत्संवेदनरूपेण तादात्म्याप्रतिपत्तिः' उन उन वस्तुओं के संवेदन स्वभाव के बल से जो तादात्म्य प्रतिपत्ति (संवेद्यमानवस्तु के साथ अभेद संवित्ति) होती है उससे समस्त भावों की उत्पत्ति होती है अतः तब जीव सर्वमय बन जाता है। उससे उसकी सर्वमयत्वप्रतिपत्ति के कारण ऐसी कोई अवस्था है ही नहीं जो कि शिव नहीं होती। 'सा अवस्था नास्ति या शिवमयी न भवति ॥' ऐसी स्थिति में भोक्ता ही ईश्वर बनकर भोग्यभाव से ईशितव्य वस्तु रूप में सदा सर्वत्र संस्थित रहता है। जिसकी ऐसी संवित्ति है वही 'जीवन्मुक्त' कहा जाता है। आत्मा ही विश्वरूप में स्थित है—'आत्मन एव विश्वरूपत्वेन स्थितिः ।' विश्वप्रपञ्च का कोई निमित्तान्तर नहीं है। ब्रह्मवादियों ने कहा भी है— 'कल्पयत्यात्म-नात्मानमात्मा देवः स्वमायया । स एव बुद्ध्यते भेदादिति वेदान्तनिश्चयः ॥ अन्य विद्वानों ने भी कहा है— विविधैरुपाधिभिरवस्थितैर्बहिः, स्फटिकादिवत्तव विचित्रतोच्यताम् । यदि ते कदाचन कथञ्चन क्वचिद्भवितुं क्षमास्त्वदवभासतः पृथक् ॥ परमाणु पाकपरिणाम विभ्रमा, द्युत वा विवर्त इति विश्वमिष्यताम् । विबुधोत्तमैर्यदिह तद्विकल्पना- स्तव शक्तिरेव न तथोपपादयेत् ॥ तदिहापि च प्रतिनिमेषमुन्मिष- त्रिमिषषद्विकल्पविविधाशु मण्डलः ।
द्वितीयः निष्यन्दः २८३ अथ चाति शुद्धवपुरद्भुतैकभूः, स्फुरसि त्वमेव शिव चिन्मयो मणिः ॥ इसे विवृति में पृथक्-पृथक् रूप से व्याख्यात किया गया है— ‘सर्वात्मक एवायमात्मा’ आदि द्वारा, ‘तेनतथाविधेन’—आदि द्वारा एवं—‘एवं स्वभावे यस्य’ आदि ग्रन्थों के द्वारा व्याख्यात किया गया है। १ पशुप्रमाता जीव सर्वमय है क्योंकि (वह भी पति प्रमाता शिव की भाँति) यह भी समस्तभावों (घटपदादिक भावों) के साथ संवेदनात्मक तदात्मकता रखने के कारण उनका सृजन करता रहता है ॥ २८ ॥ भट्टकल्लट कहते हैं—यह जीवात्मा सर्वात्मक है क्योंकि यह व्यक्तिगत संवेदन के माध्यम से विश्व के भावों (पदार्थों) का सृजन करता रहता है जो भी पदार्थ उसके अनुभव में आता है वही उसके संवेदन का आलम्बन बन जाता है । यह पशुप्रमाता (जीवात्मा) जिस किसी भी वस्तु का संवेदन (अनुभव) करता है उसको आत्मीकृत करके उसे अपने शरीर के रूप में स्वीकार कर लेता है । परिणामस्वरूप इस पशुप्रमाता का यह शिर हाथ आदि अंगों से युक्त शरीर ही उसका एक मात्र शरीर नहीं रह जाता प्रत्युत् संवेदन में आने वाले प्रत्येक पदार्थ उसके शरीरांग बन जाते हैं— ‘सर्वात्मक एवायमात्मा सर्वानुभावोत्पत्तिद्वारेण अनुभूयमानस्यैव संवेदनात् बाह्यार्थमनुभूयमानमेव शरीरत्वेन गृह्णाति, न तु शिर पांण्यादिलक्षितम् एकमेवास्य शरीरम् २ ॥ २८ ॥ वाचकवाच्यात्मक वस्तुओं की संवेदनाओं (अनुभवों) की ऐसी कोई भी अवस्था नहीं है जो शिवस्वरूप न हो । प्रत्येक स्थान पर भोक्ता (आत्मा) ही भोग्य (पदार्थ = प्रमेय) के रूप में अवस्थित है । भट्टकल्लट कहते हैं कि चूँकि आत्मा सर्वमयस्वभाव है अतः शब्दों एवं अर्थों से सम्बद्ध ऐसी कोई अवस्था नहीं है जोकि शिवात्मक स्वभाव को व्यक्त न करती हो अर्थात् जो शिव न हो । प्रत्येक स्थान में यह भोक्तारूप वेदकसत्ता आत्मा ही भोग्य पदार्थों (वेद्य पदार्थ) के रूप में अवभासित एवं उल्लसित हो रही है । भोग्य (संवेद्य = प्रमेय) पदार्थ भोक्ता (संवेदक = चेतन प्रमाता) से पृथक् नहीं है ॥ २९ ॥ ‘तेन तथाविधेन सर्वात्मकेन स्वभावेन, शब्दार्थयोः चिन्तासु न सा अवस्था या शिवस्वभावं न व्यञ्जयति, अतो भोक्तैव हि भोग्यभावेन सर्वत्रावस्थितो, न त्वन्यत भोग्यमस्ति ॥ २९ ॥ (‘ऐसी कोई अवस्था नहीं है जो शिवस्वरूप न हो’ तथा ‘समस्त प्रमेय मुझ प्रमाता का ही शरीर है’—) इस प्रकार का, जिस योगी का, संवेदन हो वह निःशेष जगत् को अपनी आनन्दात्मिका क्रीड़ा के रूप में देखता हुआ, अपने सत्स्वरूप के साथ एकाकार हो जाता है अतः वह योगी निःसंशय जीवन्मुक्त है । १. रामकण्ठाचार्यः ‘स्पन्दकारिकाविवृति’। २. स्पन्दसर्वस्व ।
२८४ स्पन्दकारिका भट्टकल्लट कहते हैं—जिस योगी का यह विश्वात्मक स्वभाव हो अर्थात्—'यह समस्त जगत् मन्मय है'—वह समस्त जगत् को अपनी क्रीड़ा के रूप में देखते रहने तथा नित्ययुक्त (अपने चिरन्तन आत्मस्वभाव से अपृथक्) रहने के कारण जीवित रहता हुआ भी ईश्वर के समान मुक्त रहता है तथा उसकी शरीरादिक वस्तुओं पर कोई भी (प्रतिबन्धात्मक, आवरणात्मक मायात्मक) बन्धन नहीं रहता (अर्थात् सारे बन्धनों से मुक्त रहता है) ।¹ जीवन्मुक्ति का स्वरूप— इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ ३० ॥ जिसका (जिस योगी का) ऐसा संवेदन हो कि समस्त विश्व मेरी क्रीडा है—वह संपूर्ण विश्व को अपनी क्रीडा के रूप में देखता हुआ चारों ओर से (सभी जागतिक भावों के साथ) युक्त (समस्त पदार्थों के साथ तद्रूपतावश उनसे एकाकार) होता हुआ 'जीवन्मुक्त' (कहलाता) है—इसमें कोई शंका नहीं है ॥ ३० ॥
- सरोजिनी * इस कारिका में आत्मा की विश्व के साथ अभेदात्मकता एवं 'विश्वोऽहं' के विमर्श में 'जीवन्मुक्तित्व' का प्रतिपादन किया गया है । परमात्मा तो विश्ववपु है ही किन्तु मितात्मा भी विश्ववपु है । परमात्मा तो अपनी अखण्ड स्पन्दात्मिका विमर्श शक्ति के द्वारा अनन्त प्रमाता-प्रमेयों, वेदक-वेद्यों से पूर्ण जगत् को अस्तित्व प्रदान करके उन्हें अपने शरीर के रूप में धारण करता है किन्तु मितात्मा (पशु) अपने संवेदनों के द्वारा प्रत्येक भूतात्मक एवं भावात्मक पदार्थ की सृष्टि करके उन्हें अपने शरीर के रूप में ग्रहण करके अवस्थित रहता है अतः वह भी ईश्वरवत् है । संवित्ति = ज्ञान । संवेदन । अखिल = समग्र । वा = 'वा' शब्द का प्रयोग स्वार्थ में है । वा = किं बहुना ॥ कहाँ तक कहें? इति = इस प्रकार (उक्त प्रकार रूप) । क्रीडात्वेन = क्रीडाराम, खेलने का बगीचा । 'खेलने के बगीचे के रूप में ।।' पश्यन् = विभावयन् । विभावित करता हुआ । जीवन्मुक्ति = जीते हुए भी ईश्वरवत् मुक्त ।² जीवन्मुक्ति और उसका स्वरूप— स्पन्दशास्त्र में मुक्ति का स्वरूप = 'जीवन्मुक्ति'—बहुत कहाँ तक कहें? जिसको इस प्रकार की 'संवित्ति' (ज्ञान) हो गया है कि समस्त दृश्यमान जगत् मेरा ही स्वरूप है—मन्मय है वह समग्र जगत् को अपने खेल के बगीचे के रूप में देखता है क्योंकि वह नित्ययुक्त एवं नित्यमुक्त है । बन्धन के कारण अज्ञान के नष्ट हो जाने पर एवं प्रबोध की १. स्पन्दसर्वस्व । २. स्पन्दप्रदीपिका ।
