भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 405

३०४ स्पन्दकारिका गया है और विभूतियों के समानार्थक नहीं माना गया है । 'स्पन्दशास्त्र' में मितसिद्धियों को तो हेय माना गया है किन्तु अमित सिद्धियों को हेय न मानकर (कैवल्य के समतुल्य मानकर) 'विभूति' एवं 'कैवल्य' दोनों अध्यायों को अंतिम अध्याय के रूप में एकीकृत करके रक्खा गया है । विभूतियाँ और योगसूत्र—योगसूत्र के विभूतिपाद में—'प्रज्ञालोक' (सूत्र ५), अतीतानागत ज्ञान (सूत्र १६), संपूर्ण प्राणियों की वाणी का ज्ञान (सूत्र १७), पूर्वजन्मों का ज्ञान (सूत्र १८), परचित्त का ज्ञान (सूत्र १९), अन्तर्धान (सूत्र २१), मृत्यु का पूर्व ज्ञान (सूत्र २२), दूरदेश स्थित पदार्थों का ज्ञान (सूत्र २५), समस्त लोकों का ज्ञान (सूत्र २६), समस्त ताराव्यूह का ज्ञान (सूत्र २७), ताराओं की गति का ज्ञान (सूत्र २८), शरीर व्यूह का ज्ञान (सूत्र २९), क्षुत्पिपासानिवृत्ति की क्षमता (सूत्र ३०), स्थैर्य (सूत्र ३१), सिद्धों के दर्शन (सूत्र ३२), समस्त बातों का (प्रातिभबल से), ज्ञान (सूत्र ३३), चित्त के स्वरूप का ज्ञान (सूत्र ३४), पुरुष का ज्ञान (सूत्र ३५), श्रावण, वेदन, आदर्श, आस्वाद की अनुभूति (सूत्र ३६), परचित्त का ज्ञान एवं परशरीरावेश (सूत्र ३८), ऊर्ध्वगति (सूत्र ३९), शरीर की दिव्यता (सूत्र ४०), दिव्य श्रवण (सूत्र ४१), आकाशगमन (सूत्र ४२), महाविदेहावस्था (सूत्र ४३), पञ्चभूतों पर विजय (सूत्र ४४), अणिमादिक अष्टसिद्धियों की प्राप्ति (सूत्र ४५), शरीर सम्पदाओं की प्राप्ति (सूत्र ४६), मन सहित इन्द्रियों पर विजय (सूत्र ४७), शरीर के बिना भी विषयानुभव एवं प्रधान (प्रकृति) पर विजय (सूत्र ४८), सर्वभावाधिष्ठातृत्व एवं सर्वज्ञातृत्व (सूत्र ४९), सिद्धियों में भी वैराग्य होने पर (दोषबीजक्षय द्वारा), कैवल्य विवेक ज्ञान (सूत्र ५२), विवेकज ज्ञान (सूत्र ५४), बुद्धि- पुरुष दोनों की समशुद्धि से 'कैवल्य' (सूत्र ५५) आदि सिद्धियों का सविस्तार विवेचन किया गया है किन्तु स्पन्दशास्त्र में विभूतियों का अत्यल्प विवेचन किया गया है। योगियों की यथाकांक्षित अभीष्टों की तत्काल सिद्धि— यथेच्छाभ्यर्थितो धाता जाग्रत्यर्थान् हृदि स्थितान् । सोम-सूर्योदयं कृत्वा सम्पादयति देहिनः ॥ ३३ ॥ तथा स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थान् प्रणयस्यानतिक्रमात् । नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितवद् यं प्रकाशयेत् ॥ ३४ ॥ जिस प्रकार आत्मस्वभाव स्रष्टा (धाता) योगियों के द्वारा दिदृक्षा रूपा अभ्यर्थना किये जाने पर उनके सोम-सूर्य (दोनों नेत्रों) में तीव्र अवधानात्मक शक्ति को उदित करके उनके हृदय में स्थित अभीष्ट पदार्थों को जाग्रत अवस्था में ही प्रकाशित (उदित) कर देता है उसी प्रकार वह (योगियों की) सुषुम्णा नाड़ी में सतत स्थित रहने के कारण (योगियों के) प्रणय का अतिक्रमण न करने के कारण (योगियों को उनके) स्वप्न में भी उनके अभ्यर्थित पदार्थों का अतद्वय साक्षात्कार कराता है ॥ ३३-३४ ॥

  • सरोजिनी * स्थितान् = अभिमत अर्थों को । सम्पादयति = प्रकट करता है । प्रकाशयति इच्छया = दिदृक्षात्मक रूप से । अभ्यर्थित = याचित ।