स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 404, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ें[६] तृतीयो निष्यन्दः विभूतिस्पन्दनिष्यन्दः विभूतियाँ और स्पन्द— भट्टकल्लट की 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में अन्तिम निष्यन्द 'विभूति स्पन्द' के नाम से है । दो निष्यन्दों (रामकण्ठाचार्य की 'विवृति' में अनेक निष्यन्दों) में सामान्य स्पन्द तत्त्व के स्वरूप का और उसमें समाविष्ट सुप्रबुद्ध प्रमातृभाव में अवस्थित होने की प्रक्रिया का विवेचन किया गया है । 'विभूतिस्पन्द' में शाक्त भूमिका की अनुभूति प्राप्त करने पर योगी में अनेक सिद्धियाँ आविर्भूत हो जाती हैं । ये 'मितसिद्धियाँ, एवं 'अमितसिद्धियाँ' कहलाती हैं । 'अमितसिद्धियाँ' उत्कृष्ट योगियों में होती हैं और सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञातृत्व, सर्वव्यापकत्व, अमित तुष्टि आदि के स्वरूप वाली हैं । तीव्र आत्म शक्ति से सांसारिक आसक्तियों का त्याग करके योगी 'चक्रेश्वर' पद प्राप्त करता है— 'यदा त्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोदयौ । नियच्छन् भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥ (स्पन्द का० ५१) 'नो निश्चयः पशुजनस्य जडोऽस्मि कर्म संपाशितोऽस्मि मलिनोस्मि परेरितोऽस्मि । इत्येतदन्यदृढनिश्चयलाभसिद्ध्या सद्यः पतिर्भवति विश्ववपुश्चिदात्मा ॥ 'विभूतिस्पन्द' में सर्वप्रथम दिदृक्षानुरूप, यथेच्छित—(तं०सा०अ० ४) पदार्थों के साक्षात्कार हेतु 'सोमसूर्योदय' के विधान तथा 'स्वप्न स्वातन्त्र्य' का उल्लेख किया गया है । तदुपरान्त स्वरूपाश्रयस्वरूप स्वबलाश्रय प्राप्त करके त्रिकाल-दर्शित्व की सिद्धि का विवेचन किया गया है । बुभुक्षा-निवृत्ति सार्वत्रिक सर्वज्ञता, 'बिन्दु' 'नाद' 'रूप' एवं 'रस' की सिद्धि, दिदृक्षामात्र से समस्त पदार्थों का साक्षात्कार, कला-समूहों के द्वारा अप्रभावित (अपीड़ित) रहने, क्रियात्मिका शक्ति को शिवमार्ग पर आरूढ़ करने से अनेक सिद्धियों की प्राप्ति—'ज्ञाता सिद्ध्युपपादिका' (४८) का वर्णन तो किया ही गया है साथ ही इसमें—अज्ञानोत्पन्न 'ग्लानि' के द्वारा धातु, बल आदि के क्षय, पशुत्व की प्राप्ति, परामृतरस से वंचित होने, अस्वतन्त्रता की प्राप्ति, आत्मस्वरूप पर आवरण, बन्धन ('सेयं क्रियात्मिकाशक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी बन्धयित्री स्वमार्गस्था') पुर्यष्टक के पाश द्वारा बन्धकत्व आदि का भी विवेचन किया गया है । पातञ्जल योगसूत्र का अध्यायीकरण—(१) 'समाधिपाद' (२) 'साधनपाद' एवं 'विभूतिपाद' के नाम से किया गया है । किन्तु इसमें (योगसूत्र) में अन्तिम 'पाद' 'कैवल्यपाद' हैं जब कि स्पन्दकारिका में अन्तिम 'निष्यन्द' विभूति निष्यन्द' है । योगशास्त्र में 'कैवल्य' को विभूतियों से उच्चतर मानकर इसको अन्त में रखा