द्वितीयः निष्यन्दः २८५ प्राप्ति हो जाने से वह साधक जीवितावस्था में ही ईश्वरवत् मुक्त है। आत्मबोध में सम्यक् विश्रान्ति हो जाने पर जो अलुप्तानुभव है रूप में स्थित है वह तत्त्ववित् विषयोपभोग करता हुआ भी जीवन्मुक्त रहता है— ‘सम्यक् स्वबोधविश्रान्तौ योऽलुप्तानुभवः स्थितः । विषयानपि सोऽश्नन् स्याज्जीवन्मुक्तस्तु तत्त्ववित् ॥’१ जिन लोगों की यह मान्यता है कि उत्क्रान्ति के बिना मोक्ष नहीं होता उनका पक्ष असमीचीन है क्योंकि—‘यदि स्वभाव का अनुभव किये बिना ही केवल उत्क्रान्ति के बल से पुरुष को कैवल्य की प्राप्ति हो जाय तो जो मूर्ख फाँसी पर चढ़कर मरता है उसको भी मोक्ष मिल जाय’। ‘बिना स्वभावानुभवेन पुंसः कैवल्यमुत्क्रान्तिबलाद्यदि स्यात् । अत्राऽपि पक्षे ननु मोक्षभाक्त उद्बन्धनं यः कुरुते प्रमूढः ॥’ यह भी कहा गया है कि ‘गुण वासना वासित पुरुष भी प्रलयकाल में विदेह होने पर भी बद्ध ही रहते हैं। विशुद्ध ज्ञान के आश्रय से शरीरधारी भी मुक्त हो जाते हैं।’— ‘विदेहा अपि बुद्ध्यन्ते प्रलये गुणवासिताः । शरीरिणोऽपि मुच्यन्ते विशुद्धज्ञानसंश्रयात् ॥’२ ‘ज्ञानगर्भ’ में भी कहा गया है—‘हे त्रिलोकीनाथ! जो मनुष्य आपकी उपासना करके किल्बिष रूप उपद्रवों का नाश कर चुके हैं उन्हें बहुत शीघ्र ही अद्वैत भावना के आवेश से यह अनुभव प्राप्त हो जाता है कि मुझमें ही यह भावना के आवेश से यह अनुभव प्राप्त हो जाता है कि मुझमें ही यह समस्त जगत् स्थित है। मैं ही सब हूँ एवं मैं ही सर्वत्र हूँ।’ यह संवित् किस स्वरूप का है?—इसी अभिप्राय से कहा गया है— ‘तेन शब्दार्थचिन्तासु न साऽवस्था न यः शिवः । भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥’ —जिसकी इस प्रकार की संवित्ति है वह ‘जीवन्मुक्त’ है।३ अर्थात् शब्द चिन्तारूप एवं अर्थचिन्तारूप ऐसी कोई भी अवस्था नहीं है जो शिव न हो—यही संवित्ति ‘जीवन्मुक्ति’ है। जीवन्मुक्त कौन है? ‘Who possess this sort of recognition or he who regards this whole universe as a play and is always united, is beyond doubt liberated in life’. वा—यह शब्द प्रथम निष्यन्दोक्त निमीलन समाधि को विकल्पित करते हुए उसकी समापत्ति की दुर्लभता को ध्वनित करता है। अतः उसका यह अर्थ है—इस प्रकार की संवित्ति दुर्लभा है। इसका ज्ञान केवल उसको होता है जो जन्म-मरण के चक्र से निर्मुक्त है। १-२. स्पन्दप्रदीपिका। ३. रामकण्ठाचार्य (स्पन्दकारिकाविवृति)।
२८६ स्पन्दकारिका वा—'प्रथम अध्याय में प्रयुक्त (Involutive meditation) (निमीलन समाधि) ऐच्छिक बताने के लिए 'वा' प्रयुक्त हुआ है । ब्रह्माण्ड के साथ अपनी अभिन्नता या तादात्म्यभाव आवश्यक तो है किन्तु है कठिन । अतः उसका अर्थ इस प्रकार होगा—इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा या अवबोध (Recognition) केवल उस व्यक्ति को प्राप्त होता है जिसके कोई आगामी जन्म नहीं होते । जो अपुनर्भवता । जन्ममरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त कर लेता है वह संपूर्ण जगत् को क्रीड़ा के रूप में देखता है या वह चैतन्य के विकास के द्वारा विश्व की रचना करता है एवं संहार करता है तथा सतत् रूप से एकीकृत (United) है जैसे कि एक योगी होता है—'वे जो कि सदा एकात्म्यभाव से मुझ में ध्यान लगाकर मेरी अर्चना करते हैं'—(मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।। (गीता १२।२) अर्थात्—ऐसे योगी जगत् को खेल समझते हुए अपने संवित् के उन्मेष एवं निमेष द्वारा सृजन एवं संहार करते हुए नित्य उपासना करते हैं— 'अखिल जगत् क्रीड़ात्वेन पश्यन् निज संविदुन्मेषनिमेषाभ्यां सृजन् संहरन् नित्ययुक्ता उपासते ।।' ऐसा व्यक्ति जीवितावस्था में ही सारे बन्धनों को भस्मसात् कर देता है? कैसे करता है? ज्ञानाग्नि के द्वारा । वह भौतिक शरीर के पञ्चत्व प्राप्त करने पर शिव बन जाता है । वह जीवित रहकर भी कभी बन्धनग्रस्त (Feltered) नहीं होता ।। 'सततं समाविष्टो महायोगी जीवन्नेव प्राणादिमानापि विज्ञानाग्नि-निर्दग्ध-अशेषबन्ध्नो देहपाते तु शिव एव । जीवश्चेन्जीवन्मुक्तः । न तु कथञ्चित् बद्धः ।।' दीक्षा एवं मुक्ति—‘दीक्षादिना गुरुप्रत्ययो मुक्तिः' 'ईदृशात्तु ज्ञानात्समाचाराद्वा स्वप्रत्ययतो एव मुक्ति:'—योगी दीक्षा एवं गुरु की शक्तिपात की शक्ति पाकर मुक्त हो जाता है—'महासमापत्ति' प्राप्त कर लेता है ।'१ आत्म संवित् के मुख्यतः दो भाव हैं—(१) पशुभाव (२) पतिभाव ये भावद्वय ही आत्मा के द्विविध आसन हैं । यह चैतन्य सत्ता चाहे पशुभाव में अवस्थित हो या पतिभाव में किन्तु है तो वेदक ही । विश्व वेद्य है । वेद्य सत्ताओं की सत्ता का अधिष्ठान तो वेदक सत्ता ही है । 'यावन्न वेदका एते तावद्वेद्याः कथं प्रिये? वेदकं वेद्यमेकं तु ।।' भट्टकल्लट कहते हैं इस दृष्टि से तो मुख, हस्त, चरण आदि अंगों से युक्त पाञ्चभौतिक शरीर ही 'पशु' का शरीर नहीं है प्रत्युत् प्रत्येक वेद्य पदार्थ के संपर्क में आने पर या उसका संवेदन करने पर यह पशुप्रमाता उन वेद्य्रों में संवेदन के साथ अनुप्रविष्ट भी होता है अतः उनमें संवेदन द्वारा प्रविष्ट होने के कारण वे समस्त वेद्य पदार्थ भी उसके शरीर हैं और इसी कारण उनमें 'ममायं' की भावना एवं रागानुग समापत्ति हुआ करती है—तादात्म्य हुआ करता है । जीवात्मा (पशुप्रमाता, मितात्मा) भी विश्वशरीरी है । १. आचार्य क्षेमराजः 'स्पन्दनिर्णय' ।
