स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 40, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि ३९ साक्षात्कार करना चाहता है तब वह विमर्श शक्ति रूपी दर्पण में अपने अहं को देखता है—उसका यह अहंसाक्षात्कार ही जगत् है अतः वह विश्व को अहमाकार देखता है । उसका 'विमर्श' है 'अहमिदम्' अर्थात् 'इदम्' (जगत) 'अहं' ही है—अहं के अतिरिक्त जगत् है ही नहीं—'इदम्' (जगत) अहं का ही एक अंश है । 'अहं' के दो अंश है—१. 'अहं' (आत्मा) २. 'इदम्' (जगत) । 'लीलात्मक विनोदवाद'—जगत् शिव का 'विनोद' है—सकलभुवनोदयस्थिति- लयमयलीलाविनोदोद्युक्तः । अनन्तर्लीनविमर्शः पातु महेशः प्रकाशमात्रतनुः ।। (कामकलाविलास) । 'स्वेच्छावाद' एवं 'इच्छासृष्टिवाद'—ईश्वरस्य जगत्सृष्ट्यादिकं लीलामात्रम् न प्रयोजनमस्तिः स्वेच्छयास्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति । 'स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगिरत्युद्गि- रत्यपि' । 'चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद् बहिः । योगीव निरूपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ।।' स्वभाववाद—जगत् 'स्वभाव' है अर्थात् 'स्व' का भाव है—जीव भी 'स्व' का भाव है । (१) स एव सर्वभूतानां स्वभावः परमेश्वरः । स एव भैरवो देवो जगद्भरणलक्षणः ।। (२) इस परमेश्वर की पराशक्ति भी 'स्वभावामर्शनोत्सुका' है— तस्यैवैषा परा देवी स्वभावामर्शनोत्सुका । पूर्णत्वं सर्वभावानां यस्या नाल्पं न वाधिकम् । 'स्वभाव'—का स्फार ही जीवन एवं जगत् दोनों है । जगत् एवं जीव दोनों 'स्व' के आनन्दात्मक उल्लास हैं—शक्ति के अवभास हैं—शिव के अवरोहण क्रीडा रूप स्वभाव के चमत्कार हैं । सर्वात्मवाद—इन समस्त भावों में आत्मा ही स्फुरित होती है इसीलिए सोमानन्द 'शिवदृष्टि' में कहते हैं— आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निवृतचिद्विभुः । अनिरुद्धेच्छाप्रसरः प्रसरद् दृक्क्रियः शिव ।। अहन्तावाद का विकास—विश्व के समस्त धर्म और दर्शन उपदेश देते हैं कि अहन्ता को निर्मूल करो क्योंकि जब तक 'अहन्ता' (अहंभाव) रहेगा तब तक आध्यात्मिक साधना में उन्नति संभव नहीं हो सकती । साधक परिवार, परिजन, गृह, वसन, भोग, उच्चपद और परिग्रह आदि सभी का परित्याग कर देता है किन्तु अपनी अहन्ता (अहंभाव) का परित्याग नहीं कर पाता । जब तक 'अहं' रहेगा तब तक 'इदम्' रहेगा ही और जब तक अहं-इदं का द्वैत बना रहेगा तब तक पूर्णत्व, शिवत्व, मुक्ति, कैवल्य या मोक्ष की कोई संभावना नहीं है ।