भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 410

तृतीयः निष्यन्दः ३०९ भगवान् के दो नेत्र सूर्य एवं चन्द्रमा के रूप में जगत्-प्रख्यात हैं। यहाँ पर 'सोमसूर्य' शब्द को आँखों के रूप में प्रयुक्त करके कारिकाकार ने जीव को विश्वरूप परमात्मा के साथ एकीभूत दिखाकर दोनों में अभेदत्व प्रतिपादित किया है। वृत्तिकार कहते भी हैं—'चक्षुरादिष्ववधानेन'। इसी प्रकार सभी जीवों का सर्वार्थप्रथन (अभीष्ट वस्तुओं की सम्प्राप्ति) स्वेच्छा से निष्पादित हुआ करता है। वह संसारियों की इच्छा परमकारण भेदरूपा है: 'सा च इच्छावस्था संसारिणः परमकारणाभेदरूपा ।।' स्वतन्त्र परमेश्वर ही यथेष्ट रूप में समस्त पदार्थों को प्रकाशित करता है। इस प्रकार परमात्मा की मायाशक्ति से सञ्जात देहादिव्यवच्छेद वाले (पार्थक्य, विभाग, खण्ड या पृथकता से युक्त) संसारी प्राणी परमार्थ प्राप्त नहीं कर पाते ।। जो साधक प्रबुद्ध हैं, उक्तोपदेशाभ्यास प्रकर्ष के कषण-पाषाण पर जिनका प्रज्ञा- कृपाण निशितीकृत (धारदार किया हुआ, तीक्ष्ण किया हुआ) हो चुका है, जो सत्यात्म- संवित् हैं, जो अहंकारादिक कषायों से मुक्त हैं उनके लिए प्रत्यभिज्ञा का उपदेश नहीं दिया गया है। ऐसे सिद्ध, 'समाधियोगी' को उपदेश की क्या आवश्यकता? तथैव = उसी प्रकार ।। नित्यं = सदैव सभी ज्ञातृ-ज्ञेय संबन्ध दशाओं में । प्रणयस्य = इच्छावस्था में तादात्म्य प्रतिपत्तिरूपा प्रार्थना का ।। अनतिङ्क्रमात् = उल्लंघन न करने से । 'प्रत्यवमर्शाविहितत्वेन अनुपेक्षणात्' ।। स्वप्नेऽपि = स्वव्यापार से उपरत चक्षु आदि इन्द्रियों के द्वारा मनोमात्रग्राह्य- स्वसृष्टिविषय वाली स्वप्नावस्था में । अभीष्टान् = इच्छित पदार्थों को, साधकाभिमत पदार्थों को । स्फुटतरं = स्पष्टतापूर्वक । मध्ये स्थितो = हृदय में सदासीन । अवश्यं = अवश्यमेव । नियमों के द्वारा यह धाता—प्रकाशयति = प्रथित करता है (प्रथयेत्) ।। प्रकाशित करता है । प्रदान करता है । इसका तात्पर्य निम्नांकित है—१ जो सर्वदा, समस्त अनुभवों में, धातु सर्वेश्वर स्वस्वभावा के तल्लीनत्व लक्षण वाले प्रणय को, (स्वसामर्थ्यसिद्ध प्रार्थना को) प्रतिक्षण प्रत्यवमर्श द्वारा अवहित होने के कारण अतिक्रमित नहीं करता (नातिक्रामति) उसके लिए यह 'धाता' जागृतावस्था के समान स्वप्नावस्था में भी अपने अभिमत (अभीष्ट) पदार्थों को ही प्रकाशित करता है । उसके स्वप्न पदार्थ स्वतन्त्र रूप से प्रकाशित होते हैं क्योंकि उसकी सर्वकर्तृत्वलक्षण वाली स्वशक्ति प्रतिबन्धों को उद्भावित नहीं करती क्योंकि वह अंससारी है । वह अपनी शक्ति द्वारा स्वातन्त्र्यपूर्वक यथेष्ट पदार्थों का सृजन करती है— 'स्वतन्त्रः स्वशक्त्या यथेष्टं तान् सृजति' भर्तृहरि ने कहा भी है— 'प्रविभाज्यात्मनात्मानं सृष्ट्वा भावान् पृथग्विधान् । सर्वेश्वरः सर्वशक्तिः स्वप्ने भोक्ता प्रपद्यते ।।' अतः स्वप्नस्वातन्त्र्य की बात कही गई है । उसके लिए स्वप्न एवं जागरण दोनों में कोई अन्तर नहीं है—'तस्य स्वप्न जागरयोर्विशेषो नास्ति ।' १. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दविवृति' ।