भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 407, कुल 519 में से

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पृष्ठ 407

३०६ स्पन्दकारिका जिज्ञासित पदार्थों को अवश्य प्रकट करता है । ऐसे योगियों को स्वप्न एवं सुषुप्ति में भी व्यामोह नहीं होता ॥ १ 'यथेच्छाभ्यर्थितो धाता जाग्रतो जाग्रतोऽर्थान् हृदि स्थितान्' — नित्यात्मक स्वस्वभाव के अन्तरावलोकन (Introspection) के माध्यम से उत्कण्ठापूर्वक प्रार्थित किये जाने पर जाग्रत योगी के द्वारा या उसे जिसके प्रति उसकी अपनी यथार्थ स्वतन्त्रता ने जाग्रतावस्था में अपने को व्यक्त किया हो, जो शरीरधारी हो, या जिसके प्रति सूक्ष्म जगत् के ज्ञान ने सशरीरी अवस्था में भी अपने को अभिव्यक्त कर दिया हो, 'वह' हृदय में मूलबद्ध पदार्थों को प्रदान करता है या प्रकाश, ध्वनि आदि के ज्ञान के रूप में प्रार्थित पदार्थों को प्रदान करता है तथा बुद्धि उन्मेष प्रदान करता है तथा ज्ञान के सामान्य विघ्नों से परिचय कराता है । २ 'सोमसूर्योदयं कृत्वा संपादयति देहिन:' — सोम-सूर्य अर्थात् ज्ञान एवं क्रिया शक्ति (Cognitive and operative energies) को प्रकट करके । ज्ञानशक्ति के द्वारा जिसे प्रकट किया जाता है उसे क्रियाशक्ति विकसित करती है—'ज्ञानशक्त्या भास्यमानं हि क्रियाशक्त्या उन्मील्यते' । ३ परमेश्वर योगी के शरीर में अनुप्रविष्ट होने के उपरान्त दक्षिण एवं वाम प्रकाशों के क्रमिक विकास के द्वारा (ध्यान द्वारा उद्बुद्ध बुद्धि के रूप में स्थित एवं क्रमशः क्रिया एवं ज्ञान का प्रतिनिधित्व करने वाले) ज्ञानों के विशिष्ट रूपों के अन्तःप्रवाहों को संपादित करता है । 'धाता' स्पष्टतः दृष्टिगोचर होता है या योगी के सुषुम्णा मार्ग में अनाच्छादित (अनावृत) रूप में व्यक्त होता है । जो योगी (१) भगवत् प्रार्थनापरायण है (२) योग- निद्रारूढ़ है (३) प्रणयपरायण है—उसके प्रगाढ़ ध्यान के उपाय से उसके सुषुम्नापथ में धाता परमेश्वर अनाच्छादितरूप से प्रकट होता है । ४ वह योगी उस 'चितिशक्ति' (Power of consciousness) का ध्यान करता है जो कि विश्व का मन (विश्वोद्गिरण) करने एवं विश्व को ग्रास बनाने में तत्पर है और साथ ही जो दो सृष्टि के ध्रुवों के मध्य संघर्ष या घर्षण (विसर्गरिणि) के रूप में स्थित है और जो कि विश्व-वमन एवं विश्व-कवलीकरण का प्रतिनिधित्व करते हैं । वमन एवं ग्रासीकरण में निरत विसर्गरिणि के रूप में संस्थित चिति शक्ति के परामर्श द्वारा नित्य आराधना करने पर भगत्प्रार्थना पर योगनिद्रारूढ़ योगी के सुषुम्ना पथ में धाता अनावृत रूप से स्थित होकर स्वप्न में भी अभीष्ट पदार्थों को, आणव-शाक्त- शांभव समावेश से रसोन्मृष्ट दर्पण प्रदान करता है अर्थात् समस्त जिज्ञासित अर्थों को प्रकट कर देता है । ५ धाता उस योगी के प्रति जिसका बुद्धि रूपी दर्पण (Intellectual mirror) विशुद्ध हो चुका है, निःसंदेह निद्रावस्था (Sleeping state) में भी आणव-शांभव— शाक्त समावेश आदि इच्छित अभीष्टार्थ प्रदान करता है । १-५. स्पन्दनिर्णय ।

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