भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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तृतीयः निष्यन्दः ४०३ 'तन्त्रालोक' (४ आ०) में अभिनवगुप्तपादाचार्य कहते हैं कि—शिव अपने इच्छात्मक विमर्शन के माध्यम से सदैव शक्तिचक्र के 'संयोजन-वियोजन' (निमेषोन्मेष) द्वारा अपने पंचकृत्यों का युगपत निष्पादन करते हैं और शक्ति चक्र के स्वामी होने के कारण 'चक्रेश्वर' कहलाते हैं ।¹ बन्धन होता कैसे है? चक्रेश्वरत्व लुप्त कैसे हो जाता है? 'पति' पशु क्यों बन जाता है । स्वरूपतः तो पशु एवं पशुपति में आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है फिर एक मुक्त एवं दूसरा बन्धन ग्रस्त क्यों है? शिव अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति के द्वारा आविर्भूत पुर्यष्टक की कारा में अपने को कैद करके पशु बन जाता है और इस आवरणमूलक अवस्था में स्वस्वरूप को पूर्णतः भूलकर अविवेकी, बन्धनग्रस्त, असमर्थ, अस्वतन्त्र, विमूढ़, मलावृत पराधीन पशु बना लेता है —क्योंकि वह अपनी 'स्वतन्त्रता' खो देता है—अपनी शक्तियाँ खो देता है—आत्म- स्वभाव का विमर्शनस्वरूप रत्नराशि खो देता है— 'इत्थं सर्वशक्तियोगेऽपि आभिर्मुख्याभिः शक्तिभिरुपचर्यते, स च भगवान् स्वातन्त्र्य- शक्तिमहिम्ना स्वात्मानं संकुचितमिव आभासयन् अणुः इति उच्यते यथोक्तम्— 'व्यापको हि शिवः स्वेच्छाक्लृप्तसंकोचमुद्रणात् । विचित्रफलकर्मौघवशात्तत्तच्छरीरभाक् ॥' इति निजस्वरूपगोपनकेलिलोलम् एवं माहेशशक्तिपरिस्पन्दं प्रवरगुरवः प्रतिपेदिरे ॥ कहा भी गया है— 'अतिदुर्घटकारित्वात् स्वाच्छन्द्यान्निर्मलादसौ । स्वात्मप्रच्छादनक्रीडां पण्डितः परमेश्वरः ॥ अनावृते स्वरूपेऽपि यदात्माच्छादनं विभोः । सैवाविद्या यतो भेद एतावान्विश्ववृत्तिकः ॥' बन्धन की प्रक्रिया—वही निखिलजगदात्मा, सर्वोत्तीर्ण, सर्वमय, संवित्प्रकाश, अनवच्छिन्न चिदानन्दविश्रान्त, सर्वशक्तिखचित संविदात्मा महेश्वर अपने को संकुचित करके अपनी माया शक्ति के द्वारा (अपनी आत्मा को अपने से ही संकुचित की भाँति अवभासित करता हुआ) 'विज्ञानाकल' 'प्रलयाकल' एवं 'सकल' बन जाता है—'असौ भगवान् स्वमायाशक्त्याख्येन अव्यभिचरित स्वातन्त्र्यशक्ति महिम्ना स्वात्मना एव आत्मानं संकुचितमिव अवभासयन (१) विज्ञानाकलः (२) प्रलयाकलः (३) सकलश्च संपद्यते ।'² वही शिव पशु बन जाता है यथा— (१) १ आणवमल से संयुक्त = 'विज्ञानाकल' । (२) २ (आणव-मायीय) मलों से संयुक्त = 'प्रलयाकल' । १. अभिनवगुप्त : 'तन्त्रालोक' (चतुर्थ आह्निक) । २. वामदेव भट्टाचार्यः 'जन्ममरणविचार' ।