स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 42, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि ४१ 'अहो संसारसुखकेलि अहो सुलभं मोक्षमार्गे सौभाग्यम् । त्रुटितान्तककलंका अहो शिवयोगिनां यामलीसिद्धिः ।। 'महार्थमंजरी' इदन्ता-अहन्ता के ऐक्य से समुत्पन्न पूर्णाहन्ता स्वरूप संवित् का साक्षात्कार (प्रत्यभिज्ञान) । भास्करराय 'प्रकाश' ('वरिवस्यारहस्यम्' की व्याख्या) में कहते हैं कि— 'इच्छामि' 'जानामि' इत्यादि उदाहरणों में प्रथम पुरुष की वर्तमानता एवं उसमें भासमान स्फुरणान्वयि अहं का ज्ञान ही प्रकाशाभिध ब्रह्म है । यह सर्वज्ञत्व, सर्वेश्वरत्व, सर्व- कर्तृत्व, पूर्णत्व, एवं सर्वव्यापकत्व आदि से संवलित है । उसका आनन्दरूपांश ही 'स्फुरण' है, वही 'अहन्ता' है, वही 'विमर्श' है, वही परा ललिता भट्टारिका त्रिपुर- सुन्दरी है— 'अत्रेयं तांत्रिकप्रक्रिया—'इच्छामि' 'जानामि' इत्यादावुत्तम पुरुषान्तर्भासमानं स्फुरणान्वयि ज्ञानमेव प्रकाशाभिधं ब्रह्म । तच्च सर्वज्ञत्व-सर्वेश्वरत्वसर्वकर्तृत्व-व्यापकत्वादि शक्तिसंवलितम् । तस्य चानन्दरूपांश एव स्फुरणं परा अहंता, विमर्शः, परा ललिता भट्टारिका, त्रिपुरसुन्दरीत्यादि पदैर्व्यवह्रियते ।' 'अहन्ता' साक्षात् भगवती महात्रिपुरसुन्दरी हैं । 'अहन्ता' शिव का 'आत्मविमर्श' है—स्फुरत्ता है—पराशक्ति है—शिव का आत्मधर्म है और सर्वेश्वर शिव की आधीन आत्मभूता 'शक्ति' है । 'विश्वरूपो महेश्वरः' ('प्रत्यभिज्ञाकारिका') की महेश्वरता महेश्वर में देखना 'स्पन्द'—'प्रत्यभिज्ञा' का लक्ष्य नहीं है प्रत्युत् (१) महेश्वरता (२) विश्वरूपता इन दोनों की अपने में अनुभूति कर—'महेश्वरोऽहं' 'विश्वोऽहं' की अनुभूति करना ही 'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञा' का लक्ष्य है । यदि चिदात्मा के साथ तादात्म्य प्राप्त करना ही पूर्णता है तो उसके 'विश्वोऽहं' के विमर्श के साथ ही तदात्मता प्राप्त करनी होगी क्योंकि वह केवल 'विश्वातीत' ही नहीं 'विश्वमय' भी है— 'चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद्बहिः । योगीव निरुपादानमर्थजात प्रकाशयेत् ॥ (प्र०का०१।३८) 'इच्छया भासयेद् बहिः ।' (प्र०का० ५९) समस्त प्राणियों में एक ही आत्मा (महेश्वर) अवस्थित है अतः निखिल विश्व में अखण्ड अहं की अनुभूति, अखण्डित रूप में अहं का आमर्श शिव का (महेश्वर का) स्वभाव है, स्वरूप है— स्वात्मैव सर्वजन्तूनामेक एव महेश्वरः । विश्वरूपोऽहमित्येवमखण्डामर्शबृंहितः ॥ (प्रत्यभिज्ञा का० ४।१) उस महेश्वर के साथ तादात्म्य प्राप्त करने हेतु साधक को भी 'विश्वोऽहं' का विमर्श करना आवश्यक है । साधक में दो भाव होने चाहिए—१. सोऽहं २. 'ममायं विभव' (सोऽहं ममायं विभव इत्येवं परिजानतः) (प्रत्य० का० ४।१२) विश्वात्मनो विकल्पानां