स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
DevanagariHindipublished519 पृष्ठ
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३०८ स्पन्दकारिका अशेषवित आत्मा के सम्मुख रख देती है । बुद्धि जो-जो रसपूर्वक अभ्यर्थना करती है, आत्मसंवित् स्वप्न में भी उसका अतिक्रमण नहीं करती'— 'विस्मृतार्थमभियुज्यधीर्यया त्वामशेषविद्माशु शंसति । यद्यदित्यमनयाऽर्थ्यते रसात् स्वप्न गोऽपि विलंघयिष्यति ॥ एक सिद्ध ने भी कहा है—चिदाकाशं में स्थित होकर जो अनुसंधान करता है वह अखण्डित ही देखता है ।।'— 'चिद्व्योम्निस्थोऽनुसन्धत्ते यत्तत्पश्यत्यखण्डितम्' ज्योतिःशास्त्र में भी कहा गया है कि— 'येन येनेन्द्रियार्थेन विद्धः स्वपिति मानवः । तस्य तस्येन्द्रियार्थस्य सुप्तः कर्माणि पश्यति ॥' अर्थात् मनुष्य जिस-जिस इन्द्रियार्थ से अनुविद्ध होकर शयन करता है । स्वप्ना- वस्था में उन्हीं-उन्हीं पदार्थों के कर्म देखता है ।¹ यथा देहिनो = जिस प्रकार प्राणी । देही = देह मात्र को ही आत्मा के रूप में मानने वाला (देहात्मप्रतिपन्न) संसारी प्राणी । जाग्रतो = यथास्वविषयग्रहण व्यग्र इन्द्रियवृत्तीलक्षण वाली जागृतावस्था में । हृदिस्थितान् = आशयनिविष्ट अभीष्टों को देखने हेतु ।। अभीष्ट = भाव ।। इच्छा- भ्यर्थित् = इच्छा के द्वारा अर्थात् देखने की इच्छा के द्वारा अभ्यर्थित । उस अवस्था में स्थित स्वबल के द्वारा, तादात्म्यसमापत्ति के द्वारा उस अभीष्ट संपत्ति की याचना ।। धाता = सर्वकर्मकर्ता, परमेश्वर या परमात्मा ।।² संपादयति = यथाभिप्राय प्रकाशित करता है । क्या करके? सोमसूर्ययोः सूर्य-चन्द्ररूपी आँखों के । उदयम् = अभिप्रेतार्थवधारणमात्रावधानरूपस्वरूपप्रथन ।। कृत्वा = करके (विधाय) । तात्पर्य—जो कोई संसारी पुरुष जिस किसी भी पदार्थ को देखने की इच्छा करता है वह उस दिदृक्षावस्था में शीघ्र ही धाता परमात्मा में अभेद (अभिन्न रूप) के साथ (उसमें) प्रवेश करता है (आविशति) ।। उसकी यह अवस्था उसकी प्रार्थना कही जाती है । वह उसके द्वारा अभ्यर्थित धाता उस मात्रा में अर्थप्रथन (अभीष्ट पदार्थ को प्रदान करना) के लिए अवधानात्मक क्रिया द्वारा नेत्रों को उदित करके — स्वरूपाभिव्यक्ति रूप उदय को संपादित करके—सन्निहित अन्य अनेक दृश्यों की दिदृक्षा के द्वारा ही अभ्यर्थित पदार्थ को प्रदर्शित करता है अन्य अनाभीष्ट पदार्थों को नहीं । सोमसूर्ययोः = चन्द्रमा एवं सूर्य दोनों के । अर्थात् दोनों आँखों के । चन्द्रमा एवं सूर्य रूपी नेत्र द्वय के । उसके द्वारा शुश्रूषाभ्यर्थित दोनों कानों को उदित करके श्रव्यान्तर के संनिधि में रहने पर भी सुश्रूषित पदार्थ को ही सुनाता है (श्रावयति) ।। इस प्रकार यहाँ समस्त इन्द्रियों को योजित करके कारिका का अर्थ स्पष्ट करना चाहिए । समस्त इन्द्रियाँ योज्य हैं ।
१. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' । २. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दविवृति' ।