स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 472, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ३७१ शाक्त प्रसार के ३ प्रकार हैं—'प्रत्ययोद्भव' । 'स्वरूपा वरण' पशुवर्तिनी स्थूल के रूपको ग्रहण कर लेना, अर्थात्—'आणवमल' 'मायीयमल' 'कार्ममल' ।। —'स्वतन्त्र' का अस्वतन्त्र बन जाना । भट्टकल्लट की व्याख्या—'स्पन्दसर्वस्व'— परामृतरसापायः = परामृतरस = स्वस्वरूप । अपायः = विच्छेद, विच्युति । प्रत्ययोद्भवः = 'विषयदर्शने स्मरणोदयः' तेनास्वतन्त्रता मेति = तेन + स्वतन्त्रताम् + एति । स्वतन्त्रता प्राप्त करता है । स च तन्मात्रगोचरः = 'रूपाद्यभिलाषात्मकः ।।' बन्धन एवं विकल्पों की भूमिका—अपने निर्विकल्प स्वरूप में विकल्पों के ज्ञान का प्रकटीकरण होना ही परामृतरस (शिवशक्ति-सामरस्य) से च्युत हो जाना है । इसी के कारण जीव (अपनी सहज 'स्वातन्त्र्य शक्ति' खोकर) अस्वतन्त्र (पराधीन) हो जाता है । इस विकल्प ज्ञान के विषय पाँच तन्मात्रायें हैं । (क) 'विकल्पों' का प्रकटीकरण—जीव का परामृतरस से च्युत होना । (ख) 'विकल्पों' का उदय—स्वातन्त्र्य शक्ति से च्युत होकर अस्वतन्त्र हो जाना । (जीवों का स्वातन्त्र्यशक्ति से हीन होना) ।। (ग) 'विकल्पों' के विषय पाँच तन्मात्रायें हैं । भट्टकल्लट कहते हैं कि—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध आदि पंच तन्मात्राओं के प्रति पशुप्रमाता की अभिलाषा का उत्पन्न होना ही विकल्प ज्ञान का विषय है । 'विमर्शात्मिका स्पन्दशक्ति' की बाह्योन्मुख प्रसार-क्रीड़ा (सृष्टि विस्तार = शाक्त प्रसार) के रूप— (१) प्रत्ययोद्भव (२) स्वरूपावरण (३) स्थूलात्मिका क्रियाओं का ग्रहण (अर्थात् 'आणव मल' 'मायीयमल' 'कार्मकल') ।। 'शक्ति' सृष्टि-प्रसार की अपनी क्रीड़ा 'शिवभाव' (अनुत्तर कोटि) से जड़भावा- त्मक (निम्नतम स्तरीय) पृथवीतत्त्व तक व्याप्त रखती है । शिव से पृथ्वी तक ३६ तत्त्व हैं । समस्त विश्व इसी में अन्तर्भूत या संलीन है । 'शक्ति' का सृष्टि-प्रसार एवं 'प्रत्ययोद्भव'—'शक्ति जब सिसृक्षु होकर अपनी बाह्योन्मुखी अभिव्यक्ति करती है तब वह 'प्रत्ययोद्भव' के रूप में परिणत होती है । समस्त विकल्प-साम्राज्य प्रत्ययोद्भूत ही तो हैं । शिव के स्वातन्त्र्य शक्ति का 'मायाशक्ति' के रूप में स्वरूप-ग्रहण-शिव में अपनी पूर्णता, स्वतन्त्रता, पूर्ण ज्ञातृत्व, पूर्ण कर्तृत्व, पूर्ण तृप्ति, पूर्ण विभुत्व के संदर्भ में संदेहाविर्भाव—प्रथम प्रत्ययोद्भव (अपने निरपेक्ष पूर्ण स्वातन्त्र्य में विश्वास न होना)—(१) स्वतन्त्र ज्ञातृत्व की हानि (२) स्वतन्त्र कर्तृत्व पर अविश्वास ।। अर्थात् अनात्म पदार्थों में आत्मबोध एवं आत्म बोध की हानि ।। सबसे बड़ा प्रत्ययोद्भव यही है जो कि स्वातन्त्र्यहानिमूलक है । यही 'आणवमल' भी कहलाता है ।