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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 487

३८६ स्पन्दकारिका शब्दाद्वयवाद में शब्द एवं अर्थ दोनों को शक्तिप्रसार माना गया है और इसे शक्ति का विवर्त कहा गया है— 'अथायमान्तरो ज्ञाता सूक्ष्मे वागात्मनि स्थितः । व्यक्तये स्वस्य रूपस्य शब्दत्वेन विवर्तते ॥' 'अनादि निधनं ब्रह्म' द्वारा शब्द तत्त्व को 'ब्रह्म' कहकर शब्द की पारमेश्वर रूपता को ही प्रतिपादित किया गया है । यह परा शक्ति ही स्वमार्गस्था रूप में परिज्ञात होने पर सम्यक् प्रतिपन्न स्वभावा होकर संपूर्ण सिद्धियों को प्रदान करती है ।१ इसी शक्ति के विषय में कहा गया है— 'सा चेयं क्रियात्मिका क्रियास्वभावा' । सांख्य दर्शन एवं स्पन्दशास्त्र : एक तुलना— (१) पुरुषोऽस्ति भोक्तृभावात् कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्च ॥ (२) पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य । (३) प्रति पुरुषविमोक्षार्थं स्वार्थ इव परार्थ आरंभः ॥ (४) पुरुषविमोक्षनिमित्तं तथा प्रवृत्तिः प्रधानस्य ॥ (५) पुरुषस्य विमोक्षार्थं प्रवर्तते तद्व्यक्तम् ॥ (६) रंगस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात् । पुरुषस्य तथाऽत्मानं प्रकाश्य निवर्तते प्रकृतिः ॥ (७) रूपैः सप्तभिरेव तु बध्नात्यात्मानमात्मना प्रकृतिः । सैव च पुरुषार्थं प्रति विमोचयत्येकरूपेण ॥२ 'प्रकृति' या 'शक्ति' द्वारा—(१) बन्धन एवं (२) मोक्ष दोनों कार्य निष्पादित । क्रियाशक्ति बन्धन और मोक्ष दोनों का उपाय है—'क्रिया शक्ति' के दो रूप— इस कारिका में कारिकाकार ने भगवान् की 'क्रियाशक्ति' के दो रूपों का विवेचन किया जो निम्नानुसार हैं । इनका पूर्ण परिचय इस प्रकार देखिए । भगवान् शिव की शक्तियाँ (मुख्य शक्तियाँ) ┌──────────┬──────────┬──────────┬──────────┐ चित्शक्ति आनन्दशक्ति इच्छाशक्ति ज्ञानशक्ति क्रियाशक्ति (प्रकाशरूपा) (स्वातन्त्र्यरूपा) (उपभोगात्मक (आमर्शात्मक (सर्वाकार चमत्कार रूपा) वेद्य के प्रति योगित्व) उन्मुख) क्रियाशक्ति—(१) प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः ॥३


१. रामकण्ठाचार्यः स्पन्दकारिका वृत्ति । २. सांख्यकारिका । ३. तन्त्रसार ।

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