भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 469

३६८ स्पन्दकारिका बाह्यरूप है—उसके 'ज्ञेय' एवं 'कार्य' रूप भाव द्वारा उसके लब्ध होने से एक तत्त्व के अद्वैत शक्ति होने पर भी उसकी शक्ति 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' दो रूपों में उपचरित होती है। वह 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' जहाँ बाह्यगृहीत 'उन्मेष' के रूप में त्रिगुणात्मक अव्यक्तावस्था में स्थित होते हैं वे परमेश्वर भोगात्मक ज्ञान-क्रिया रूप में वर्तमान होने पर भी अन्तर्मुखी होने के कारण निमेषात्मिका सदाशिवदशा कहलाते हैं। 'शक्ति' के क्रिया-प्राधान्य पूर्ण होने पर बहिर्गृहीत उन्मेष की पराहं विश्रान्ति दशा 'ईश्वरदशा' कहलाती है। जिसमें ज्ञानशक्ति के उद्रेक होने के कारण इसका बहिर्मुखत्व बाह्याभ्यन्तर रूप सामानाधिकरण्यपर्यवसायी होने के कारण स्वरूपविश्रान्तिनिष्ठत्व ही वह 'विद्यादशा' है। (४) ये तीनों ही परामृत है। इन तीनों ही दशाओं में भेदप्रतिप्रतिमूलता होने के कारण माया शक्ति के लब्ध्यात्मिका होने पर भी संवित् तत्त्व के परिपूर्णा हंकार लक्षण वाले स्वभाव में ही विश्रान्त होने से प्रत्यस्तमिता होकर परमानन्दनिर्भर शिवरूप को तिरोहित करने में समर्थ नहीं है अतः ये तीनों पद परामृत ही है—'इति पदत्रयमेतत्परा- मृतमेव' तत्त्वगर्भ में कहा भी गया है— 'ज्ञानक्रियास्वरूपेण प्रवृत्तायास्तु ते शिवे। सदाशिवत्वं जगदुर्भोंगाहं तत्त्ववेदिनः ॥ गुणीभूतज्ञशक्तित्वं व्यक्तीभूतक्रियात्मिका । यदा तदैश्वरं तत्त्वं व्यक्ततामेति वृत्तिमत् ॥ प्रवृत्तावुन्मुखीभूता भवेस्त्वं परमे यदा। ज्ञान शक्तिस्तदोदारा विद्या त्वं परिगीयसे ॥' 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' में भी कहा गया है कि— एवमन्तर्बहिर्वृत्तिः क्रिया कालक्रमानुगा। मातुरेव तदन्योन्यावियुक्ते ज्ञानकर्मणी ॥ किन्त्वान्तरदशाद्रेकात्सादाख्यां तत्त्वमादितः। बहिर्भावपरत्वे तु परतः पारमेश्वरम् ॥ ईश्वरो बहिरुन्मेषो निमेषोऽन्तः सदाशिवः। सामानाधिकरण्यं च सद्भिद्याहमिदं धियोः ॥ इदंभावोपपन्नानां वेद्यभूमिमुपेयुषाम्। भावानां बोधसारत्वाद्यथावस्त्ववलोकनात् ॥' उससे परे तो परस्पर-परिहारावस्थित-अहं प्रतीति लक्षण से भिन्न विषयापेक्षी, अनेक भेदों के अभिमान से युक्त होने के कारण, अपने तात्विक ऐश्वर्य से अनभिज्ञ क्षेत्रज्ञतत्त्व में मायाशक्ति ही मात्र परमात्मा के विश्वरूपैश्वर्य का प्रथमास्पदभूत होकर विजृंभण करती है— 'यदा त्वेवंविधादत्र निजा भोगाज्ञता पशोः। तदा मायास्वरूपेति गीयते वैभवाश्रयः ॥'