स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०० स्पन्दकारिका
अनुसार स्वतन्त्रकर्ता—को शरीरितानिविष्ट आत्मा मानता है—ठीक उसी प्रकार उस शरीर की वेद्यभूमिका के आपादन द्वारा क्रियमाण त्याग एवं ग्रहण से विलक्षण, वेद्यत्व- संस्पर्शासहिष्णु तथा अनन्यसाधारण कर्तृत्वस्वभाव वाली स्वात्मा में वस्तुसामर्थ्य द्वारा नियमों का पालन करते रहने पर भी उसका पालन अबुद्धता के कारण नहीं हो पाता। अतः शरीर एवं शरीरी में पार्थक्यगत विवेक का जिसको बोध हो उसी के लिए यह उपदेश है अन्य के लिए नहीं। क्योंकि उसी प्रकार का साधक, जिसकी कि अनुग्रह शक्ति से संशयग्रंथि शकलित हो चुकी है, परमात्मविषयक उपदेश का सत्पात्र है अन्य नहीं। कहा भी गया है—'अयं सर्वस्य प्रभव इतः सर्वं प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति रमयन्ति च ॥ तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मां प्रापयन्ति ते ॥ तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥' जिसके उपदेश से और उपदेश के अनुशील्यमान होने से—एकत्र = प्रतिपादित शरीर के (अभेदात्मक रूप से प्रतिभासमान शरीर के) समनन्तर वेद्यीक्रियमाण का त्याग ग्रहात्मक लयोद्भव उसके विधर्मी भोक्ता सर्वेश्वर स्वात्मा में ही स्वातन्त्र्यपूर्वक कार्यरूप में नियम्यमान किये जाने पर नियंता के परस्वभाव प्रत्यभिज्ञा का आवाहन करने पर समस्त ऐश्वर्यों की उपलब्धि प्रदान करता है। अतः आत्मा रूप शिव की स्वेच्छा के ही अधीन है यह जगत् का प्रलय और उसकी सृष्टिः 'प्रलयोदय' ॥१ आत्मस्वरूप शिव की स्वेच्छा से ही जगत् का प्रलय एवं उदय होता है— 'आत्मन एवं शिवस्य स्वेच्छामात्राधीनौ जगतः प्रलयोदयौ ।' जगत् भी उसके स्वरूप से अभिन्न है अतः उसकी स्वशक्ति के चक्र का वैभव है—'जगदपि तत्स्वरूपाभेदात तस्य स्वशक्तिचक्रमयो विभव इति ।' एक ही तत्त्व है। स्वरूप-परामर्श होने पर वह अव्यभिचारधर्मक दिखाई देता है अतः उससे अतिरिक्त कोई अन्य पदार्थ हो भी नहीं सकता—'अतो व्यतिरिक्तं किंचित् न संभवति' । कहा भी गया है— 'परमार्थे तु नैकत्वं पृथक्त्वाद् भिन्नलक्षणम् । पृथक्त्वैकत्वरूपेण तत्त्वमेकं प्रकाशते ॥ यत्पृथक्त्वमसंदिग्धं तदेकत्वान्न भिद्यते । यदेकत्वमसंदिग्धं तत्पृथक्त्वान्न भिद्यते ॥ द्यौः क्षमा वायुरादित्यः सागराः सरितो दिशः । अन्तःकरणतत्त्वस्य भागा बहिरवस्थितः ॥' १. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दविवृति'।