भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 403

३०२ स्पन्दकारिका ध्येय परमात्मा) का आत्म रूप से ग्रहण हो जाता है—तादात्म्य प्राप्त हो जाता है उसी को साधक के चित्त में उस देवता का उदय (देव साक्षात्कार) कहा जाता है। तादात्म्यप्राप्ति या भगवत्प्राप्ति—'तादात्म्य' शब्द का अर्थ है—उसके स्वभावत्व की प्राप्ति अर्थात् साधक द्वारा अपने लक्ष्यभूत इष्टदेवता के स्वभाव का अधिगम ॥ मन्त्रयोगी मन्त्रोच्चारण करने की इच्छा मात्र से मन्त्र के देवता के साथ तादात्म्य प्राप्त कर लेता है— 'तत्संवदेनद्वारेण यः तदात्मग्रहो मन्त्रन्यासात्मकः स एवोदयः तस्य ध्येयेस्य मन्त्रा- त्मनः साधकचेतसि, तादात्म्यं तत्स्वभावत्वप्राप्तिः मन्त्रदेवतया सह साधकस्य मन्त्रोच्चा- रणरूपेच्छया संपादिता: ॥'१ अमृतप्राप्ति—साधक के द्वारा देवता के स्वभाव की प्राप्ति ही—'अमृतप्राप्ति' है। इसे ही आत्मा का ग्रहण ('आत्मग्रह') भी कहते हैं यही 'निर्वाणदीक्षा' है। यही साधक को शिवभाव प्राप्त करा देती है। भट्टकल्लट का कथन है कि निर्मल स्वात्मसंवेदन ही अमृतत्व (अक्षय शिवभाव) प्राप्त कराना है। धातुओं के संमिश्रण (यथा स्वर्णभस्म, ताम्र भस्म, रजत भस्म) से संरचित, शारीर धातुओं के पुष्टिवर्धक एवं स्वादिष्ट रस का आस्वाद ग्रहण ही अमृतत्व की प्राप्ति नहीं है। आध्यात्मिक साधना के पंथ में आत्मग्रह (आत्मानुभूति) उस स्थिति की संज्ञा है जिसमें मन्त्र का उच्चारण करने से ही मन्त्रस्वरूप में अवस्थान—मन्त्र के देवता के साथ तद्रूपता स्वरूप-तादात्म्य प्राप्त होती है। इसीलिए यह कहा गया है कि—'दीक्षावसर पर गुरु आत्मा का ग्रहण करें । निराकार आत्मा को मिट्टी के ढेले या किसी स्थूल पदार्थ की भाँति नहीं पकड़ा जा सकता अतः यह आत्मानुभव निर्वाणदीक्षा ही है जो अनुत्तर शिवभाव अभिव्यक्त करता है। भट्टकल्लट अपने शब्दों में कहते हैं—'इयमेव सा मिथ्याज्ञानशून्यस्य साधकस्य निरावरणस्वरूपसंवित्तिः अमृतत्वप्राप्तिः न तु रसास्वादरूपस्य धातुसारस्य स्थूलस्या- स्वादनम् अमृतप्राप्तिरुक्ता, यैव मन्त्रोच्चारणमात्रेणैव मन्त्रस्वरूपावस्थिति प्राप्तिः सैवा- त्मनो ग्रहणमित्युक्ता । यस्मात् 'आत्मनो ग्रहणं कुर्याद्दीक्षाकाले गुरुर्धिया' इति ॥ न पुनर्लोष्टादिवत् हस्तेन्तस्यामूर्तस्य ग्रहणं भवति, अत एव चेयमेव सा निर्वाणदीक्षा शिवसद्भावदायिनी, परमशिवस्वरूपाभिव्यंजिका ॥'२ १-२. स्पन्दसर्वस्व।