स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० स्पन्दकारिका काश्मीरीय 'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञा' की दृष्टि—संपूर्ण त्रिक दर्शन 'अहन्तावाद' में आस्था रखता है। ये दर्शन यह मानते हैं कि अहन्ता का विकास ही मुक्ति का साधन है। जो साधक अपनी अहन्ता का जितना ही उच्च से उच्चतर विकास करेगा वह उतनी ही आध्यात्मिक उन्नति करेगा तथा उतना ही अधिक पूर्णत्व, शिवत्व एवं परमपद के निकट पहुँचेगा। 'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञा' दर्शन की मान्यता है कि जिसने अहन्ता को उच्चतम शिखर तक पहुँचा दिया है वह साक्षात् शिव है—वह 'चक्रेश्वर' है—वह 'परमात्मा' है—वह 'शक्तिमान' है—वह अद्वैत पर ब्रह्म है। 'अहन्ता का सत्स्वरूप'—'विरूपाक्षपञ्चाशिका' (विश्वशरीर स्कंध) में तो यहाँ तक कहा गया है कि 'ईश्वरता' 'कर्तृत्व' 'चित्स्वरूपता' का भी स्वस्वरूप 'अहन्ता' है। 'ईश्वरता कर्तृत्व स्वतन्त्रता चित्स्वरूपता चेति। एतेऽहन्तायाः किल पर्यायाः सद्बिरुच्यते ।।' (१।८) इसीलिए इसमें कहा गया है कि सर्वत्र 'अहन्ता' धारण करे— 'बिन्दुं प्राणं शक्तिं मनइन्द्रियमण्डलं शरीरं च। आविश्य चेष्टयन्ती धारय सर्वत्र चाहन्ताम् ।।' (१।७) संपूर्ण विश्व में अहन्ता (अहंभाव) धारण करना विश्वात्मभाव—'विश्वोऽहं' का भाव एवं उसकी अखण्ड अनुभूति ही तो मोक्ष है। संपूर्ण विश्व में अपनी अहन्ता का विराट् प्रसार देखना विश्वात्मभाव है किन्तु विश्व के किसी एक अंश में अहंभाव धारण करना जीवन्मृतत्व है— 'उत्क्रम्य विश्वतोऽङ्गात् तद्भागैकतनुनिष्ठताहन्तः। कण्ठलुण्ठत्राण इव व्यक्तं जीवन्मृतो लोकः ।।' 'ईश्वरता' 'सर्वज्ञता' सर्वकर्तृता, स्वतन्त्रता, चित्स्वरूपता 'शिवोऽहं' की भावना— 'पूर्णाहन्ता' के पर्याय हैं। ये बंधन नहीं महामुक्ति के पर्याय हैं। अहन्ता का शुद्ध परामर्श—'विश्वाहन्ता' या 'पूर्णाहन्ता' ही साधना के विकास का चरम सोपान है। जिस प्रकार शरीर में ही अहन्ता (अस्मिता) का प्रत्यय या अनुभूति प्रमाता को (मितात्मा को) जड़ हाथों से भी कार्य कराने की शक्ति प्रदान कर देता है उसी प्रकार यदि चेतनतत्त्व में अहन्ता का आधान किया जाय तो निश्चल पर्वतों को भी चलायमान एवं संचालित किया जा सकता है— देहेस्मिततया यद्रुज्जडडोरास्फालनं मिथोः बाह्वोः । इच्छामात्रेणेत्यं गिर्योरपि तद्द्शाज्जगति ।। (वि०प०६) यौगिक सिद्धियाँ अपूर्ण ख्याति हैं। शिवता का समावेश पूर्ण ख्याति है। विमर्श के द्वारा इदन्ता का अहन्ता में लय करके विश्वात्मभाव से सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्व आदि स्वयं आविर्भूत विभूतियों से संवलित परमैश्वर्य की संप्राप्ति करना ही समस्त उपदेशों का सार है। इसके द्वारा 'यामलीसिद्धि' का वर्णन किया गया है—