स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 470, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ३६९ प्रत्यभिज्ञाशास्त्र में भी कहा गया है— 'भेदे त्वेकरसे भातेऽहंतयानात्मनीक्षते । शून्ये बुद्धौ शरीरे वा मायाशक्तिर्विजृंभते ॥' यहाँ यह 'प्रत्ययोद्भव' शब्द से प्रतिपादित की गई है । 'मैं'—इत्याकारक शिवात्मक स्वभाव का परामर्शात्मक ज्ञान सम्यक् ज्ञान है । विश्व के रूप में अवभासमान उसके ही स्वस्वभाव का इदन्तोल्लेखन ('यह' के रूप में उल्लेख करना) है । मायाशक्ति के पाँच भेद—काल, कला, नियति, राग, विद्या—या माया शक्ति के ये पाँच प्रसव (उत्पन्नभूत पदार्थ या तत्त्व या माया शक्तियाँ)—समस्त पशु प्रबन्ध (जीवों का अविच्छिन्न क्रम, बन्धन, योजना) को अविशेष रूप से उसके स्वस्वरूप को आच्छादित करके स्थित है—'माया शक्तेः प्रसवः समस्तस्य पशुप्रबन्धस्य अविशेषेण स्वरूपभावृत्य व्यवस्थितः ॥' यह माया शक्ति प्रत्येक प्राणी को उसकी भिन्न-भिन्न विचित्र बुद्धि आदि के रूप में परिणत होकर उसको आच्छादित—आवृत्त करती है उस 'प्रधान' (प्रकृति) नामक प्रसव का प्रपंच को प्रत्योद्भवविषय के प्रतिपादन के द्वारा यह कहा कि—'स च तन्मात्र गोचरः' । स च तन्मात्रगोचरः = 'स च पशुत्व कारणं'—वह पशुत्व का कारण प्रत्ययो- त्पन्न है । 'तन्मात्रगोचर' = तन्मात्रा (शब्द स्पर्श रूप रस गंध तन्मात्रायें) गोचर हैं (विषय हैं) जिनके वह ॥ 'प्रत्यय' विषय का आलम्बन लेकर (विषयसापेक्ष) स्थित है— प्रत्येय हैं । विषय एवं विषयीभाव ग्रहीतृ-ग्रहण-ग्राह्य-इस त्रितय रूप में होने के कारण युक्ति-सिद्ध है तथापि सामान्य प्रवृत्ति के कारण बिना त्रितय की सत्ता नहीं हो सकती । इस वाक्य के द्वारा ये चारों आक्षिप्त हैं । (१) इसमें 'ग्रहीता' कौन है? प्रत्ययवान् पशु (२) इसमें 'ग्राह्य' कौन है? शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध— अर्थात् आकाशादिक स्थूल पंचभूतों के आश्रयभूत विशेषात्मक गुण (क्योंकि उनके द्वारा ही समस्त विषयों की प्राप्ति होती है) । सामान्य के उपपन्न (प्राप्त) होने पर समस्त विशेषों का उनमें अंतर्भाव समझ लेना चाहिए ॥ अतः सामान्य वाची 'तन्मात्र' शब्द के प्रयोग के द्वारा विशेषों को भी गृहीत किया जाना चाहिए । उनके द्वारा—शब्दादि के आश्रयभूत स्थूल तत्त्व—आकाशादिक भी आक्षिप्त हैं क्योंकि—उनकी सत्ता निराश्रय होने की स्थिति में तो है ही नहीं । इस प्रकार दशविध कार्य हैं । १. 'तथा च अयम् अनया व्यामोहितः अनवच्छिन्नत्वादिरूपं स्वधर्मम् अपरामृशन्, तद्विपरीतेन अनवच्छेदकेन कलनात्मना भूतभविष्यदादिविकल्पविभक्तेन कालाख्येन, तथा सर्वात्मकत्वधर्मविस्मृतेः सर्वत्र नियतकार्यकारणभावाख्यात्मकेन नियतिनाम्ना, तथा सर्वकर्तृत्वसर्वज्ञत्वलक्षणधर्मद्वयौदासीन्यात् किंचित्कर्तृत्वकिंचिज्ज्ञत्व रूपाभ्यां कलाविद्याभिधानाभ्यां तथा प्रेप्सितार्थविरहात् नित्यनिरभिलाषितारूपेण रागाख्येन, च पाशेन वध्यमानः पराधीनवृत्तिः पशुः संबध्यते ॥' 'स्पन्दवृत्ति' स्पं० २४