स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९८ स्पन्दकारिका ही तत्काल) उस देवता के साथ होने वाले तादात्म्य को कहते हैं। 'संवेदन' के माध्यम से मन्त्रमूर्ति (ध्येय देवता) का मन्त्रात्मक या न्यासपरक (मन्त्र-जप या न्यास-क्रिया) पद्धति से अपनी आत्मा के रूप में ग्रहण (तद्रूपता, तादात्म्यभाव) हो जाता है। (देवता का साधक के द्वारा) उसी आत्मस्वरूप देवता की अपने से अभिन्नतया ग्रहण (आत्मस्वरूप में ग्रहण) देवता के साथ तादात्म्यभाव—साधक के चित्त में 'देवता का उदय' कहलाता है। यह तादात्म्य यह सूचित करता है कि ध्याता साधक ने उस देवता के स्वभाव को प्राप्त कर लिया है—('तादात्म्यं तत्स्वभावप्राप्तिः')। 'आत्मग्रह', 'अमृतप्राप्ति' 'निर्वाण दीक्षा' एवं शिव सद्भाव'—ऐसा शाक्त- समावेश प्राप्त या शक्तिपात प्राप्त ध्याता साधक मन्त्रोच्चारण करने की इच्छा करने मात्र से ही मन्त्रदेवता के साथ उसका तादात्म्य या तत्स्वभाव प्राप्त कर लेता है। इसी स्थिति को 'अमृत प्राप्ति' एवं 'आत्मग्रह' भी कहते हैं। शिवत्वभाव की इस साधना के लिए अनेक आवश्यक तत्त्व हैं—यथा—(१) ध्यान (२) ध्येयाकार चित्त (३) स्वात्मसंवेदन (४) ध्येय (५) ध्येय के साक्षात्कार की इच्छा (६) तदात्मता (७) 'मन्त्रोच्चारण' (मन्त्रजप), (८) योगी के संवेदन में इतनी उदग्र तीव्रता हो कि मन्त्र का उच्चारण करते ही तत्काल चित्त मन्त्र के देवता के साथ एकाकार होकर उसे 'शिवभाव' 'अमृतत्व' 'आत्मग्रह' 'निर्वाणदीक्षा' 'शिवसद्भाव' के उच्चतम शिखर पर आरूढ़ हो जाय। 'तदा-त्मतासमापत्तिरिच्छतः साधकस्य या' (का० क्र० ३१)। भट्टकल्लट— 'स्पन्दसर्वस्व' में कहते हैं— 'इयमेव मिथ्याज्ञानशून्यस्य साधकस्य निरावरणस्वस्वरूपसंवित्तिः अमृतत्वप्राप्तिः न तु रसास्वादरूपस्य धातुसारस्य स्थूलस्यास्वादनम् अमृतप्राप्तिरुक्ता, यैव, मन्त्रोच्चारण- मात्रेणैव मन्त्रस्वरूपावस्थिति प्राप्तिः सैवात्मनो ग्रहणमित्युक्ता । यस्मात् 'आत्मनो ग्रहणं कुर्याद्दीक्षाकाले गुरुर्धिया' इति । न न पुनर्लोष्टादिवत् हस्तेन तस्यामूर्तस्य ग्रहणं भवति, अतएव चेयमेव सा निर्वाणदीक्षा शिवसद्भावयायिनी, परमशिवस्वरूपाभि- व्यञ्जिका ॥ ३२ ॥' अयमेव = यही। उदय = आत्मसंवेदन के द्वारा जो 'तदात्मग्रह' है, मन्त्रन्यासा- त्मक (मन्त्रात्मक + न्यासात्मक = मन्त्र जप + न्यासविधान) आत्मग्रह है वही 'उदय' है। उत्पलदेवाचार्य— 'अयमेव तस्य पूर्वोक्तस्य ध्येयस्य मन्त्रात्मनो ध्यायिचेतस्यु- दयः ॥' (ध्याता के चित्त में उदय)। समापत्ति = एकीभाव । मन्त्रात्मतापत्ति । तदात्मतया ध्येयस्वरूपापत्तिः इत्यर्थः ॥ विश्वसंहिता में 'ध्यान' की व्याख्या इस प्रकार की गई है । 'ध्येये चित्तं यदा लीनं तदा ध्यानमुदाहृतम्' यही है 'ध्यान' का स्वरूप । जब ध्येय में चित्त ध्येयाकार होकर लयीभूत हो जाय तो उसी अवस्था को 'ध्यान' कहा जाता है। ध्येय का प्रत्यक्षीकरण कब होता है? ध्याता को प्रत्यक्षीकरण (देवदर्शन) तभी प्राप्त हो पाता है जब ध्याता