भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 468

तृतीयः निष्यन्दः ३६७ निर्भासिनी माया 'गुणमयी' कहलाती है। यह 'दुरत्यया' है—क्योंकि इसका अतिक्रमण करना अत्यन्त दुःखपूर्ण या कष्टकारक है—बहुत कष्टपूर्ण साधनाओं के बाद ही इसको अतिक्रान्त या पराभूत किया जा पाना संभव हो पाता है—अत्यन्त उत्साही प्रबुद्धों के द्वारा भी शीघ्र ही भेदव्यवहार के परे जा पाना कठिन है तथा शीघ्र ही समस्त संसारव्यवस्था का उच्छेद कर पाना संभव नहीं है। किन्तु जो लोग मेरी उपासना करते हैं—द्वैतभाव के छिन्न-भिन्न होने एवं संवित् तत्त्व में अधिष्ठित होने के कारण जो सुप्रबुद्ध हैं मात्र मुझ एक ही तत्त्व को अपने से अभिन्न रूप में देखते हुए मुझे पहचानते हुए मद्भावापन्न होकर इस माया को पार कर जाते हैं। उस दशा में ही दिनकर की भाँति द्योतित होकर यामिनी रूपा माया को निर्मूलरूप से नष्ट करके उसके पार हो जाते हैं। स्तोत्र में कहा भी गया है— 'समाधि वज्रेणाप्यन्यैरभेद्यो भेदभूधरः । परामृष्टश्च नष्टश्च त्वद्भक्तिबलशालिभिः ॥' इस प्रकार की प्रत्ययोद्भवमात्रस्वरूपा माया तथा उसका मूलरूप क्षेत्रज्ञतत्त्व 'पशु' के पर्याय तथा 'अस्वतन्त्र' शब्द द्वारा यहाँ प्रतिपादित किया गया है। अस्वतन्त्र = बन्धनग्रस्त (पशु) जीव ॥ इस प्रत्योद्भवस्वरूपा माया के द्वारा स्वस्वभाव से प्रच्यवित जीवात्मा अपने तात्त्विक स्वस्वरूपात्मक धर्म के विपरीत कालादिरूप पाशपंचक के द्वारा ग्रथित होने के कारण 'पशुत्व' प्राप्त करती है और यही पशुत्व 'पारतन्त्र्य' है—'पाशपंचकेन ग्रथितस्य पारतन्त्र्यं पशुत्वमुद्भाव्यते ।।' यह पशु रूप जीवात्मा इस पारतन्त्र्य के कारण व्यामोहित होकर अपने अनवच्छिन्न स्वधर्म का परामर्श न करता हुआ प्रत्युत् उसके विपरीत अवच्छेदक पंच पाशों के द्वारा— (१) भूत-भविष्यादिक विकल्पों में विभक्त—'काल' के द्वारा, (२) सर्वात्मकत्व, रूप धर्म को विस्मृत कर देने के फलस्वरूप सर्वत्र नियतकार्यकारण नामक भाव से युक्त 'नियति' के द्वारा, (३) सर्वकर्तृत्व-सर्वज्ञत्वलक्षण लक्षण वाले धर्म से उदासीन होने के कारण- किंचित्कर्तृत्व-किंचिज्ज्ञत्व रूप वाले—'कला' एवं 'विद्या' के द्वारा। (४) प्रेप्सित अर्थों को न पाने के कारण नित्यनिरभिलाषत्व रूप लक्षणरूप स्वधर्म के अपरामर्श के कारण—विषयाभिलाषिता रूप 'राग' रूप पाश के द्वारा—बध्यमान, पराधीन वृत्ति वाला (तत्त्वतः पतिरूप) जीव 'पशु' कहलाने लगता है।१ क्योंकि पारमार्थिक रूप में परमेश्वर के एक होने पर भी उसके अपने अत्यद्भुत ऐश्वर्यवीर्य द्वारा और विशुद्धचिन्मात्ररूप होने के कारण तथा विश्वात्मक होने के कारण उसके आन्तर एवं बाह्य दो रूप हैं—अतः उसमें द्वैविध्य आभासित तो होता ही है। यहाँ उसका जो विश्वात्मक स्वरूप है— १. रामकण्ठाचार्यः— 'स्पन्दविवृति'