स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७२ स्पन्दकारिका प्रत्ययोद्भव—स्वस्वातन्त्र्य में अविश्वास—आत्मा का अवरोहण—चेतन ही जड़त्व प्राप्त कर लेता है तथा 'परावाक्' वैखरी वाक् तक अवरोहण कर लेती है । परिणाम— (१) सर्वज्ञातृत्व—किंचिद् ज्ञातृत्व (२) सर्वकर्तृत्व—किंचित् कर्तृत्व = सर्वात्मक ज्ञान—संकुचित ज्ञान सर्वात्मक क्रिया—अल्पक्रिया ।। परिणाम = ३६ तत्त्वों का बाह्यावभासन । यही 'परामृतरसापाय' है । परामृत = प्रकाशस्वरूप शिव । संवित् शक्ति । रस = अहं विमर्शमयी स्पन्दशक्ति । परामृत = सदाशिव, ईश्वर एवं शुद्ध विद्या इन तीनों तत्त्वों को भी सूचित करता है । एक ही तत्त्व प्रकाश के प्राधान्य से 'शिव' एवं विमर्श के प्राधान्य से शक्ति है और दोनों मूलतः अभिन्न है । प्रत्ययोद्भव = ६ तत्त्व, जिन्हें 'षट् कंचुक' कहा जाता है ये भेद बुद्धि की सर्जना करने वाले माया के प्रसार हैं । इनका रूप निम्नांकित है— प्रत्ययोद्भव = (१) माया तत्त्व (२) कला तत्त्व (३) विद्या तत्त्व (४) राग तत्त्व (५) नियति तत्त्व (६) काल तत्त्व ।। स्वतन्त्र = शिव । शक्ति । अस्वतन्त्र = प्रत्ययावृत पुरुष तत्त्व ।। षट् कंचुक आबद्ध पशु ।। पशुप्रमाता ।। तन्मात्रगोचरः = प्रकृति, बुद्धि, मनस् । अहंकार । श्रोत्र । त्वक् । नेत्र । जिह्वा । घ्राण । वाक् । हस्त । पाद । पायु । उपस्थ । शब्द । स्पर्श । रूप । रस । गंध । आकाश । वायु । तेजस् । जल । एवं पृथ्वी तत्त्व ।। 'प्रत्ययोद्भव' क्या है? अपनी आत्मभूता स्वरूप शक्ति के विरुद्ध विकल्पहीन स्वरूप में ज्ञेय विषयों से सम्बद्ध विकल्पात्मक ज्ञानों का उदय होना ही 'प्रत्ययोद्भव' है। 'तन्मात्र' शब्द मात्र ५ तन्मात्राओं का ही नहीं प्रत्युत् समस्त प्रकृत्योद्भूत सृष्टि का वाचक है । ब्राह्मी आदि शाब्दी शक्तियाँ जीवों के स्वरूप पर सदैव आवरण डालकर उसे आच्छादित करने का प्रयास करती रहती है । शब्दों की अनुस्यूतता न हो तो कोई भी प्रत्यय उत्पन्न ही नहीं हो सकता : 'यतः शब्दानुवेधेन न बिना प्रत्ययोद्भवः ॥' (का० ४७) 'अस्वतन्त्रता' का कारण क्या है? '... ... ... ... प्रत्ययोद्भवः । तेनास्वतन्त्रतामेति स च तन्मात्रगोचरः ॥' (का० ४६) विकल्प ज्ञान—(१) 'परामृतरसापाय ।' (२) 'स्वातन्त्र्य हानि' ग्राह्य विषयों की प्राप्ति होने पर तद्विषयक अनुस्मृति का उदय होना ही प्रत्ययोद्भव का रूप है । प्रत्ययोद्भव के विषय तन्मात्र हैं ।