द्वितीयः निष्यन्दः २८७ शिवसूत्र एवं स्पन्दशास्त्र - एक तुलना- (१) शुद्धविद्योदयाच्चक्रेशत्वसिद्धिः ॥ (१।२१) (२) विद्यासमुत्थाने स्वाभाविके खेचरी शिवावस्था (२।१५) (३) कलादीनां तत्त्वानांमविवेको माया (३।३) (४) धीवशात्सत्वसिद्धिः (३।१२) विद्याविनाशे जन्मविनाशः (३।१८) (५) कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः । (३।१९) (६) मात्रास्वप्रत्ययसंधानेनष्टस्य पुनरुत्थानम् । (३।२४) (७) शिवतुल्यो जायते । (३।२५) (८) भेदतिरस्कारे सर्गान्तरकर्मत्वम् (३।३६) (९) भूतकञ्चुकी तदा विमुक्तो भूयः पतिसमः परः । (३।४२) तदारूढप्रमितेस्तत्क्ष- याज्जीवसंक्षयः ॥ ४१ ॥ इसी कारिका में शक्ति के दो रूपों का परिचय दिया गया है जो निम्नांकित है- (१) भोग्य रूप- बन्धन (२) 'सर्वं शक्तिमयं जगत्' 'शक्तयोऽस्य जगत् कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः'- मानकर शक्ति का उपास्य रूप ग्रहण करके उसकी उपासना- मुक्ति ॥ 'बन्धयित्री' बन्धन प्रदान करने वाली । 'बन्धन' क्या है? क्षेमराज के कथनानुसार (१) शिवाभेदाख्यात्यात्मका ज्ञानस्वभावो अपूर्णमन्यतात्मकाणवमलसतत्त्वसंकुचितज्ञानात्मा बन्धः ॥ (२) आत्मनि अनात्मताभिमानरूपाख्यातिलक्षणाज्ञानात्मकं ज्ञानं केवलं बन्धो । (३) अनात्मनि शरीरादौ आत्मताभिमानात्मकम् अज्ञानमूलं ज्ञानमपि बन्ध एव ॥ (४) 'ज्ञानं बन्धः (शिवसूत्र १।२) (५) मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् ॥ स्वातन्त्र्य हानिर्बोधस्य स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता । द्विधाणवं मलमिदं स्वस्वरूपापहानितः ॥ अर्थात् आत्म तत्त्व में अनात्म तत्त्व का एवं अनात्म तत्त्व में आत्म तत्त्व की प्रतीति ही बन्ध है । मल या अज्ञान ही इस बन्धन रूप संसार का अंकुर है । 'क्रियाशक्ति' बन्धन एवं मोक्ष दोनों का कारण है । इस सिद्धान्त में जीवन्मुक्ति ही मुक्ति है । कहीं अन्यत्र जाने का नाम मोक्ष नहीं प्रत्युत् अज्ञानग्रंथि का उद्भेद ही मोक्ष है- नान्यत्र गमनं स्थानं मोक्षोस्ति सुरसुन्दरि । अज्ञानग्रंथिभेदो यः स मोक्ष इति उच्यते ॥ विशेष- त्रिकदर्शन में योगसाधना एवं कुण्डलिनी योग मान्य है अतः 'स्वमार्गस्था' का यौगिक अर्थ भी लिया जा सकता है । मूलाधार में अवस्थित कुल- कुण्डलिनी (शिव कला) ब्रह्ममार्ग के द्वार पर फण रखकर सो रही है । जब तक वह जागकर स्वमार्ग (अपने पति परमशिव के पास पहुँचने के मार्ग) (सुषुम्णा मार्ग) का
२८८ स्पन्दकारिका आश्रय नहीं लेती तब तक न तो जीव का उद्धार होता है और न तो यह कुल शक्ति ही कृतार्थ हो पाती है अतः 'स्वमार्गस्था' का अर्थ है—सुषुम्णा स्थित ब्रह्म नाड़ी में संप्रविष्ट होकर संस्थित ॥ 'मयि स्थितमिदं जगत् सकलमेव सर्वत्र वा । स्थितोऽहमिति धारणाद्वितयभावनावेशतः ॥ जगत्त्रितयनाथ तानतिचिरेण सम्प्राप्यते । नृभिस्तव सपर्यया दलितकिल्बिषोपप्लवैः ॥'१ गीता में भी कहा गया है— यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ 'पंचरात्र' में भी कहा गया है कि 'प्रज्ञा के राजमहल पर आरूढ़ पुरुष अशोच्य हो जाता है मानों पर्वत के उच्च शिखर पर स्थित पुरुष नीचे की वस्तु को देख रहे हों ॥'— प्रज्ञा प्रासादमारुह्य अशोच्यः शोचतो जनान् । भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति ॥'२ यहाँ नित्य उद्युक्तता एवं उन्मुक्तता को ही उपाय के रूप में ध्वनित किया गया है—'अत्र च नित्योद्युक्तरूपत्वमेवोपायो युक्त्याध्वनितः ॥' कहा भी गया है— 'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्व विविक्तये । जाग्रदेव निजं भावमचिरेणाधिगच्छति ॥' (२१)३ जीवन्मुक्त कौन है? 'यस्य इति वा संवित्तिः स जीवन्मुक्तः ॥'४ यस्य वा—जिस साधकोत्तम की । संवित्तिः = सम्यक् ज्ञान ॥ सततम् = सभी अवस्थाओं में व्यवधानरहित होकर अखण्ड रूप में । युक्तः = समाहित । स्वभावबल परिशीलन अप्रमत्त-एकाग्रमानस साधक । स जीवन = नियत देहाधिकरणों एवं प्राणों को धारण करता हुआ । मुक्तः = सर्वव्यापक-सर्वात्मक-सर्वेश्वर स्वतन्त्र स्वस्वभावाहंकार प्रतिपत्ति की दृढ़ता से जन्ममरण के चक्र से मुक्त होकर रहने वाला यह साधक परमेश्वर ही है । न संशयो = इस विषय में कोई भ्रान्ति नहीं है । प्रश्न उठता है कि क्या करता हुआ जीवन्मुक्त? 'अखिलम्' अर्थात् अशेष । अनन्त वस्तु व्यक्ति विचित्र इस 'विश्व' या जगत् को 'क्रीडात्वेन'—अर्थात् स्वनिर्मित- चराचर भावक्रीडनको परचितलीलामात्र के रूप में 'पश्यन्' अर्थात् विभावित करता हुआ ॥५ अनुन्मिषित स्वस्वभावनिभालनक्षमविमलविज्ञान दृष्टि वाला व्यक्ति अपने को दूसरे से भिन्न मानकर उसके कारण उत्पन्न हर्ष एवं शोक तथा भय आदि विकारों का अनुभव करता हुआ आवागमन के चक्र में पड़ा हुआ दुःख भोगता है । किन्तु जो साधक १. ज्ञानगर्भ । २. पञ्चरात्र । ३-४. स्पन्दप्रदीपिका । ५.स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य) ।
द्वितीयः निष्यन्दः २८९ उपर्युक्त रीति से क्रीड़ापरायण होकर स्वपरिकल्पित भय क्रोध शोक के कारणभूत भावप्रतिच्छकों के द्वारा क्रीड़ा करता हुआ तद्याथात्म्य को जानकर कालुष्य से भय आदि विकारों के कालुष्य से स्वल्पमात्र भी दुष्प्रभावित नहीं होता एवं भावों को स्वस्वभाव शक्ति का विजृंभण मात्र मानकर याथात्म्यवेदी होकर स्वल्पमात्र भी विकारग्रस्त नहीं होता वह जगत् एवं उसके समस्त व्यापारों को अपनी क्रीड़ा मानकर जीवितावस्था में ही मुक्त हो जाता है ।१ भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में कहते हैं— 'एवं स्वभावं यस्य चित्तं' यथा 'मन्मयमेव जगत् सर्वम् इति'—स सर्वं क्रीडात्वेन पश्यन् नित्ययुक्तत्वात् जीवन्नेव ईश्वरवत् मुक्तो, न त्वस्य शरीरादि बन्धकत्वेन वर्तते ।।'२ अर्थात् जिस योगी के चित्त का इस प्रकार का स्वभाव विकास हो उठा हो कि— 'यह निखिल विश्व मेरा अपना ही स्वरूप है'—वह संपूर्ण प्रमेयात्मक जगत् को अपने क्रीडनक (खिलौने) के रूप में देखता हुआ नित्ययुक्त (स्वरूप सत्ता से निरन्तर आश्लिष्ट) होने के कारण षाटकौशिकक्षर काया में रहता हुआ भी ईश्वर के समान मुक्त रहता है । ऐसे प्रबुद्ध योगी के लिए उसके शरीरादिक बन्धनरूप नहीं रहा करते ।। संवेद्य विषयों के प्रकार—आत्मा वेदक है और उसके संवेदन के विषय वेद्य (संवेद्य) पदार्थ है । इनके दो प्रकार है— (१) पाञ्चभौतिक विषय (२) भावात्मक विषय । (१) पाञ्चभौतिक विषय—विषयों के वे प्रकार जो कि पृथिव्यादिक पञ्चभूतों से निर्मित हैं—बाह्येन्द्रियों से ग्राह्य हैं: स्थूल शरीर एवं उनके अनेक संघटक भौतिक अंग । (२) भावात्मक विषय—ये शरीरांग युक्त कोई काया नहीं है प्रत्युत् अमूर्त भाव हैं—संवेदनों, भावनायें, संवेगों, विचारों, अनुभूतियों अमूर्त भाव हैं—संवेदनायें, भावनायें, संवेगों, विचारों, अनुभूतियों के अमूर्त अस्तित्व हैं यथा-सुख, दुःख, मान, अपमान, धर्म, अधर्म, जय, पराजय, आह्लाद, निराशा आदि ।। इन्हें 'भावाभाव' के आधार पर भी विभक्त कर सकते हैं यथा— (क) भावात्मक विषय—जगत् में भावसत्ताक पदार्थ यथा—घट, पट, शरीर, इन्द्रियाँ, सुख, दुःख, अमर्ष, हर्ष आदि ।। (ख) अभावात्मक विषय—जगत् में अविद्यमान पदार्थ यश—वन्ध्यापुत्र, खपुष्प, शश-विषाण, सर्प-कर्ण आदि ।। संवेदन की विशेषता—(१) संवेदन में मूर्तामूर्त दोनों विषयों की समान अनुभूति होती है । (२) संवेदन में समस्त अनुभूतियाँ भावात्मक ही हुआ करती हैं अभावात्मक नहीं । (३) जो कुछ संवेदन के विषय हैं उन्हीं का अस्तित्व होता है अन्य का नहीं । १. स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य) । २. स्पन्दसर्वस्व (स्पन्दकारिकावृत्ति) । स्पं० १९
