भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 395

२९४ स्पन्दकारिका 'येयं स्वरूपसंवित्तिः साऽमृताप्तिरिहात्मनः । जरामरणविच्छेदादपुनर्भवता न तु ॥ दुग्धाब्ध्युद्गतस्यायमेव चात्मनोऽनुग्रहः स्वतः ॥ निर्वाण दीक्षा तत्त्वेयं परात्मनियोजिका ॥' जन्ममरण की परम्परा का विच्छेद मुक्ति नहीं है यह 'आत्मा का अनुग्रह है।' आत्मसंबोध में भी कहा गया है कि—'स्वभाव-संवित् का ज्ञान ही मनुष्य के लिए भव से मुक्ति का हेतु होता है । एक बार का अमृतपान मृत्युग्रस्त को अमर बना देता है । 'भवेद्भवनामभयाय नूनं स्वभाव संविद्विदितैव पुंसाम् । अमर्त्यतां मर्त्यजने करोति सकृत्सुधाप्राशनमात्रमेव ॥' दीक्षा पद का क्या अर्थ है? ज्ञानसद्भाव का दान एवं अखिल मल का क्षपण । बोधानुवेध से दीक्षा देने से 'दान' एवं 'क्ष' से क्षपण अर्थ बोधित होता है— ददाति ज्ञानसद्भावं क्षपयत्यखिलं मलम् । बोधानुवेधाद्दीक्षोक्ता दानक्षपणधर्मिणी ॥१ अभेदोपलब्धि नाम वाले इस चतुर्थ निष्यन्द के ये प्राथमिक दो श्लोक हैं । इनमें अभेदोपलब्धि के उपायों की चर्चा करते हुए कारिकाकार मन्त्र, न्यास आदि समस्त विधिसंस्कारों की सार्थकता एवं उनकी उपादेयता को रेखांकित कर रहा है । मन्त्रात्मा शिवभाव का उदय कैसे हो—इसकी ये अन्य युक्तियाँ हैं । 'ध्यानी' साधक के चित्त मन्त्रात्मा 'ध्येय' का जो आविर्भाव होता है उसे ही कारिकाकार ने 'उदय' कहा है । 'ध्यानी' साधक की मन्त्रात्मा 'ध्येय' से एकत्वापत्ति या ध्येयस्वरूपापत्ति (तदात्मता) ही साधना का लक्ष्य है । मन्त्र योग—तस्य = उसका 'किसी ध्याता का । स्मर्तव्य, मन्त्रवाच्य, देवता का ध्यान के विषयीभूत देव का । उदय = उस ध्यानालम्बन या ध्येय की प्रतिपत्ति हेतु की गई साधनाओं एवं क्रियाओं के द्वारा उस अमोघशक्ति उपास्य देवता का साकार रूप में प्रथन या आविर्भाव 'उपास्येनाकारेण प्रथनम्' ॥ किस अधिकरण में?—ध्यायि चेतसि = ध्याता के चित्त में । चेतसि = चित्त में । संकल्प में । कौन सा उदय?—इच्छतः इच्छावस्था में वर्तमान मन्त्रोच्चार करने की इच्छा रखने वाले साधकस्य = साधक का ॥ अभियुक्त का । तदात्मता समापत्तिः = वस्तु सामर्थ्यसिद्धा समापत्ति । उस ध्येय आत्मा के स्वरूप के भाव के साथ होने वाली तदात्मता के द्वारा प्रादुर्भूत समापत्ति या एकीभाव । भाव यह कि—न्यास आदि के लिए मन्त्रोच्चारण की इच्छावस्था में मन्त्रों के द्वारा रुद्ध देवताकार साधकचित्त प्रयत्नविरहित संपद्यमान अभिन्नरूपत्व ही परामर्शक्षमसंवित् वाले ध्याता के मुख्य आराध्य देवता का १. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।