स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः निष्यन्दः २९३ पूजा करनी चाहिए ।। 'समग्र विश्व को शिव एवं शक्ति का ही रूप मानना चाहिए ।।'— जिसे इस प्रकार का दृढ़ ज्ञान हो चुका है वह चाहे जीवित ही क्यों न हो स्वच्छन्द (स्वतन्त्र) है। वह योगी 'स्वच्छन्द' पर ध्यान करता है। वह 'स्वच्छन्द' के साथ योग के द्वारा ऐकात्म्य प्राप्त कर लेता है और 'स्वच्छन्द' की भाँति जीवन व्यतीत करने लगता है। वह स्वच्छन्द बनकर स्वतन्त्र एवं आत्मनिर्भर, निरावलम्ब एवं निर्बन्ध जीवन जीने लगता है।¹ यही 'प्रत्यभिज्ञा' (Cognition) है और यही 'आत्मज्ञान' है। 'आत्मा का ज्ञान होना चाहिए'—इसका अर्थ यह है कि आत्मा शिव के साथ अभिन्न है।² पूर्वोक्त मन्त्रात्मा ध्येय का यही ध्याता के चित्त में उदय है। जो साधक या ध्याता मन्त्रात्मा से एकत्व चाहता है, उसकी यही तदात्मता अथवा ध्येयस्वरूपापत्ति है। 'विश्वसंहिता' में कहा गया है—'जब चित्त ध्येय में लीन हो जाता है तब उसे 'ध्यान' कहते हैं। इसमें ध्येय प्रत्यक्ष हो जाता है और ध्याता तन्मय हो जाता है।'— 'ध्येये चित्तं यदा लीनं तदा ध्यानमुदाहृतम् । ध्येयः प्रत्यक्षतां याति ध्याता तन्मयतां व्रजेत् ॥ ऋच्छतस्त्विति पाठाद्वा ध्येयं चिन्तयतोऽत्र या । तदात्मतासमापत्तिरैक्यं तस्योदयः स तु ।।' (मूल श्लोक में 'इच्छतः' के स्थान में 'ऋच्छतः' पाठ भी माना जाता है।) उसका अभिप्राय यह है कि ध्येय का चिन्तन करते करते जो उसके साथ तदात्मतापत्ति है अर्थात् एकता है, वही उसका उदय है। ग्रन्थकर्ता 'इच्छतः' एवं 'ऋच्छतः' दोनों का आशय ठीक मानते हैं क्योंकि मन्त्रोच्चारण की इच्छा से मन्त्रदेवता के साथ जो तादात्म्य है, वह वस्तुतः संवेदन द्वारा उससे एकता ही है। मन्त्र न्यास द्वारा जीवन में देवता का आविर्भाव ही होता है। यह जो स्वरूप-संवेदन है, यही आत्मा की अमृतत्व की प्राप्ति है। जरा एवं मरण की परम्परा का विच्छेद होने से जो अपुनर्भवता है उसे हम 'मुक्ति' नहीं कहते। दुग्ध- समुद्र से स्वतः उद्भूत यही आत्मा का अनुग्रह है। यही 'निर्वाण-दीक्षा' है और यही परमात्मा से मिलन है। 'मोक्षधर्म' में कहा गया है—सभी संकल्पों का त्याग करके सत्व में चित्त को निविष्ट कर देना चाहिए। जब चित्त सत्व में विलीन हो जाता है तब काल पर विजय प्राप्त हो जाती है— 'हित्वा तु सर्वसंकल्पान् सत्वे चित्तं निवेशयेत् । सत्वे चित्तं यदा लीनं ततः कालञ्जयो भवेत् ॥' यह जो स्वरूप-संवित्ति है यही आत्मा को अमृतत्त्व-प्राप्ति है। जरामरण की परम्परा का उच्छेद होने से यही अपुनर्भवता है और हम इसे ही जन्ममरण के चक्र का अभाव कहते हैं— १-२. स्पन्दनिर्णय ।