२९० स्पन्दकारिका (क) जीवात्मा जो जो संवेदन करती है वह वह उसका शरीर बन जाता है 'एवञ्च यद् यदयं जीवः संवेत्ति तत्तदस्य शरीरमेव संपद्यते न तु नियत शिरः पाण्याद्यवयव- सन्निवेश एव (स्पन्दकारिकाविवृतिः ३.३) । (ख) संवेद्यमानतावस्था में ही संवेदक शरीरी बन जाता है—संवेद्यमानतावस्थाया- मेव शरीरीभवति ।। (रामकण्ठाचार्य ३.३) । (ग) संवेद्यमानता तत् तत् विषयों का प्रकाशन है । संवेद्यमानता च तेन तेन रूपेण प्रकाशमानता । (स्प०का०वि० ३.३)। संवेदक की जिस भी विषय की ओर औन्मुख्य होता है—संवेद्यमानता के काल में वे ही समस्त विषय उसके शरीर बन जाते हैं । संवेद्यमानता के समय किसी भी विषय के शरीर बनने का अर्थ है—संवेदन के काल में संवेदन के द्वारा उस विषय का सर्जन करना । संवेदनात्मक औन्मुख्य—एक का संहार दूसरे का सृजन । परमात्मा की भाँति निरन्तर प्रतिक्षण मितात्मा द्वारा प्रलयोद्भव = संहार + सृजन । तदात्मता महासमापत्ति— अयमेवोदयस्तस्य ध्येयस्यध्यायिचेतसि । तादात्मतासमापत्तिमिच्छतः साधकस्य वा ॥ ३१ ॥ इयमेवाऽमृत प्राप्तिरयमेवाऽऽत्मनो ग्रहः । इयं निर्वाणदीक्षा च शिवसद्भावदायिनी ॥ ३२ ॥ ध्याता (योगी) के चित्त में ध्येय (देवता) का साक्षात्कार होना यही है कि इच्छा होते ही (तत्काल) (ध्याता का अपने देवता के साथ एकता रूप समापत्ति (समाधि = देव साक्षात्कार रूप समावेश) प्राप्त हो जाती है ॥ ३१ ॥ यही (तदात्मता समापत्ति) अमृतत्त्व की संप्राप्ति है, यही आत्मग्रहण है । यही निर्वाण दीक्षा है और (यही) शिवभावप्रदायिका है ॥ ३२ ॥
- सरोजिनी * प्रस्तुत इस श्लोक में यह बताया गया है कि मन्त्रात्मा शिवभाव के उदय की अन्य युक्ति क्या है । इसी प्रयोजन से कहा गया—'अयमेवो.... साधकस्य वा ।।' इसमें 'महा- समापत्ति' का भी वर्णन किया गया है ।¹ 'समापत्ति' ध्याता के मस्तिष्क में केवल यही उस ध्येय वस्तु का 'उदय' है जिसके साथ ध्याता ऐकात्म्य प्राप्त कर चुका है । यह तदात्मता समापत्ति ही अमृतत्त्व की प्राप्ति है । यही आत्मसाक्षात्कार है । यह वह निर्वाण है जो कि शिव के साथ ऐकात्म्यभाव या तद्रूपता की प्राप्ति का विधान करता है ।² अयमेव = यही । उदयः = आविर्भाव प्रकटीकरण । मन्त्र के देवता का उदय । प्रकटीभाव । १. स्पन्दप्रदीपिका । २. स्पन्दनिर्णय ।
द्वितीयः निष्यन्दः २९१ तस्य = उसका । ध्येये = ध्यान का विषय । ध्यायिचेतसि = ध्याता के चित्त में । १ तदात्मता = तादात्म्यभाव ॥ समापत्ति = समाधि । आत्मसाक्षात्कार । (१) यही ध्याता के मस्तिष्क में अभिव्यक्ति है : उदय है : प्रकटीभाव है ॥ (२) यह अभिव्यक्ति ध्येय की अभिव्यक्ति है । २ (३) इस ध्येयाकार अभिव्यक्ति में साधक आत्मा के साथ ऐकात्म्य प्राप्त कर लेता है—तद्रूप हो जाता है : तादात्म्यभाव प्राप्त कर लेता है । 'शिवो भूत्वा शिवं यजेत्'—के अनुसार ध्याता के चित्त में—'न सावस्था न या शिवः'—इस प्रकार प्रतिपादित शिवस्वभाव ध्येय का तथा किसी सिद्धि के लिए किसी विशेष मन्त्र के देवता का यही 'उदय' या प्रकटीभाव है । 'तदात्मता समापत्ति' शिवैक्यावेश है । यह 'न सावस्था न या शिवः' की अनुभूति है । यह पञ्चवक्त्र (शिव) आदि का साधक के अपने से पृथक् रूप में अपना स्वरूप प्रदर्शित करना नहीं है—यह देवता का साधक से पृथक् व्यक्तित्व प्रदर्शन नहीं है—यह साधक से पृथक् होकर उसे दर्शन देना नहीं है 'न तु पञ्चवक्त्रा- देर्व्यतिरिक्तस्याकारस्य दर्शनं' । ३ यह तदात्मतासमापत्ति की निश्चयात्मिका बुद्धि भी नहीं है—'न तु निश्चयमात्रेण तदात्मता समापत्तिः' ४ प्रत्युत् यह है—इच्छा करने वाले साधक का अविकल्प विश्वाहन्तात्मक शिवैक्यरूप इच्छा परामर्श-शिवैक्यावेश । ५ इसी बात को इस प्रकार भी कहा गया है—'मैं ही तत्संवेदन रूप से तादात्म्यप्रतिपत्ति से विश्वशरीर चिदानन्दघन शिव हूँ' । ६ —'अहमेव तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितो विश्वशरीरश्चिदानन्दघनः शिव इति'—इस प्रकार का सङ्कल्प अविकल्प शेषीभूत रूप से फल प्रदान करता हूँ—उसका ध्येय मन्त्र देवता सभी साधकों के समक्ष अभिमुख होता है । परमेष्ठिपाद द्वारा भी कहा गया है— 'साक्षाद्भवन्मये नाथ सर्वस्मिन्भुवनान्तरे । किं न भक्तिमतां क्षेत्रं मन्त्रः केषां न सिध्यति ॥' (उ०स्तो० १।४) यही समापत्ति—परमाद्वयरूप अमृत की प्राप्ति है—'इयमेव च समापत्तिः परमा- द्वयरूपस्य अमृतस्य प्राप्तिः।।' अन्य अमृत में तो कतिपय काल तक शरीर अमर रहता है किन्तु बाद में साधक की मृत्यु हो जाती है किन्तु इस अमृतत्व की प्राप्ति में ऐसा नहीं होता । 'स्वच्छन्दतन्त्र' में भी इसकी पुष्टि की गई है— (१) नैव चामृतयोगेन कालमृत्युजयो भवेत्, १-६. स्पन्दनिर्णय ।
२९२ स्पन्दकारिका —इस प्रकार कहकर इस तन्त्र द्वारा अंत में उपसंहार में यह कहा गया है— (२) अथवा परतत्त्वस्थः सर्वकालैर्न बाध्यते ॥ (७।२२३) (३) सर्वं शिवशक्तिमयं स्मरेत्— जीवन्नेव विमुक्तोऽसौ यस्येयं भावना सदा । यः शिवं भावयेन्नित्यं न कालः कलयेत्तु तम् ॥ योगी स्वच्छन्दयोगेन स्वच्छन्दगतिचारिणा । स स्वच्छन्दपदे युक्तः स्वच्छन्दसमतां व्रजेत् ॥ स्वच्छन्दश्चैव स्वच्छन्दः स्वच्छन्दो विचरेत् सदा ॥ (७।२५८) (४) यही ‘ज्ञान’ भी है—‘अयमेव आत्मनो ग्रहो ज्ञानं यदुच्यते आत्मा ज्ञातव्य इति तत्र इदमेव—सर्वज्ञसर्वकर्तृस्वतन्त्रशिवस्वरूपतया प्रत्यभिज्ञानं आत्मनो ज्ञानम्’ । (५) त आत्मोपासकाः सर्वे न गच्छन्ति परं पदम् ॥ (स्व० ४।३८८) आत्मसाक्षात्कार के लिए ‘दीक्षा’ भी आवश्यक है—१ (१) दीक्षा गुरु का शिष्य की आत्मा के प्रति अनुग्रह है जो कि दीक्षा के समय शिष्य की आत्मा को परमात्मा के साथ मिलाने की पद्धति के लिए अनिवार्य है । गुरु उपलब्धि के मार्ग को जानकर (सम्प्राप्ति की इस पद्धति को जानकर) शिष्य की आत्मा को शिव के साथ मिलाकर एकाकार देता है । (२) पारमार्थिक स्वरूपदायिनी दीक्षा निर्वाण दीक्षा है जो निम्नांकित है— ‘एवं यो वेद तत्त्वेन तस्य निर्वाणदायिनी । दीक्षा भवत्यसंदिग्धा तिलाज्याहुतिवर्जिता ॥ (प० २५) यह मोक्षदायिनी दीक्षा (Liberative initiation) है । यह ‘पुत्रक’ आदि की दीक्षा शिवाभिन्न रूप में स्थित है और शिव से एकता प्राप्त कराती है । जो परासत्ता को जानता है वह उस दीक्षा को प्राप्त करता है जो कि तिल एवं घी की आहुतियों (Offerings) से रहित रहकर भी मोक्ष प्रदान करती है ।२ इस दीक्षा में यह भावना की जाती है कि—‘मैं स्वयमेव शिव हूँ । मैं ज्ञान एवं आनन्द से परिपूर्ण हूँ । मेरा शरीर यह विश्व है क्योंकि इसके साथ मेरी पूर्ण एकता है । यह एकता इसकी चेतना के रूप में स्थित है । मेरी विश्व के साथ अभिन्नता एवं एकता है ॥’ ‘ओ परमात्मन्! इस विश्व में ऐसा कौन है जो कि साधकों के लिए पवित्र स्थान की भाँति पवित्र नहीं है? सभी आपके साथ अभिन्न हैं। ऐसा कौन सा स्थान है जहाँ मन्त्र अपना फल नहीं देते?’ ‘ऐसी कौन सी अवस्था है जो शिव नहीं है?’ साधक को शिव बनकर शिव की
