स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ स्पन्दकारिका (ii) The purpose of the body of his book : “What constitutes the essential identity of every being and what therefore is self- evident is Siva as an ever-running stream of desire, as a spontaneous flow of cognition and activity, as happiness and intelligence and as all pervasive” (मधुसूदन कौल शास्त्री) । (iii) यह दर्शन पूर्णतया अद्वैतवादी है क्योंकि प्रारंभ में ही सोमानन्दपाद ने ‘अस्मद्रूप समाविष्टः’ कहकर अपने को शिव के साथ अभिन्न घोषित करते हुए कहा है— “Let Siva who is one in substance with us often his obeisant to Siva, who has materialized his own nature in the form of universe by his own native power for success in overcoming the obstacle with the help of the triple agency of Mind, Tongue and body.” ‘अस्मद्रूपसमाविष्टः स्वात्मनात्मनिवारणे । शिवः करोतु निजया नमः शक्त्या ततात्मने ॥’ (शिवदृष्टि) ४. सर्वात्मवाद—प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्द दोनों दर्शन सर्वात्मवादी हैं— आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निर्वृतचिद्विभुः । अनिरुद्धेच्छाप्रसरः प्रसरद् दृक्क्रियः शिवः ॥ (शिवदृष्टि) ‘सर्वभावेषु स्वात्मैव शिव व्यवहर्तव्यमिति प्रतिज्ञा । निवृत्तचिदित्यादिविशेषण- कलापो हेतुः । स्फुरन्नपि धर्मिणो हेतोश्च स्वसंवेदनप्रत्यक्षप्रमाणम् ।।’ (शिवदृष्टिवृत्ति— उत्पलदेवाचार्य) ।। ५. इच्छाज्ञानक्रियाभेदवाद— ‘तदिच्छातावत्ती तावज्ज्ञानं तावत्क्रिया हि सा ॥’ (शिवदृष्टि) सोमानन्दं एवं स्पन्द दार्शनिक—दोनों इसे मानते हैं । ६. शब्दसृष्टिवाद— अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥¹ उत्पलदेव कहते हैं— ‘पश्यन्तीरूप शब्दतत्त्वमक्षरमनाद्यन्तं ब्रह्मविश्वार्थभावेन विवर्तते ।।’² बिना वाणी के तो ब्रह्म का प्रकाश भी प्रकाशित होना संभव नहीं है— ‘वाग्रूपतां बिना न ब्रह्मतत्त्व प्रकाशोऽपि प्रकाशेत् ।’ (शिवदृष्टिवृत्ति) यद्यपि ‘ईश्वराद्वयवादी’ ‘शब्दपरब्रह्माद्वयवाद’ को स्वीकार न करके ‘ईश्वराद्वय- वाद’ की स्थापना करते हैं फिर भी शब्दसृष्टिवाद मानते हैं— १. शिवदृष्टि में उद्धृत । २. शिवदृष्टिवृत्ति (उत्पलदेव) ।