भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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२९२ स्पन्दकारिका —इस प्रकार कहकर इस तन्त्र द्वारा अंत में उपसंहार में यह कहा गया है— (२) अथवा परतत्त्वस्थः सर्वकालैर्न बाध्यते ॥ (७।२२३) (३) सर्वं शिवशक्तिमयं स्मरेत्— जीवन्नेव विमुक्तोऽसौ यस्येयं भावना सदा । यः शिवं भावयेन्नित्यं न कालः कलयेत्तु तम् ॥ योगी स्वच्छन्दयोगेन स्वच्छन्दगतिचारिणा । स स्वच्छन्दपदे युक्तः स्वच्छन्दसमतां व्रजेत् ॥ स्वच्छन्दश्चैव स्वच्छन्दः स्वच्छन्दो विचरेत् सदा ॥ (७।२५८) (४) यही ‘ज्ञान’ भी है—‘अयमेव आत्मनो ग्रहो ज्ञानं यदुच्यते आत्मा ज्ञातव्य इति तत्र इदमेव—सर्वज्ञसर्वकर्तृस्वतन्त्रशिवस्वरूपतया प्रत्यभिज्ञानं आत्मनो ज्ञानम्’ । (५) त आत्मोपासकाः सर्वे न गच्छन्ति परं पदम् ॥ (स्व० ४।३८८) आत्मसाक्षात्कार के लिए ‘दीक्षा’ भी आवश्यक है—१ (१) दीक्षा गुरु का शिष्य की आत्मा के प्रति अनुग्रह है जो कि दीक्षा के समय शिष्य की आत्मा को परमात्मा के साथ मिलाने की पद्धति के लिए अनिवार्य है । गुरु उपलब्धि के मार्ग को जानकर (सम्प्राप्ति की इस पद्धति को जानकर) शिष्य की आत्मा को शिव के साथ मिलाकर एकाकार देता है । (२) पारमार्थिक स्वरूपदायिनी दीक्षा निर्वाण दीक्षा है जो निम्नांकित है— ‘एवं यो वेद तत्त्वेन तस्य निर्वाणदायिनी । दीक्षा भवत्यसंदिग्धा तिलाज्याहुतिवर्जिता ॥ (प० २५) यह मोक्षदायिनी दीक्षा (Liberative initiation) है । यह ‘पुत्रक’ आदि की दीक्षा शिवाभिन्न रूप में स्थित है और शिव से एकता प्राप्त कराती है । जो परासत्ता को जानता है वह उस दीक्षा को प्राप्त करता है जो कि तिल एवं घी की आहुतियों (Offerings) से रहित रहकर भी मोक्ष प्रदान करती है ।२ इस दीक्षा में यह भावना की जाती है कि—‘मैं स्वयमेव शिव हूँ । मैं ज्ञान एवं आनन्द से परिपूर्ण हूँ । मेरा शरीर यह विश्व है क्योंकि इसके साथ मेरी पूर्ण एकता है । यह एकता इसकी चेतना के रूप में स्थित है । मेरी विश्व के साथ अभिन्नता एवं एकता है ॥’ ‘ओ परमात्मन्! इस विश्व में ऐसा कौन है जो कि साधकों के लिए पवित्र स्थान की भाँति पवित्र नहीं है? सभी आपके साथ अभिन्न हैं। ऐसा कौन सा स्थान है जहाँ मन्त्र अपना फल नहीं देते?’ ‘ऐसी कौन सी अवस्था है जो शिव नहीं है?’ साधक को शिव बनकर शिव की

१-२. स्पन्दनिर्णय ।