१-२. स्पन्दनिर्णय ।
द्वितीयः निष्यन्दः २९३ पूजा करनी चाहिए ।। 'समग्र विश्व को शिव एवं शक्ति का ही रूप मानना चाहिए ।।'— जिसे इस प्रकार का दृढ़ ज्ञान हो चुका है वह चाहे जीवित ही क्यों न हो स्वच्छन्द (स्वतन्त्र) है। वह योगी 'स्वच्छन्द' पर ध्यान करता है। वह 'स्वच्छन्द' के साथ योग के द्वारा ऐकात्म्य प्राप्त कर लेता है और 'स्वच्छन्द' की भाँति जीवन व्यतीत करने लगता है। वह स्वच्छन्द बनकर स्वतन्त्र एवं आत्मनिर्भर, निरावलम्ब एवं निर्बन्ध जीवन जीने लगता है।¹ यही 'प्रत्यभिज्ञा' (Cognition) है और यही 'आत्मज्ञान' है। 'आत्मा का ज्ञान होना चाहिए'—इसका अर्थ यह है कि आत्मा शिव के साथ अभिन्न है।² पूर्वोक्त मन्त्रात्मा ध्येय का यही ध्याता के चित्त में उदय है। जो साधक या ध्याता मन्त्रात्मा से एकत्व चाहता है, उसकी यही तदात्मता अथवा ध्येयस्वरूपापत्ति है। 'विश्वसंहिता' में कहा गया है—'जब चित्त ध्येय में लीन हो जाता है तब उसे 'ध्यान' कहते हैं। इसमें ध्येय प्रत्यक्ष हो जाता है और ध्याता तन्मय हो जाता है।'— 'ध्येये चित्तं यदा लीनं तदा ध्यानमुदाहृतम् । ध्येयः प्रत्यक्षतां याति ध्याता तन्मयतां व्रजेत् ॥ ऋच्छतस्त्विति पाठाद्वा ध्येयं चिन्तयतोऽत्र या । तदात्मतासमापत्तिरैक्यं तस्योदयः स तु ।।' (मूल श्लोक में 'इच्छतः' के स्थान में 'ऋच्छतः' पाठ भी माना जाता है।) उसका अभिप्राय यह है कि ध्येय का चिन्तन करते करते जो उसके साथ तदात्मतापत्ति है अर्थात् एकता है, वही उसका उदय है। ग्रन्थकर्ता 'इच्छतः' एवं 'ऋच्छतः' दोनों का आशय ठीक मानते हैं क्योंकि मन्त्रोच्चारण की इच्छा से मन्त्रदेवता के साथ जो तादात्म्य है, वह वस्तुतः संवेदन द्वारा उससे एकता ही है। मन्त्र न्यास द्वारा जीवन में देवता का आविर्भाव ही होता है। यह जो स्वरूप-संवेदन है, यही आत्मा की अमृतत्व की प्राप्ति है। जरा एवं मरण की परम्परा का विच्छेद होने से जो अपुनर्भवता है उसे हम 'मुक्ति' नहीं कहते। दुग्ध- समुद्र से स्वतः उद्भूत यही आत्मा का अनुग्रह है। यही 'निर्वाण-दीक्षा' है और यही परमात्मा से मिलन है। 'मोक्षधर्म' में कहा गया है—सभी संकल्पों का त्याग करके सत्व में चित्त को निविष्ट कर देना चाहिए। जब चित्त सत्व में विलीन हो जाता है तब काल पर विजय प्राप्त हो जाती है— 'हित्वा तु सर्वसंकल्पान् सत्वे चित्तं निवेशयेत् । सत्वे चित्तं यदा लीनं ततः कालञ्जयो भवेत् ॥' यह जो स्वरूप-संवित्ति है यही आत्मा को अमृतत्त्व-प्राप्ति है। जरामरण की परम्परा का उच्छेद होने से यही अपुनर्भवता है और हम इसे ही जन्ममरण के चक्र का अभाव कहते हैं— १-२. स्पन्दनिर्णय ।
२९४ स्पन्दकारिका 'येयं स्वरूपसंवित्तिः साऽमृताप्तिरिहात्मनः । जरामरणविच्छेदादपुनर्भवता न तु ॥ दुग्धाब्ध्युद्गतस्यायमेव चात्मनोऽनुग्रहः स्वतः ॥ निर्वाण दीक्षा तत्त्वेयं परात्मनियोजिका ॥' जन्ममरण की परम्परा का विच्छेद मुक्ति नहीं है यह 'आत्मा का अनुग्रह है।' आत्मसंबोध में भी कहा गया है कि—'स्वभाव-संवित् का ज्ञान ही मनुष्य के लिए भव से मुक्ति का हेतु होता है । एक बार का अमृतपान मृत्युग्रस्त को अमर बना देता है । 'भवेद्भवनामभयाय नूनं स्वभाव संविद्विदितैव पुंसाम् । अमर्त्यतां मर्त्यजने करोति सकृत्सुधाप्राशनमात्रमेव ॥' दीक्षा पद का क्या अर्थ है? ज्ञानसद्भाव का दान एवं अखिल मल का क्षपण । बोधानुवेध से दीक्षा देने से 'दान' एवं 'क्ष' से क्षपण अर्थ बोधित होता है— ददाति ज्ञानसद्भावं क्षपयत्यखिलं मलम् । बोधानुवेधाद्दीक्षोक्ता दानक्षपणधर्मिणी ॥१ अभेदोपलब्धि नाम वाले इस चतुर्थ निष्यन्द के ये प्राथमिक दो श्लोक हैं । इनमें अभेदोपलब्धि के उपायों की चर्चा करते हुए कारिकाकार मन्त्र, न्यास आदि समस्त विधिसंस्कारों की सार्थकता एवं उनकी उपादेयता को रेखांकित कर रहा है । मन्त्रात्मा शिवभाव का उदय कैसे हो—इसकी ये अन्य युक्तियाँ हैं । 'ध्यानी' साधक के चित्त मन्त्रात्मा 'ध्येय' का जो आविर्भाव होता है उसे ही कारिकाकार ने 'उदय' कहा है । 'ध्यानी' साधक की मन्त्रात्मा 'ध्येय' से एकत्वापत्ति या ध्येयस्वरूपापत्ति (तदात्मता) ही साधना का लक्ष्य है । मन्त्र योग—तस्य = उसका 'किसी ध्याता का । स्मर्तव्य, मन्त्रवाच्य, देवता का ध्यान के विषयीभूत देव का । उदय = उस ध्यानालम्बन या ध्येय की प्रतिपत्ति हेतु की गई साधनाओं एवं क्रियाओं के द्वारा उस अमोघशक्ति उपास्य देवता का साकार रूप में प्रथन या आविर्भाव 'उपास्येनाकारेण प्रथनम्' ॥ किस अधिकरण में?—ध्यायि चेतसि = ध्याता के चित्त में । चेतसि = चित्त में । संकल्प में । कौन सा उदय?—इच्छतः इच्छावस्था में वर्तमान मन्त्रोच्चार करने की इच्छा रखने वाले साधकस्य = साधक का ॥ अभियुक्त का । तदात्मता समापत्तिः = वस्तु सामर्थ्यसिद्धा समापत्ति । उस ध्येय आत्मा के स्वरूप के भाव के साथ होने वाली तदात्मता के द्वारा प्रादुर्भूत समापत्ति या एकीभाव । भाव यह कि—न्यास आदि के लिए मन्त्रोच्चारण की इच्छावस्था में मन्त्रों के द्वारा रुद्ध देवताकार साधकचित्त प्रयत्नविरहित संपद्यमान अभिन्नरूपत्व ही परामर्शक्षमसंवित् वाले ध्याता के मुख्य आराध्य देवता का १. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।
