स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 400, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः निष्यन्दः २९९ ध्येय के साथ तन्मय हो जाय— 'ध्येयः प्रत्यक्षतां याति ध्याता तन्मयतां व्रजेत् ॥' कैसे साक्षात्कार हो पाता है ? (१) ऋच्छतस्त्विति (२) पाठाद्वा (३) चिन्तयतोऽत्र या फिर इससे होती है— तदात्मतासमापत्तिरैक्यं तस्योदयः स तु ॥' मन्त्र देवता के साथ जो तादात्म्य प्राप्त होता है और जो कि अन्तः संवेदन के द्वारा आत्मग्रह का कारण बनता है उस मन्त्रन्यासात्मक आत्मग्रह का आविर्भाव ही 'उदय' है । (उत्पलदेवाचार्य) । रामकण्ठ की व्याख्या—तस्य = उसके । उस । किसी । ध्येय = उन उन आकारों के द्वारा स्मर्तव्य, मन्त्र-वाच्य देवता विशेष ॥ उदयः = उस-उस अर्थ क्रिया के संपादक अमोघ शक्ति के द्वारा उन-उन उपास्यों का आकारात्मक प्रथन । इच्छतः = इच्छा करने वाले का । इच्छावस्था में स्थित मन्त्रजप की इच्छा करने वाले का । समापत्तिः = एकीभाव । 'तदात्मता' ध्येय की जो आत्मा है (उसका स्वस्वरूप है) उसका भाव ही 'तदात्मता' । उसके द्वारा प्राप्त 'समापत्ति' (एकीभाव) । न्यासादिक के अभिप्राय से मन्त्रोच्चारणावस्था में मन्त्ररूद्ध देवाकार में साधक के चित्त में बिना प्रयत्न के संपद्यमान अभिन्न रूपत्व है वही है परामर्श करने में सक्षम संवित्ति वाले ध्याता का (मुख्याराध्य देवता का) प्रत्यक्ष देव दर्शन स्वरूप 'उदय' ॥ यही है शिवरूपतापत्ति ॥ रामकण्ठाचार्य कहते हैं कि— इयमेव = यही । यथाप्रतिपादित शरीरादिक विनश्वर वस्तु में अहं प्रत्यय का आलम्बन ग्रहण करने वाले स्वप्रकाश व्यतिरिक्त वेद्यभाव प्रतीति युक्त मिथ्या ज्ञान के उच्छेद के द्वारा अनवच्छिन्न-स्वच्छ-स्वच्छन्द स्वभावमात्रैक तत्त्वोपलब्धिरूपा संवित् (सम्यक् ज्ञान) ही 'अमृत प्राप्ति' है— 'अमृत' का अर्थ है अविनाशी शिवात्मक आत्मा 'प्राप्ति' = उपलब्धि । अमृतप्राप्ति—अविनाशीशिवात्मक आत्मा की प्राप्ति न कि जड़ अमृत की प्राप्ति ॥ ('न तु द्रव्यविशेषात्मकस्य') जड़, अनित्य एवं सामुद्र अमृत को यहाँ अमृत नहीं कहा गया है । आत्मग्रह = इस प्रकार के मन्त्रोच्चारण के काल में क्षणभाविनी जो संवित् तत्त्व रूप आत्मा है । उसका ग्रहण = आत्मग्रह ॥ या दीक्षा के समय गुरु द्वारा शिष्य की आत्मा का ग्रहण = आत्म ग्रह ॥ निर्वाण दीक्षा = द्वैतप्रत्यय से निवृत्ति ही 'निर्वाण' है । यह निर्वाण है क्या? रामकण्ठाचार्य कहते हैं—यह द्वैत प्रत्यय के परिक्षय से प्राप्त आत्यन्तिकी प्रशान्ति है । यह संवित्तत्त्व के स्वस्वभाव की व्यवस्थिति है । 'दीक्षा' क्या है? 'स्वरूप संबोधदानात्मक भेदमय बन्धक्षपणलक्षण वाला संस्कारविशेष दीक्षा है— 'दीक्षा स्वरूपसंबोधदानात्मको भेदमयबन्धक्षपणलक्षणसंस्कार- विशेषः' । शिवसद्भावदायिनी = स्वस्वभावात्मक शिव (परमात्मा) का जो सद्भाव (सत्ता)