स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०४ स्पन्दकारिका (३) ३ (आणव-मायीय-कार्म) मलों से संयुक्त = 'सकल' । 'सकल' है— 'कलादिधरण्यन्तमयाः ॥' सृजनोन्मुख बन्धन प्रक्रिया—सृष्ट्युन्मुख भगवान् शुद्धाध्वा में स्थित रहकर अपनी शक्तियों के द्वारा माया को क्षुब्ध करके— (१) किंचित्कर्तृत्वलक्षणात्मक—'कलातत्त्व' । (२) किंचिदवबोधात्मक—'विद्यातत्त्व' । (३) किंचिदभिलाषरूपात्मक—'रागतत्त्व' । (४) 'तदेतत्सरार्गं कर्तृत्वं, भूतभविष्यद्वर्तमानतया त्रिधा अवच्छिद्यते तत् 'काल- तत्त्वं'—'कालतत्त्व' । (५) 'तुल्यत्वेऽपि रागे येन कर्तृत्वस्य अवच्छेदः क्रियते तत् 'नियतितत्त्वं'— 'नियतितत्व' । इन (कला, विद्या, राग, काल एवं नियति) पञ्च-कञ्चुकों की सृष्टि करता है, इन्हीं से आच्छादित होकर 'शिव' (मलावृत शिव) पशु बन जाता है । अन्तर्मलावृत पशु के ये ही 'बहिराच्छादक तत्त्व' हैं—'कञ्चुकषट्कम् अन्तर्मलावृतस्य पुद्गलस्य बहिराच्छादकम् ॥'१ कहा भी गया है कि—अमित शिव कुञ्चकों से मित बन जाता है । ये कञ्चुक आत्मा को बाह्यावरण की भाँति बनकर ढक लेते हैं किन्तु ये नित्य नहीं है प्रत्युत धान्य की भूसी (तुषा) के समान होने के कारण पृथक् भी हो सकते हैं— 'माया कला शुद्धविद्या रागकालौ नियन्त्रणा । षडेतान्यावृतिवशात्कञ्चुकानि मितात्मनः ॥ एवं च पुद्गलस्यान्तर्मलः कञ्चुकवत्स्थितः । तुषवत्कञ्चुकानि स्युस्तस्माज्ज्ञानक्रियोज्झितः ॥'२ इस 'कला' से अग्रिम सृष्टि-संतति अस्तित्व में आती है— कला → पुरुष में परिमित कर्तृत्व एवं (सुख दुःख मोहरूप भोग्य) का सृजन करती है । → अष्टगुणात्मिका बुद्धि तत्त्व का सृजन करती है । → सात्विक-राजस-तामस त्रिस्कंधात्मक अहङ्कार का सृजन करती है । अहङ्कार → मन । अहङ्कार → इन्द्रियाँ । अहङ्कार → इन्द्रियाँ । अहङ्कार तन्मात्रा । अहङ्कार → पञ्चमहाभूत ।३ यह जो समस्त सृष्टि है और यह जो निःशेष विश्व-प्रपञ्च है तथा जो यह ३६ तत्त्वों का प्रसार है—यह सब कुछ शिव का ही प्रसार है ।४ ये सारे तत्त्व संवित्-सिन्धु की तरंगें हैं— १-४. वामदेव भट्टाचार्यः 'जन्ममरणविचार' ।