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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 519 में से

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पृष्ठ 45

४४ स्पन्दकारिका बंधन एवं संसरण का कारण है। मित प्रमातृत्व, मित अहंता जीव से उसके शिवत्व (भैरवभाव) को छीन लेती है। यह अहंता हेय है। यह शुद्ध परामर्श की नहीं अशुद्ध परामर्श की क्षुद्र (संकुचित) अहन्ता है। श्लाघ्य अहन्ता का स्वरूप ‘विज्ञानभैरव’ (८४) में इस प्रकार दिया गया है— ‘सर्वज्ञः सर्वकर्ता च व्यापकः परमेश्वरः । स एवाहं शैवधर्मा इति दाढर्याच्छिवो भवेत् ॥ (प्रथम प्रत्यभिज्ञा की धारणा-८४) ३. शिव के अहं की भूमिका—‘पूर्णाहन्ता’ ‘विश्वाहन्ता’ प्रत्यभिज्ञा दर्शन में ‘प्रत्यभिज्ञा’ के निम्न दो प्रकारों का विवेचन किया गया है— १. प्रथम प्रत्यभिज्ञा—मैं शुद्धबोधस्वरूप शिव हूँ । २. द्वितीय प्रत्यभिज्ञा—समस्त जगत् मेरा ही अपना विस्तार है। अहन्ता एवं प्रत्यभिज्ञा—इन दोनों प्रकार की प्रत्यभिज्ञाओं के उदित होने पर साधक ‘विश्वमय’ हो जाता है। इस स्थिति में उसके चित्त में विकल्पों का प्रादुर्भाव होने पर भी वह अपनी शिवावस्था में ही प्रतिष्ठित रहता है— प्रथम प्रत्यभिज्ञा— ‘सोऽहं ममायं विभव इति प्रत्यभिजानतः । विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरेऽपि महेशता ॥ (४।१।१२) शिवोपाध्याय—१. ‘मैं शुद्धस्वरूप हूँ’—प्रत्यभिज्ञा के इस अंश पर धारणा के स्थिरीकरण की विधि यह है कि साधक यह भावना करे कि स्वातंत्र्यादिक शिव धर्मों से युक्त सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, व्यापक परमेश्वर मुझसे पृथक् नहीं है—ये सभी मेरे ही धर्म हैं।’—इस प्रकार के दृढ़ निश्चय से साधक शिव बन जाता है। प्रथम प्रकार की प्रत्यभिज्ञा उदित हो उठती है और समस्त अवस्थाओं में उसका शिवस्वरूप निरन्तर अनुस्यूत रहता है। द्वितीय प्रत्यभिज्ञा— २. ‘यह जगत् मेरा ही विस्तार है’—प्रत्यभिज्ञा के इस द्वितीय अंश पर धारणा के स्थिरीकरण हेतु यह भावना करनी चाहिए— ‘जलस्येवोर्मयो वह्नेर्ज्वालाभंग्यः प्रभा रवेः । ममैव भैरवस्यैता विश्वभंग्यो विभेदिताः’ ॥ १०८ ॥ अर्थात् जैसे जल की लहरें जल से ही उठती हैं, अग्नि की ज्वालाएं अग्नि से ही निकलती हैं या जैसे सूर्य का प्रकाश सूर्य से ही उत्पन्न होता है उसी प्रकार स्वात्मस्वरूप भैरव से ही चलना-फिरना, भोजन, हवन, दान, प्रसारण, निर्गमन प्रभृति इस विश्व की समस्त विचित्रताएँ प्रकट होती हैं। इस धारणा में दृढ़ता आने पर योगी इस समस्त विश्व में अपने ही शिवस्वरूप का साक्षात्कार करता है।

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