भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 502, कुल 519 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 502

तृतीयः निष्यन्दः ४०१ इसी भाव को अन्यत्र भी कहा गया है— चित्रालोकविकल्पकल्पितनवाकल्पाङ्क नानाकृतिं, नृत्यन्तीं बहुधा बहिः स्ववपुषोऽप्यन्तर्निभिन्नां पुनः । नित्यं नूतनकौतुकः प्रियतमां स्वां शक्तिमालोकयन्, अच्छिन्नाप्रतिमप्रमोदमहिमा शंकुर्जयेत्येककः ॥ यहाँ श्लोक की समनन्तर व्याख्या करते हुए पुस्तक के प्रथम श्लोक में प्रतिज्ञात स्वसंवेदन संवेद्य आत्मैश्वर्याद्रियलक्षणात्मक अर्थ को निर्वाहित किया गया है ।१ भट्टकल्लट ने इस कारिका की व्याख्या करते हुए कहा है कि जब साधक स्थूल या सूक्ष्म पुर्यष्टकों में से किसी एक में भी अवस्थित होकर अपने चित्त को (स्पन्द तत्त्व) लीन कर लेता है तब उस प्रत्ययोद्भव के संहार एवं सृष्टि को स्वातन्त्र्यपूर्वक सम्पन्न करता हुआ अपने (विलुप्त) भोक्तृभाव । को प्राप्त कर लेता है और उसके अनन्तर समस्त चक्रों का अधिपति बन जाता है— ‘यदा पुनस्त्वेकत्र स्थूले सूक्ष्मे वा संरूढो लीनचित्तः । तदा तस्य प्रत्ययोद्भवस्य लयोद्भवौ ध्वंसप्रादुर्भावौ नियच्छन् कुर्वन् भोक्तृतां प्राप्नोति । ततः चक्रेश्वरो भवेत् सर्वाधिपतिर्भवति ॥' (भट्टकल्लटः स्पन्दका० वृत्ति) चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति—५१वीं कारिका में सूत्रकार चक्रेश्वरत्व की उपलब्धि के उपाय पर प्रकाश डालतें हैं। ५०वीं कारिका में सूत्रकार ने कहा था कि पुर्यष्टकत्व स्वयं में ही एक बन्धन है—चाहे वह स्थूल पुर्यष्टक हो और चाहे सूक्ष्म पुर्यष्टक हो बन्धन- स्वरूप तो दोनों हैं । पुर्यष्टक ही प्रत्ययोद्भव (सुख दुःख संवेदन) को जन्म देते हैं । यदि आत्मा को अपनी शक्ति या अपना अमृतस्वरूप आत्मस्वभाव ज्ञात न हो सका तो यह अज्ञान ही आत्मा को बन्धन में डाल देता है । (१) अपनी शक्ति का अज्ञान बन्धन में डाल देता है । (२) आत्मविस्मृति बन्धन में डाल देती है । (स्वस्वरूप का अज्ञान = बन्ध) (३) स्वस्वभाव (अपना आत्मस्वभाव) न जानना बन्धन में डाल देता है । (४) पुर्यष्टकत्व बन्धन में डाल देता है । (५) अशुद्धि (मल त्रय) बन्धन में डाल देती है । बन्धन से मुक्ति कैसे प्राप्त हो? चक्रेश्वरत्व कैसे अधिगत हो? (१) संकल्पविकल्पात्मक चित्त को चितिशक्ति में संलीन करना चाहिए । (२) वासनापिण्डात्मक अपने पुर्यष्टक से मुक्ति भी आवश्यक है । (३) भोग्यभाव से मुक्त होकर भोक्ताभाव प्राप्त करना आवश्यक है । (४) स्वस्वरूप की प्रत्यभिज्ञा करना आवश्यक है । (५) अपने पशुत्व का त्याग करके अपने पशुपतित्व के वास्तविक स्वस्वरूप की अभिज्ञा आवश्यक है ।


१. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दविवृति' । स्पं० २६