प्रत्यक्षरूप दर्शन (न कि व्यतिरेकविभाव्यमाना कारता)। कारण स्पष्ट है—'शिवोभूत्वा शिवं यजेत् ॥' तदात्मतासमापत्ति = देवता के साथ एकीभाव। उदयः = आराध्यदेवता का प्रत्यक्षदर्शन।¹ विध्यन्तरसंस्कारकत्व के प्रतिपादनार्थ अगली कारिका कही गई है जो यह है— 'इयमेवामृतप्राप्ति .... शिवसद्भावदायिनी ॥' यह जो स्वरूप का संवेदन है यही आत्मा की अमृतत्त्व-प्राप्ति है। इयमेव = यही ॥ अर्थात् यथा प्रतिपादित शरीरादिक विनश्वर वस्तुओं के आलम्बन से उसमें आविर्भूत अहं प्रत्ययरूप स्वप्रकाशव्यतिरिक्त वेद्यभावप्रतीति से युक्त मिथ्याज्ञान के उच्छेद से अनवच्छिन्न स्वच्छ स्वच्छन्द स्वस्वभावमात्रैकतत्त्वोपलब्धिरूप संवित् का सम्यक् ज्ञान। अमृतप्राप्तिः = अमृत अर्थात् अविनाशी शिवात्मक आत्मा की प्राप्ति (उपलब्धि) : 'अमृतस्य अविनाशिनः शिवात्मकस्यात्मनः प्राप्तिरूपोपलब्धिः ॥' न कि— द्रव्यविशेषात्मक जड़ एवं अनित्य = अर्थानुगतामृतप्राप्ति ॥ किसी वस्तु की प्राप्ति । अर्थात् यह अमृत प्राप्ति नहीं है = पीयूपोपलब्धि अमृतत्वोलब्धि नहीं है। जड़ पीयूष को अमृत इसलिए कहते हैं क्योंकि यह कालान्तर स्थायी है 'न तु द्रव्यविशेषात्मकस्य जडस्यानित्यस्य वस्तुनः कस्यचित् प्राप्तिरमृतप्राप्तिः, सा हि जीवस्य कालान्तर स्थायिशरीरत्वकारणभावात् एतदुपचारेण एवमुच्यते ॥'² अयमेवात्मनोग्रहः—यही मात्र आत्मग्रहण है— 'आत्मनो ग्रहणं कुर्याद्दीक्षाकाले गुरुर्धिया ॥' इस प्रकार की मन्त्रोच्चारणेच्छाक्षणभाविनी जो संवित् है वही आत्मा है। उस आत्मा या जीव का ग्रहण 'आत्मनोग्रह' है। उन-उन दीक्षादिक विधि विशेषों में आत्मा की अर्थात् शिष्य से सम्बद्ध अपना ग्रहण ॥ उसके कारण तादृग्विधिसम्पदा प्राप्त करने हेतु परिकल्पित आत्मा के विशिष्ट स्वरूप की जो परमकारणभूतस्वभावभेदसमापत्ति आविर्भूत होती है वह परामृश्यमाना होने पर आत्मग्रहणात्मक विधि की संपादिका होती है। इसके अतिरिक्त अन्य किसी साधन या उपाय के द्वारा उस अमूर्त आत्मतत्त्व का ग्रहण नहीं होता क्योंकि ग्रहीता एवं सर्वव्यापकसंविद्रूप परमात्मा से वह अभिन्न है। 'इयमेव निर्वाणदीक्षा'—यही निर्वाणदीक्षा भी है। 'निर्वाण' क्या है? द्वैतभाव से निवृत्ति ही निर्वाण है—'निर्वाणं निवृत्तिर्द्वैत प्रत्ययात्' द्वैतप्रत्ययवाले 'क्षोभ' के परिक्षय से जो आत्यन्तिकी प्रशान्ति या संवित् स्वस्वभावव्यव-स्थिति आविर्भूत होती है वही निर्वाण है—'निर्वाणं निवृत्तिर्द्वैतप्रत्ययलक्षण क्षोभपरिक्षयात् आत्यन्तिकी प्रशान्तिः संविदः स्वस्वभावव्यवस्थितिः ॥' 'दीक्षा'—तदर्था- दीक्षा । स्वरूपसंबोधनात्मक भेदमय बन्धक्षपण लक्षण संस्कार विशेष—'दीक्षा १-२. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति' ।
२९६ स्पन्दकारिका स्वरूपसंबोधदानात्मको भेदमय बन्धक्षपणलक्षणश्च संस्कार विशेषः ॥'—इस प्रकार की वह दीक्षा 'निर्वाण दीक्षा' कहलाती है। यही संवित्—'शिवसद्भावदायिनी' है। 'शिवसद्भावदायिनी'—स्वस्वभाव परमेश्वर शिव का जो सद्भाव (सत्ता) है। (जिसके द्वारा 'अहमेवास्मि' : 'मैं ही हूँ' का भाव जाग्रत होता है) उसकी अबाधित प्रतिपत्ति (जो कि सिद्धावस्था में आविर्भूत होती है) को देने वाली (प्रतिपादिका)। यह दीक्षा और कैसी है?— (१) वह सुप्रबुद्ध गुरु को गोचर एक निरुत्तर संस्कार है। (२) वह परमशिवात्मकरूप प्राप्तिमात्र है। (३) वह बाह्यसाधनसाध्यविधिविशेषात्मक नहीं है। कहा भी गया है—'इयमेव सा मिथ्याज्ञानशून्यस्य' ।१ तदात्मतासमापत्ति : योगी का देव-तादात्म्य मन्त्रदेवता और चित्त— आत्म चैतन्य का अविराम अनुसंधान करते रहने पर योगी का संकल्प, उसकी उत्कण्ठा, उसकी भावात्मक तीव्रता इतनी प्रबल हो जाती है कि मन्त्रोच्चारण करने के क्षण ही उसका चित्त ध्येय देवता के साथ तादात्म्य प्राप्त कर लेता है। उसकी यह तीव्र एकाग्रता ही उसे शिवत्व प्रदान कर देती है। भट्टकल्लट कहते हैं—'तत्सवेदनद्वारेण यः तदात्मग्रहो मन्त्रन्यासात्मकः स एवो- दयः तस्य ध्येयस्य मन्त्रात्मनः साधकचेतसि, तादात्म्यं तत्स्वभावत्वप्राप्तिः मन्त्रदेवतया सह साधकस्य मन्त्रोच्चारणेच्छया संपादिता ।।' 'तदात्मतासमापत्ति'—शिवत्व प्रदान करने के मार्ग में 'अशुद्धि' (का०क्र० ९) तथा 'क्षोभ' (का० क्र० ९) ही प्रधान प्रतिबन्धक (प्रतियोगी) तत्त्व हैं। पुर्यष्टक देह, प्राण, मन आदि की भूमिका नगण्य है (यदि 'अशुद्धि' एवं 'क्षोभ' का अभाव हो जाय)। इन अशुद्धियों में भी 'कार्ममल' सर्वाधिक प्रतियोगी (विपरीतगामी) तत्त्व है। उत्पल- देवाचार्य कहते है— 'देवादीनां च सर्वेषां, भविनां त्रिविधं मलम् । तत्रापि कार्ममेवैकं, मुख्यं संसारकारणम् ।।'२ इस 'स्पन्दसूत्र' में यह कहा गया है कि— (१) देवता का साक्षात्कार 'ध्याता' को होता है अर्थात् देव-साक्षात्कार के लिए 'ध्यान' प्रमुख तत्त्व है अतः 'देवोदय' के लिए प्रथमतः ध्यान-साधना आवश्यक है। (२) किसी भी ध्यानयोगी को अपने इष्टदेवता का प्रथम साक्षात्कार केवल उसके ध्यानप्रवण चित्त में ही होता है। योगसूत्र में कहा गया है ऐसे साक्षात्कार 'मूर्धा' की 'ज्योति' में हुआ करते हैं—'मूर्ध्नि ज्योतिषि' ।। (३) यह साक्षात्कार 'संवेदन' (भट्टकल्लट के मत में) एवं 'ध्यान' (कारिकाकार १. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति' । २. प्रत्यभिज्ञाकारिका—उत्पलदेव ।
द्वितीयः निष्यन्दः २९७ के मत में) के द्वारा होता है। निष्कर्ष यह कि वह संवेदन जो कि ध्याता को 'ध्यान' तक पहुँचा दे उसी ध्यानलीन संवेदन के द्वारा देव-साक्षात्कार होता है। (४) देव साक्षात्कार (देवता का उदय) कहते किसे हैं? क्या एकाग्रता की अवस्था में अपने चित्त-कल्पित देवाकार का क्षणिक अवभास या झलक ही देव साक्षात्कार है?—नहीं। इसीलिए कारिकाकार का कथन है कि कल्पनाप्रसूत आकार का साक्षात्कार देव-दर्शन नहीं है प्रत्युत् देव दर्शन तो वह है जिसमें निम्न लक्षण हों— (१) ध्यानयोगी के चित्त में ध्यान का विषयीभूत ('ध्येय') देवता ही दिखाई दे अन्य आकार नहीं। कभी-कभी चित्त की एकाग्रता में जिसका ध्यान न किया जाय उसका दर्शन देव-साक्षात्कार की कोटि में नहीं आता क्योंकि संभव है कि वे विघ्न हों—चित्त विकृति के परिणाम हों या निर्बल चित्त की कल्पना हों। (२) इस ध्यान की स्थिति में ध्याता साधक की ध्येयाकाराकारिताचित्तवृत्ति भी हो। इसे ही 'तदात्मता समापत्ति' कहा गया है। यह कल्लट ने इसे 'तत्स्वभावत्वप्राप्ति' कहा है। (३) कारिकाकार का कथन है कि यह 'तदात्मतासमापत्ति' साधक द्वारा इच्छा करते ही प्राप्त हो जाती है। भट्टकल्लट का कथन है कि इच्छा सामान्य इच्छा नहीं प्रत्युत् यह वह इच्छा जो कि मन्त्रप्राणात्मिका हो—'मन्त्रात्मनः साधक चेतसि तादात्म्यं तत्स्वभावत्वप्राप्तिः मन्त्रदेवतया सह साधकस्य मन्त्रोच्चारणेच्छया संपादिता ॥' ध्येय का उदय—(क) साधक 'मन्त्रात्मा' हो (ख) जो मन्त्र जपा जाय उसी देवता का ध्यान किया जाय तथा जिस देवता का ध्यान किया जाय उसी का 'मन्त्र' जपा जाय—मन्त्रदेवतया सह । 