स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 48, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि ४७ 'ईश्वराद्वयवाद' एव युक्तियुक्तो न तु 'शब्दब्रह्माद्वयवाद' इति वक्तुं वैयाकरणोपेत शब्दाद्वैतं तावन्निराकर्तुमुपक्रममाण आह— अथास्माकं ज्ञानशक्त्या सदा शिवरूपता । वैयाकरणसाधूनां पश्यन्ती सा परा स्थितिः । (२।१)¹ 'वाक्यदीय' में भर्तृहरि—कहते हैं कि जगत् एक 'अर्थ' है अर्थ 'वाच्य' है और 'शब्द' वाचक है । जगत् एवं शब्द में वाच्यवाचक संबंध तो है किन्तु यथार्थ सत्ता की दृष्टि से तो जगत् शब्द का 'विवर्त' (असत् में सत् का भ्रम, अतत्वतो प्रथा') है अर्थात् जगत् मूलतः शब्द है न कि स्वतन्त्र पदार्थ । 'पराशक्ति' 'परावाक्' के रूप में एवं परावाक् 'पश्यन्ती' के रूप में, पश्यन्ती 'मध्यमा' के रूप में एवं मध्यमा 'बैखरी' के रूप में विकसित होती है और यही बैखरी विश्वविग्रहा है—'बैखरी विश्वविग्रहा' । 'अहं' (अ से ह = शिव + शक्ति) में ही सारी वर्णसमष्टि एवं निखिल जगत् अवस्थित है । जगत् अहमाकार है । 'कामकला' अहमाकार है । 'स्पन्द' में शक्ति-प्राधान्य—'स्पन्दशास्त्र' में 'स्पन्द' (आत्मशक्ति, चित् शक्ति, इच्छाशक्ति, स्वातंत्र्यशक्ति, संवित्शक्ति) का प्राधान्य है इसीलिए इस शास्त्र का नाम भी स्पन्दशास्त्र भी है । इसका शक्ति-प्राधान्य प्रतिपाद संगत भी है क्योंकि—'तद्योगादेव शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति' (वरिवस्यारहस्यम्) शिव-शक्ति-अभेदवाद—'शिव शक्तिरिति ह्येकं तत्त्वमाहुर्मनीषिणः ।' 'शिवाभिन्ना पराशक्तिः' 'न शिवेन विनादेवी न देव्या च बिना शिवः' इन दोनों में चन्द्रमा एवं चन्द्रिका के सम्बन्ध की भाँति ऐक्य है—'नानयोरन्तरं किंचिच्चन्द्रचन्द्रिकयोरिव' । महेश्वर एवं जीवात्मा का ऐक्य—निखिल जगदात्मा, सर्वोत्तीर्ण, सर्वमय, विकल्पों से असंकुचित, संवित्प्रकाशरूप, अनवच्छिन्नचिदानन्दविश्रान्त, अविरल प्रसरण- शील, विचित्र पञ्चवाहवाहवाहिनीमहोदधि, निरतिशयस्वातंत्र्य से प्रगल्भमान, सर्वशक्ति- खचित एकात्मक, अद्वैत समस्त शक्तियों से उपहित संविदात्मा महेश्वर ही अपनी स्वातंत्र्यशक्ति की महिमा से अपने को संकुचित की भाँति आभासित करते हुए अणु (जीव) कहलाते हैं—'स च भगवान् स्वातंत्र्यशक्तिमहिम्ना स्वात्मानं संकुचितमिव आभासयन् अणुः उच्यते । यथोक्तम्— 'व्योपको हि शिवः स्वेच्छाक्लृप्तसंकोचमुद्रणात् । विचित्रफलकर्मौघवशात्तत्तच्छरीरभाक् ॥ 'अतिदुर्धटकारित्वात्स्वाच्छन्द्यान्निर्मलादसौ । स्वात्मप्रच्छादनक्रीडा पण्डितः परमेश्वरः ॥ (जन्ममरणविचार—भट्टवामदेव) १. शिवदृष्टि ।