भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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४२ स्पन्दकारिका प्रसरेऽपि महेशता' (प्रत्य०का० ४।१२) 'पूर्णााहन्ता' है क्या? 'संविदः स्वात्ममात्र- विश्रान्तिः स एव पूर्णााहन्ताविमर्शस्वभावोऽहंभावो' (उत्पल—अजडप्रमातृसिद्धि) । शैवशास्त्र में ७ प्रमाता माने गए हैं जो निम्न है— प्रमाता ┌──────┬──────┬──────┬──────┬──────┬──────┐ शिव मन्त्रमहेश्वर मन्त्रेश्वर मन्त्र विज्ञानाकल प्रलयाकल सकल (मायीयमल १ मल) (२ मल) (३ मल) पूर्णााहन्ता—'विज्ञानभैरव' में इन प्रमाताओं में से मात्र 'शिव' एवं 'परमशिव' में अहन्ता के आधान का उपदेश दिया गया है—'मित' प्रमाता को अमितप्रमाता बनने का, अपूर्ण को पूर्ण बनने का, पशु को पशुपति बनने का या जीव को शिव बनने का यही मार्ग है । यही 'पूर्णााहन्ता' (शिवोऽहं) स्वरूप है तथा विश्वोऽहं के साथ तादात्म्य है । 'अहं' एवं अहन्ता का यथार्थ स्वरूप—अकार और हकार विमर्श और प्रकाश हैं । इन दोनों के सामरस्य से 'अहं' निष्पन्न होता है । यही 'अहं' अकार से हकार पर्यन्त समस्त मातृकाओं एवं अकार शिव एवं हकार शक्ति का समन्वित रूप है । 'श्वेतबिन्दु' शिवात्मक है और 'रक्तबिन्दु' शक्त्यात्मक है । ये दोनों एक दूसरे में प्रविष्ट होते हैं । रक्त एवं श्वेत बिन्दु के समागम से तृतीय-'मिश्रबिन्दु' का आविर्भाव होता है । यही 'अहं पद' है । इसी अहं में अकार से हकार पर्यन्त समस्त वर्ण राशि समाहित है । 'चिद्वल्ली' में कहा गया है—'महामन्त्रमयीपूर्णााहन्तामयी प्रकाशानन्दसारा बिन्दुत्रयसमष्टि भूतदिव्या- रसरूपिणी कामकला नाम महात्रिपुरसुन्दरी' ।। 'त्रिपुरसुन्दरी पूर्णााहन्तामयी है । अद्वयसंपत्तिकार वामननाथ कहते हैं कि अहंभाव उपादेय है न कि हेय । तपस्वीराज कहते हैं कि अहंकार एक पिशाच है । मानव-रक्त को चूसने वाला है । मानव की सद्बुद्धि का आच्छादक है, किन्तु मानव के द्वारा भगवान् की शरण में जाने पर यही अहंकार यही उसका सेवक बन जाता है— 'अहमितिपिशाच एष त्वत्स्मृतिमात्रेण किंकरीभवति ।' जब व्यक्ति यह सोचता है कि 'मैं अकेला हूँ, मेरा कोई सहायक नहीं है' तब वह भयभीत रहता है किन्तु जब वह यह सोचता है कि 'मैं अकेला ही तो इस संसार में हूँ । यह सब कुछ मुझसे पृथक् थोड़े हैं'—तब वह निर्भय होकर घूमता है—'एकोऽहमिति संसृतौ जनस्त्रास साहसरसेन खिद्यते एकोऽहमिति कोऽपरोऽस्ति मे इत्यमस्मि गतभी- र्व्यवस्थितः ।।' 'विमर्शदीपिका' में कहा गया है कि विश्वात्मक होते हुए भी विश्वोत्तीर्ण, स्वतन्त्र, दिव्य, अक्षर तत्त्व ही 'अहं' नाम से कहा जाता है । इस प्रकार के 'अहं' तत्त्व में धारणा स्थिर हो जाने पर भय किसको स्पर्श कर पाता है? 'विश्वात्मा विश्वोत्तीर्णं च स्वतन्त्रं दिव्यमक्षरम् । अहमित्युत्तमं तत्त्वं समाविश्य बिभेति कः ?'