स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ३०५ जाग्रति = जाग्रदवस्था में। धाता = स्रष्टाऽऽत्मस्वभाव (उत्पल)। धाता = जो संपूर्ण विश्व को अपने भीतर धारण करता है। जो शङ्कर से अभिन्न अपने यथार्थ स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है। यथेच्छाभ्यर्थितो = 'अन्तर्मुख- स्वरूपविमर्शबलेन प्रसादितो' 'धाता' = शङ्करात्मा स्वभाव। (धत्ते सर्वात्मानं इति धाता)। जाग्रतः = जागरावस्था ॥ अतिक्रम = उपेक्षा करना (To overlook) । देहिनः = प्राणी (अभिव्यक्तस्वातन्त्र्य देहिनः देहभूमिकायां एव प्रकटीभूतः) । जाग्रत = परतत्त्व में जागरुक। सोमसूर्ययोः = चन्द्रमा एवं सूर्य दोनों के (ज्ञान-क्रिया नामक दोनों शक्तियों के) ॥ सोमसूर्य = प्राणापान । हृदि = चित्त में । प्रणय = प्रार्थना । अर्थान् = प्रयोजनों को । मध्ये = सौषुम्न धाम में ।१ सम्पादयति = निष्पादित करता है। योगी के शरीर में अनुप्रविष्ट होकर परमात्मा संपादित करता है। ज्ञान की शक्ति के द्वारा भास्यमान होकर ही कोई क्रिया क्रियाशक्ति द्वारा उन्मीलित हुआ करती है।२ सोमसूर्ययोः = 'अपान-प्राणयोश्चक्षुषोश्चोदयं कृत्वा चक्षुरादिषु अव- धानेन (उत्पल)। आत्मस्वभावरूप स्रष्टा स्वबल के आश्रय से जागृतावस्था में अपनी इच्छा से ही प्रेरित होकर हृदयस्थित अभिमत अर्थों को सोम-सूर्य (प्राणापान) को उदित करके सम्पादित करता है। कोई पदार्थ इच्छानुगामी होकर सृष्टि में अस्तित्व में आता है स्वतन्त्र रूप से नहीं। पदार्थ इच्छा का उल्लंघन नहीं कर सकता ।३ जिस प्रकार धाता उत्कण्ठा पूर्वक प्रार्थित होने पर जाग्रत एवं शरीरधारी प्राणियों को हृदय में पदार्थों को, सूर्य एवं चन्द्रमा को प्रकट कराकर प्रदान करता है उसी प्रकार वह स्वप्नावस्था (Dreaming state) में भी इच्छित पदार्थों को व्यक्त करता है। परमेश्वर योगी की नित्य, अक्षय एवं प्रार्थनापूर्ण प्रवृत्ति के कारण उसके समक्ष उसके केन्द्रीय पथ (सुषुम्ना) में प्रकट होकर उसकी समस्त अभिलाषायें पूर्ण करता है । ‘विज्ञानभैरव’ में भी कहा गया है। अनागतायां निद्रायां विनष्टे बाह्यगोचरे । सावस्था मनसा गम्या परादेवी प्रकाशयेत् ॥ (७५) पीनां च दुर्बलां शक्तिं ध्यात्वा द्वादशगोचरे । प्रावेश्य हृदये ध्यायन् स्वप्नस्वातन्त्र्यमाप्नुयात् ॥ (५५)४ धाता अनाच्छादित रूप में सौषुम्नधाम में स्थित होकर स्वप्न में भी अभीष्ट आणव-शाक्त-शांभव समावेशो को एवं अन्य समावेशाभ्यास से रसोन्मृष्ट दर्पण के १-४. स्पन्दनिर्णय । स्पं० २०