भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 519 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 44

परिचय एवं पृष्ठभूमि ४३ जो साधक विश्व को अपनी क्रीडा मानता है अर्थात् अपनी लीला मानता है और इस प्रकार 'विश्वोऽहं' के विमर्श से परिपूर्ण है उसे ही जीवन्मुक्त कहते हैं अर्थात् जगत् को अपनी क्रीड़ा समझने की 'संवित्ति' ही जीवन्मुक्ति' है— 'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत्। स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ (द्वि० ३०) उत्पलाचार्य कहते हैं—'सोऽखिलं समग्रं जगत् क्रीडारामतया पश्यन् विभाव- यन्नित्युक्तत्वाच्च बन्धकारणस्याज्ञानस्य क्षयात् प्रबोधाप्तौ जीवन्नेवेश्वरवन्मुक्तो नाऽत्र संशयः ।।' ('स्पन्दप्रदीपिका' का० ३०) । रामकण्ठाचार्य ('स्पन्दकारिका वृत्ति' में) कहते हैं—कि ऐसी संवित्ति रखने वाला योगी समस्त माहेश्वर शक्तियों को प्राप्त कर लेता है—'सर्वव्यापक सर्वात्मक सर्वेश्वर- स्वतन्त्रस्वभावाहंकार प्रतिपत्तिदार्थेन जन्मादिविरोधात निष्क्रान्तः परमेश्वर एव संवृत्त इति ।। 'अशेषमनन्तवस्तुव्यतिरिक्तं विचित्रं जगत् विश्वं क्रीडात्वेन स्वनिर्मितचराचरभाव क्रीडनकोपरचितलीलामात्रतया पश्यन् विभावयन्'–'एवं सर्वं कीडात्वेनैव पश्यन् जीव- न्नेव मुक्तः ।।' 'कामकलाविलास' में कहा गया है कि— पूर्णाहन्तात्मभावेन कृत्रिमाहन्तया विना । आत्मानमात्मना साक्षाद्यः पश्यति स पश्यति ।। (काम० ५) अहंता की विभिन्न भूमिकायें— अहन्ता की मुख्यतः तीन भूमिकायें हैं—१. अहं के अभाव की भूमिका, २. मितप्रमाता के संकुचित अहं की भूमिका, ३. परमशिव के अहं की भूमिका । १. अहं के निषेध की भूमिका—तत्वमंजरीकार कहते हैं कि 'यदि मै कुछ होऊँ—तब मुझे इधर-उधर, जहाँ-तहाँ से भय हो सकता है किन्तु यदि मैं ही कुछ न हूँ तो फिर भय किसका?' । बौद्ध भी यही कहते हैं— सत्यात्मनि परसंज्ञा स्वपरविभागे च रागविद्वेषौ । अनयोः संप्रतिबद्धाः सर्वे दोषाः प्रजायन्ते ।। (प्र०वा० १।२२१-२२२) अर्थात् अपनी आत्मा के रहने पर दूसरी आत्मा की बात उठती है । 'यह अपना है यह पराया है? —ऐसी कल्पना हो जाने पर अपने से राग एवं दूसरे के प्रति विद्वेष उत्पन्न होने लगते हैं । इस राग-द्वेष से जुड़े छोटे-बड़े दोष उत्पन्न हो जाते हैं । इसीलिए बौद्ध कहते हैं कि—'आत्मा ध्वंसो हि मोक्षः' । (स०द०सं०) । बौद्धों का यह आत्माभाववाद उनकी दृष्टि में पूर्णत्व है—निर्वाण है किन्तु स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा इस दृष्टि को स्वीकार नहीं करते ॥ २. परिमित (संकुचित) अहं की भूमिका—सारे माया बद्ध प्राणी शरीर, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, विषय आदि संकुचित देश में अपने अहं को तदाकार रूप में अनुभव करते हैं । यही संकुचित अहं उन्हें पशुपति से पशु बना देता है । यही उनके