'मन्त्रोच्चारणेन'। उसी मन्त्र की एवं उस मन्त्र के देवता के दर्शन की इच्छा करते हुए तदात्मक मन्त्र जपा जाय—'मन्त्रोच्चारणेच्छया'। ऐसा न हो कि 'मन्त्र' किसी अन्य 'देवता' का हो। ध्यान किसी अन्य देवता का हो तथा 'इच्छा' कहीं अन्यत्र टिकी हो। यदि ऐसा हुआ तो ऐसी स्थिति में भी 'देवोदय' संभव नहीं है। योगसूत्र में भी कहा गया है—'तज्जपस्तदर्थभावनम्' (यो०सू०)। (४) प्रश्न उठता है कि यदि 'ध्याता' ध्येय के 'मन्त्र' का ही जप भी कर रहा हो, उसी का 'ध्यान' भी कर रहा हो तथा उसी ध्येय के दर्शन की 'इच्छा' भी कर रहा हो तो क्या इस स्थिति को या इस स्थिति में होने वाले विकल्पात्मिका अनुभूतियों को 'देवोदय' (देवसाक्षात्कार) कहेंगे? तदात्मता समापत्ति—कारिकाकार कहते हैं कि यह भी देवोदय नहीं है। देवोदय (देव दर्शन, देवसाक्षात्कार) अपने अहं को मिटा देने में है—अस्मिता का ध्येय में लय कर देने में है—ध्याता-ध्यान-ध्येय की त्रिपुटी के एकाकार करने या होने में है। इसीलिए कारिकाकार का कथन है कि देवदर्शन 'तदात्मता समापत्ति' है—'तत्स्वभावत्वप्राप्ति' (भट्ट कल्लट) है। ध्याता योगी के चित्त में ध्येय (इष्ट देवता) का साक्षात्कार, (इच्छा के उदित होते
२९८ स्पन्दकारिका ही तत्काल) उस देवता के साथ होने वाले तादात्म्य को कहते हैं। 'संवेदन' के माध्यम से मन्त्रमूर्ति (ध्येय देवता) का मन्त्रात्मक या न्यासपरक (मन्त्र-जप या न्यास-क्रिया) पद्धति से अपनी आत्मा के रूप में ग्रहण (तद्रूपता, तादात्म्यभाव) हो जाता है। (देवता का साधक के द्वारा) उसी आत्मस्वरूप देवता की अपने से अभिन्नतया ग्रहण (आत्मस्वरूप में ग्रहण) देवता के साथ तादात्म्यभाव—साधक के चित्त में 'देवता का उदय' कहलाता है। यह तादात्म्य यह सूचित करता है कि ध्याता साधक ने उस देवता के स्वभाव को प्राप्त कर लिया है—('तादात्म्यं तत्स्वभावप्राप्तिः')। 'आत्मग्रह', 'अमृतप्राप्ति' 'निर्वाण दीक्षा' एवं शिव सद्भाव'—ऐसा शाक्त- समावेश प्राप्त या शक्तिपात प्राप्त ध्याता साधक मन्त्रोच्चारण करने की इच्छा करने मात्र से ही मन्त्रदेवता के साथ उसका तादात्म्य या तत्स्वभाव प्राप्त कर लेता है। इसी स्थिति को 'अमृत प्राप्ति' एवं 'आत्मग्रह' भी कहते हैं। शिवत्वभाव की इस साधना के लिए अनेक आवश्यक तत्त्व हैं—यथा—(१) ध्यान (२) ध्येयाकार चित्त (३) स्वात्मसंवेदन (४) ध्येय (५) ध्येय के साक्षात्कार की इच्छा (६) तदात्मता (७) 'मन्त्रोच्चारण' (मन्त्रजप), (८) योगी के संवेदन में इतनी उदग्र तीव्रता हो कि मन्त्र का उच्चारण करते ही तत्काल चित्त मन्त्र के देवता के साथ एकाकार होकर उसे 'शिवभाव' 'अमृतत्व' 'आत्मग्रह' 'निर्वाणदीक्षा' 'शिवसद्भाव' के उच्चतम शिखर पर आरूढ़ हो जाय। 'तदा-त्मतासमापत्तिरिच्छतः साधकस्य या' (का० क्र० ३१)। भट्टकल्लट— 'स्पन्दसर्वस्व' में कहते हैं— 'इयमेव मिथ्याज्ञानशून्यस्य साधकस्य निरावरणस्वस्वरूपसंवित्तिः अमृतत्वप्राप्तिः न तु रसास्वादरूपस्य धातुसारस्य स्थूलस्यास्वादनम् अमृतप्राप्तिरुक्ता, यैव, मन्त्रोच्चारण- मात्रेणैव मन्त्रस्वरूपावस्थिति प्राप्तिः सैवात्मनो ग्रहणमित्युक्ता । यस्मात् 'आत्मनो ग्रहणं कुर्याद्दीक्षाकाले गुरुर्धिया' इति । न न पुनर्लोष्टादिवत् हस्तेन तस्यामूर्तस्य ग्रहणं भवति, अतएव चेयमेव सा निर्वाणदीक्षा शिवसद्भावयायिनी, परमशिवस्वरूपाभि- व्यञ्जिका ॥ ३२ ॥' अयमेव = यही। उदय = आत्मसंवेदन के द्वारा जो 'तदात्मग्रह' है, मन्त्रन्यासा- त्मक (मन्त्रात्मक + न्यासात्मक = मन्त्र जप + न्यासविधान) आत्मग्रह है वही 'उदय' है। उत्पलदेवाचार्य— 'अयमेव तस्य पूर्वोक्तस्य ध्येयस्य मन्त्रात्मनो ध्यायिचेतस्यु- दयः ॥' (ध्याता के चित्त में उदय)। समापत्ति = एकीभाव । मन्त्रात्मतापत्ति । तदात्मतया ध्येयस्वरूपापत्तिः इत्यर्थः ॥ विश्वसंहिता में 'ध्यान' की व्याख्या इस प्रकार की गई है । 'ध्येये चित्तं यदा लीनं तदा ध्यानमुदाहृतम्' यही है 'ध्यान' का स्वरूप । जब ध्येय में चित्त ध्येयाकार होकर लयीभूत हो जाय तो उसी अवस्था को 'ध्यान' कहा जाता है। ध्येय का प्रत्यक्षीकरण कब होता है? ध्याता को प्रत्यक्षीकरण (देवदर्शन) तभी प्राप्त हो पाता है जब ध्याता
द्वितीयः निष्यन्दः २९९ ध्येय के साथ तन्मय हो जाय— 'ध्येयः प्रत्यक्षतां याति ध्याता तन्मयतां व्रजेत् ॥' कैसे साक्षात्कार हो पाता है ? (१) ऋच्छतस्त्विति (२) पाठाद्वा (३) चिन्तयतोऽत्र या फिर इससे होती है— तदात्मतासमापत्तिरैक्यं तस्योदयः स तु ॥' मन्त्र देवता के साथ जो तादात्म्य प्राप्त होता है और जो कि अन्तः संवेदन के द्वारा आत्मग्रह का कारण बनता है उस मन्त्रन्यासात्मक आत्मग्रह का आविर्भाव ही 'उदय' है । (उत्पलदेवाचार्य) । रामकण्ठ की व्याख्या—तस्य = उसके । उस । किसी । ध्येय = उन उन आकारों के द्वारा स्मर्तव्य, मन्त्र-वाच्य देवता विशेष ॥ उदयः = उस-उस अर्थ क्रिया के संपादक अमोघ शक्ति के द्वारा उन-उन उपास्यों का आकारात्मक प्रथन । इच्छतः = इच्छा करने वाले का । इच्छावस्था में स्थित मन्त्रजप की इच्छा करने वाले का । समापत्तिः = एकीभाव । 'तदात्मता' ध्येय की जो आत्मा है (उसका स्वस्वरूप है) उसका भाव ही 'तदात्मता' । उसके द्वारा प्राप्त 'समापत्ति' (एकीभाव) । न्यासादिक के अभिप्राय से मन्त्रोच्चारणावस्था में मन्त्ररूद्ध देवाकार में साधक के चित्त में बिना प्रयत्न के संपद्यमान अभिन्न रूपत्व है वही है परामर्श करने में सक्षम संवित्ति वाले ध्याता का (मुख्याराध्य देवता का) प्रत्यक्ष देव दर्शन स्वरूप 'उदय' ॥ यही है शिवरूपतापत्ति ॥ रामकण्ठाचार्य कहते हैं कि— इयमेव = यही । यथाप्रतिपादित शरीरादिक विनश्वर वस्तु में अहं प्रत्यय का आलम्बन ग्रहण करने वाले स्वप्रकाश व्यतिरिक्त वेद्यभाव प्रतीति युक्त मिथ्या ज्ञान के उच्छेद के द्वारा अनवच्छिन्न-स्वच्छ-स्वच्छन्द स्वभावमात्रैक तत्त्वोपलब्धिरूपा संवित् (सम्यक् ज्ञान) ही 'अमृत प्राप्ति' है— 'अमृत' का अर्थ है अविनाशी शिवात्मक आत्मा 'प्राप्ति' = उपलब्धि । अमृतप्राप्ति—अविनाशीशिवात्मक आत्मा की प्राप्ति न कि जड़ अमृत की प्राप्ति ॥ ('न तु द्रव्यविशेषात्मकस्य') जड़, अनित्य एवं सामुद्र अमृत को यहाँ अमृत नहीं कहा गया है । आत्मग्रह = इस प्रकार के मन्त्रोच्चारण के काल में क्षणभाविनी जो संवित् तत्त्व रूप आत्मा है । उसका ग्रहण = आत्मग्रह ॥ या दीक्षा के समय गुरु द्वारा शिष्य की आत्मा का ग्रहण = आत्म ग्रह ॥ निर्वाण दीक्षा = द्वैतप्रत्यय से निवृत्ति ही 'निर्वाण' है । यह निर्वाण है क्या? रामकण्ठाचार्य कहते हैं—यह द्वैत प्रत्यय के परिक्षय से प्राप्त आत्यन्तिकी प्रशान्ति है । यह संवित्तत्त्व के स्वस्वभाव की व्यवस्थिति है । 'दीक्षा' क्या है? 'स्वरूप संबोधदानात्मक भेदमय बन्धक्षपणलक्षण वाला संस्कारविशेष दीक्षा है— 'दीक्षा स्वरूपसंबोधदानात्मको भेदमयबन्धक्षपणलक्षणसंस्कार- विशेषः' । शिवसद्भावदायिनी = स्वस्वभावात्मक शिव (परमात्मा) का जो सद्भाव (सत्ता)
३०० स्पन्दकारिका है वही है शिवसद्भाव। इसके द्वारा 'अहमेवास्मि' (मैं ही हूँ)—इस अबाधित प्रतिपत्ति का अनुभव सिद्धावस्था में हुआ करता है। इस अनुभव को प्रदान करने वाली—'शिव सद्भावदायिनी'। यह एक निरुत्तर संस्कार है और यह सुप्रबुद्ध गुरुओं को ही अनुभूत होता है अन्य को नहीं। यह क्या है? यह है परमशिवात्मकस्वरूप की प्राप्ति। यह कोई बाह्य साधनों से साध्य विधिविशेषात्मक विधि नहीं है। 'दीक्षा के समय गुरु शिष्य की आत्मा को ग्रहण करें' 'आत्मनो ग्रहणं कुर्याद्दीक्षा- काले गुरुर्धिया'—ऐसा शास्त्रों में कहा गया है। अतः सुस्पष्ट है कि दीक्षावसर पर गुरु शिष्य की आत्मा का ग्रहण करते हैं। भट्टकल्लट की व्याख्या का सारांश—'इयमेव .... ग्रहः ॥ (१) यही वह मिथ्याज्ञानशून्य साधक की निरावरणस्वस्वरूप संवित्त। यह किसी भौतिक पदार्थ (धातुसार से निर्मित स्थूल वस्तु) का रसास्वाद नहीं है और न तो इसकी प्राप्ति अमृतत्व प्राप्ति ही है। 'पारद' रस कहलाता है। 'रस' से निर्मित औषधियाँ चिरञ्जीवत्व प्रदान करती हैं और शक्तिदायिनी होती हैं किन्तु उन्हें तथा सामुद्र पीयूष को अमृत नहीं कहा गया है। 'आत्मग्रह' आत्मा की अनुभूति है। यह तब होती है जब मन्त्र के उच्चारण से मन्त्रस्वरूप में अवस्थिति होती है—अर्थात् मन्त्र-देवता के साथ स्वरूपसाक्षात्कार की स्थिति प्राप्त होती है। अन्तर्विमर्श की स्थिति में शिष्य को प्रदत्त मन्त्र की देवता के स्वरूप में अवस्थान ही 'आत्मग्रह' है। (२) आकारशून्य आत्मा को मिट्टी के ढोंके या किसी अन्य स्थूल पदार्थ की भाँति हाथ से पकड़ा नहीं जाता। इस कारण यह आत्मानुभूति ही 'निर्वाण दीक्षा' होती है। यह साधक के भीतर अनुत्तर शिवभाव को अभिव्यक्त कर देती है। इच्छतः = इच्छया ॥ भट्टकल्लट ने 'इच्छतः' का अर्थ इच्छा ही किया है। प्रश्न है कैसी इच्छा? (१) 'परा' गता इच्छा = सूक्ष्मतम आत्मस्पर्श = आन्तरिक विमर्श से संबद्ध अव्यक्त ध्वनि ॥ (२) पश्यन्ती गता इच्छा = सूक्ष्मतर आत्मस्पर्श = अव्यक्त ॥ (३) मध्यमा गता इच्छा = सूक्ष्म आत्मस्पर्श = अव्यक्त ध्वनिरूपा ॥ (४) वैखरी गता इच्छा = स्थूल आत्मस्पर्श = व्यक्त ध्वनिरूपा ॥ स्थूल शब्दोच्चारण की स्थितियाँ—(१) आन्तर्विमर्शात्मिका, अव्यक्त नाद से सम्बद्ध ॥ अन्तर्मुख। (२) अव्यक्तानुगामिनी व्यक्तध्वनिमयी, वैखरीमयी ॥ बहिर्मुख इच्छतः पद में (मन्त्रोच्चारण के संदर्भ में) विमर्शात्मिका अव्यक्त इच्छा ॥ ('शाक्तोपाय' वाले साधकों के सभी कार्य विमर्शात्मक होते हैं।)
द्वितीयः निष्यन्दः ३०१ वैखरीवाक् आणव उपाय से सम्बद्ध है। इस स्तर पर मन्त्र साधकों का (निम्न- स्तरीय साधकों का) मन्त्रोच्चारण वैखरीवाक् के स्तर पर स्थूल वर्णों द्वारा स्थूल पद्धति से किया जाता है और उच्चारित ध्वनि एवं मन्त्र व्यक्त होते हैं न कि अव्यक्त ॥ मन्त्रों का विमर्शात्मक उच्चारण इतना शक्तिसम्पन्न होता है कि साधक का चित्त एवं परप्रकाशात्मक 'बिन्दु' ('यथा शरो धनुः संस्थो यत्नेनाताड्य धावति । तथा बिन्दुर्वरारोहे उच्चारेणैव धावति ।) की तीव्रता धनुष से चलाए गए शर की भाँति होती है। भट्टकल्लट ने जिस 'संवेदन' का उल्लेख किया है उसका स्वरूप क्या है? यहाँ उस 'संवेदन' का उल्लेख किया गया है जिसमें कि विकल्पों को संस्कारित करने से योगी की एकाग्रता इतनी तीव्र हो जाती है कि वह इन्द्रियों के द्वारों से बाह्योन्मुख होती हुई संवित् तत्त्व के प्रवाह को अलंग्रास द्वारा हृदय के अन्तरतम् में संकेन्द्रित कर लिया जाता है। इस अवस्था में मन्त्र-विमर्श के बाद तत्काल ही मन्त्रदेवता के साथ चित्त का तादात्म्य (एकीभाव) हो जाता है। इस साक्षात्कार को संवेदनात्मक इसलिए कहा जाता है क्योंकि देवता अपने यथार्थ स्वस्वरूप से पृथक् कोई शारीरिक सत्ता नहीं है। यह भूमिका शाक्तोपाय के उस उच्च स्तर पर स्थित है जिसमें परमेश्वर का तीव्र शक्तिपात होता है। ऐसे सिद्ध योगियों का आध्यात्मिक स्तर इस प्रकार का होता है— (१) अस्मिंश्च यागे विश्रान्तिं कुर्वतां भवाडम्बरः । हिमानीव महाग्रीष्मे स्वयमेव विलीयते ॥ (२) केतकी कुसुम सौरभे भृशं भृंग एवं रसिको न मक्षिका । भैरवीय परमाद्वयार्चने कोऽपि रज्यति महेशचोदितः ॥ अर्थात् यथा ग्रीष्मर्तु में हिमसन्तति स्वयं गल जाती है उसी प्रकार योगी के लिए संसार एक व्यर्थाडम्बर है। केतकी सुमन के परिमल का प्रेमी भौंरा ही होता है न कि मक्षिका। इसी प्रकार भैरवीय अभेद भूमिका के प्रति किसी विरले योगी की ही उत्कण्ठा होती है न कि सामान्य व्यक्ति की ॥ 'निर्वाण दीक्षा' में 'दीक्षा' का क्या अर्थ है? 'कुलार्णवतन्त्र' में कहा गया है— दीयते ज्ञानसद्भावः क्षीयन्ते कर्म वासनाः । दानक्षपणसंयुक्ता दीक्षा तेनेह कीर्तिता ॥ (तं० वि०: क्षेमराज) 'दीक्षा' के अनेक प्रकार हैं यथा (१) 'हौत्री' (२) 'वैधी' (३) 'कलावती' (४) 'स्पार्शी' आदि । मन्त्र के देवता और चित्त का सम्बन्ध—ध्येय देवता का ध्याता साधक के चित्त में 'उदय'—देव साक्षात्कार ध्याता योगी के चित्त में ध्येय (ध्यानालम्बन देवता) का प्रत्यक्ष साक्षात्कार होना इसे ही कहते हैं कि उसके चित्त में इच्छा (देव-साक्षात्कार की इच्छा) होते ही (साधक की) देवता के साथ उसका तादात्म्य प्राप्त हो जाय ॥ भट्टकल्लट कहते हैं—संवेदन के माध्यम से जो उस ध्येय (मन्त्रस्वरूप या मन्त्र-