भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 471, कुल 519 में से

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पृष्ठ 471

३७० स्पन्दकारिका वह प्रत्ययवान्, पर वशीभूत पशु विषयी होने के कारण इष्टानिष्ट विषय में हानादि क्रियाओं में करण की अपेक्षा रखता है । जिसके द्वारा यह विषय का निश्चय करता है वह प्रकाशप्रधान ‘बुद्धि’ नामक करण है । जिसके द्वारा अनात्मभूत देहादिक अर्थ को अपनी आत्मा के रूप में मानता है वह तद्विपर्ययात्मक नियमप्रधान तत्त्व ‘अहंकार’ है । जिसके द्वारा प्रवृत्तिप्राधान्यवश विषयों को विकल्पित करता है वह संशयात्मक तत्त्व ‘मन’ है । इस प्रकार—अंतःकरण त्रिविध है—बुद्धि, अहंकार, मन ॥ ‘त्रिविधं अन्तः- करणम्’ ॥ ये कार्य हैं। जिसके द्वारा शब्दादिक विषय ग्रहण किये जाते हैं—वे पाँच हैं—और वे श्रोत्रा- दिक पाँच बुद्धीन्द्रिय पंचक कहलाते हैं जिसके द्वारा वचनादि क्रिया संपन्न की जाती है— वे वागादिक पंचकर्मेन्द्रियाँ हैं । अतः ये १० बहिष्करण हैं ।१ ये अहंकार के कार्य हैं । इस प्रकार (१) बाह्य एवं (२) आभ्यन्तर दो प्रकार के करण हैं—इन्द्रियाँ हैं । इस प्रकार २३ प्रकार के कार्य करण वर्ग विषयी होने के कारण अन्यथानुपपत्ति द्वारा आक्षिप्त हैं । प्रवर्तक हेतु के बिना विषय-प्रवृत्ति का अभाव हो जाने के कारण विषयत्व भी उपपादित नहीं किया गया । अतः यहाँ सुखाद्यात्मा भी आक्षिप्त हैं । ‘सुख’ क्या है? प्रत्येक प्राणी की स्ववासनानुगुणेष्टविषयप्राप्ति से होने वाली अनित्य तृप्ति रूप आनन्द ही सुख है । ‘सुखं प्रतिप्राणिस्ववासनानुगुणेष्टविषयप्राप्तेस्तृप्तिरनित्य आनन्दः ।'—उसके द्वारा प्रयुक्त होकर इष्टविषयों के आदान हेतु ही प्रवृत्ति होती है । उसके विपरीत ही दुःख होता है जो कि अनिवृत्तिरूपात्मक है और अनिष्टविषयात्मक है । दोनों का न्यग्भाव मोह है । वृत्तिकार ने जो ‘रूपाद्यभिलाषात्मकः’ कहा है वह ‘तन्मात्रगोचरः’ का पर्याय है । रूपादिक में जो अभिलाषा (राग) है उसके निमित्तक होने के कारण तदात्मक प्रत्ययोद्भव होता है । उसके कारण—अभिलाष-प्रपंच ही सुखाद्यात्मक प्रधान कारण है अतः यह प्राधानिकी २४ तत्त्व ‘तन्मात्रगोचरः’ शब्द द्वारा आक्षिप्त है । पूर्व में १२ तत्त्वों को विनिर्णीत किया गया—शिवादिविद्यान्त ५, माया, काला- दिक ५, पशुतत्त्व—इस प्रकार ३६ तत्त्वों द्वारा पारमेश्वरी शक्ति विजृंभण करती है— ‘द्वादशतत्त्वानि निर्णीतानि—दूतद्यथा-शिवादिविद्यान्तानि पंच, माया, कालादिपंचकं, पशुतत्त्वं च इति षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपतया पारमेश्वरी एकैव शक्तिर्वृजृंभते ।।' इस प्रकार प्रत्ययोद्भव ही पशुत्व का कारण है इस तथ्य के प्रतिपादित किये जाने के कारण भोग्य होने के कारण जीव पशु कहा जाता है—'प्रत्ययोद्भवस्य पशुत्व- कारणभावे प्रतिपादिते शक्तिवर्गस्य भोग्यतां गतः सन् पशुः स्मृतः ॥’२ १-२. रामकण्ठाचार्यः— ‘स्पन्दकारिकाविवृति' ।

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