भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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तृतीयः निष्यन्दः ३९९ नेत्रों के सम्मुख आये, एकाग्र होकर उसकी तब तक भावना करो जब तक मन लीन न हो जाय । निरोध तुम्हारा सेवक बन जाएगा— ‘तद्धन्मनोहरं किंचिदक्षिगोचरमागतम् । एकाग्रं भावयेत्तावद्यावलीनं निरोधकृत् ॥’ इस प्रकार स्वातन्त्र्य की प्राप्ति होती है तब पुरुष शक्तिचक्र का स्वामी (सर्वज्ञ, सर्वाधिपति) होकर अभिव्यक्त हो जाता है— ‘एवं सति स्वातन्त्र्याप्तेस्ततश्चक्रेश्वरः शक्तिचक्रस्वामी सर्वज्ञतादियुतः सर्वाधि- पतिर्भवेत् ॥’१ इस कारिका में बन्धनों के उच्छेद के उपायों पर प्रकाश डाला जा रहा है । अब आत्मा रूप शिव के ऐश्वर्यरूप पतित्व की जिससे अभिव्यक्ति होती है उन उपायान्तर पर प्रकाश डाला जा रहा है— यदा तु = जब जिस दूसरे काल में स्थूल-सूक्ष्म होने के कारण इन पुर्यष्टकों के प्रत्ययों के उद्भव के मूल स्रोत शरीर द्वय के मध्य ‘एकत्र’ = अन्यतर में (या प्राक् प्रतिपादित उपपत्ति के द्वारा संवेद्यमान अर्थ के शरीर में व्यवस्थित होने पर भूतात्मक भावात्मक भेदद्वय द्वारा स्थूल-सूक्ष्म शरीरों के मध्य एकत्र या ध्येय रूप में आलम्बनीय स्थूल सूक्ष्म भावद्वय के मध्य एकत्र) संरूढः = सम्यक् रूप से अविलम्ब रूढ़; एकाग्रता के प्रकर्ष द्वारा अभिन्न रूप से परिणत संवित्-साधक ।२ तदा = उस क्षण तस्य = उसका । अभेदप्रतिपन्न शरीर का । लयोद्भवौ = त्याग-ग्रहणरूप विनाशोत्पाद । नियच्छन् = भोक्तृ शब्द से वक्ष्यमाण सत्य के कर्ता को अपने कार्य के रूप में अवधारित करते हुए—अर्थात् मैं ही नित्य निरावरण स्वतन्त्र- चिन्मात्रस्वरूप—इन दोनों का कर्ता हूँ—इस प्रकार निर्विकल्प रूप में व्यवस्थापित करते हुए—भोक्तृतामेति—भोक्तृता प्राप्त कर लेता है, भोक्ता का अर्थात् उपलब्धिमात्र स्वभाव परमात्मा का भाव भोक्तृता है । उसी समय वह प्रत्यभिज्ञा के द्वारा स्वीकार करता है— ततः—सत्यात्मस्वरूप प्रत्यभिज्ञालक्षण के कारण ‘चक्रेश्वरो भवेत्’ चक्र का (प्राक्प्रतिपादित चराचरभावपर्यन्त प्रसृत प्रपंच के द्वारा विस्तारित शब्दराशिसमुत्थित स्वशक्तिसमूह का)—ईश्वर (अधिष्ठाता) अर्थात् स्वैश्वर्यवृजृंभामात्र रूप में अवगम्यमान यथेष्ट विनियोक्ता—भेवत् = (संपद्येत्)—हो जाता है । तभी स्वाभाविक स्वातन्त्र्या- भिव्यक्ति द्वारा पशुप्रत्यय के प्रध्वस्त हो जाने पर शक्तिचक्र की भोग्यता का त्याग करके, उसके भोक्तृभावरूप ऐश्वर्य को प्रतिपादित करना चाहिए । अतः लयोद्भव दोनों को भोक्ता आत्मा में—नियच्छेत्—निश्चित करना—चाहिए (निश्चयेत्) ॥ भाव यह है कि जिस प्रकार देहमात्र में आत्माभिमान रखने वाला कोई प्राणी घटादिक बाह्य पदार्थ का (ग्राह्यतया प्रतिपन्न पदार्थ का) त्याग एवं ग्रहण अपने में यह निश्चित करता हुआ कि—‘मैं ही इन दोनों का कर्ता हूँ’—करता है और इसी के १. उत्पलदेव = ‘स्पन्दप्रदीपिका’ । २. रामकण्ठाचार्य—‘स्पन्दविवृति’ ।

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