स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 507, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ें४०६ स्पन्दकारिका 'भोक्तृता एवं 'चक्रेश्वरत्व' ही इस अन्तिम (उपसंहारात्मक) कारिका का मुख्य प्रतिपाद्य विषय होने के कारण निष्कर्ष यह निकलता है कि स्पन्द विज्ञान (स्पन्द सूत्र) का अन्तिम लक्ष्य—भोक्ताभाव एवं चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति है और उसका साधन है स्वरूपानुसंधान ॥ सूक्ष्मशरीर से आबद्ध पुरुष पराधीन होकर सूक्ष्मशरीर में समुत्थित सुख-दुःखादिक संवेदन रूप प्रत्ययों का उपभोग करता है और इसी के परिणामस्वरूप वह आवागमन- चक्र में फँसकर संसरण करता हुआ दुःखों का भोग करता है। आचार्य क्षेमराज ने ठीक ही कहा है—'सुखदुःख मोहमयाध्यवसायादिवृत्तिरूपं तदुचितभेदावभासानात्मकं यत् ज्ञानं तत बन्धः । तत्पाशितत्वादेव हि अयं संसरति' ।१ तन्त्रसद्भाव में भी कहा गया है— सत्त्वस्थो राजसस्थश्च तमस्थो गुणवेदकः । एवं पर्यटते देही स्थानात्स्थानान्तरं व्रजेत् ॥२ इसी तथ्य को कारिकाकार ने भी कहा है— 'तन्मात्रोदयरूपेण मनोऽहंबुद्धिवर्तिना । पुर्यष्टकेन संरुद्धस्तदुत्थं प्रत्ययोद्भवम् ॥ भुङ्क्ते परवशो भोगं तद्भावात्संसरेत् ॥'३ 'अतः संसृति प्रलयस्यास्य कारणं संप्रचक्ष्महे ॥'४ भट्टकल्लट 'स्पन्दसन्दोह' में कहते हैं—'अस्वतन्त्रो (पशुप्रमाता) भोगं सुखदुःख- संवेदनरूपं भुङ्क्ते अश्नाति । तस्य पुर्यष्टकस्य भावात् संसरति संसारशरीरे, अतः संसृति-प्रलयस्य जन्मरणप्रवाहरूपस्य 'संसारस्य विनाशकारणं संप्रचक्ष्महे वक्ष्यामः ॥'५ इस पुर्यष्टकाधीन अवस्था में पशुप्रमाता अपने पति प्रमातृत्व का विस्मरण कर देता है और अपनी सर्वकर्तृत्व-सर्वज्ञत्व-पूर्णत्वनित्यत्व-व्यापकत्व आदि शक्तियों को संकुचित करके क्रमशः कला-विद्या-राग-काल-नियति का अनुवर्ती होकर 'शक्तिदरिद्री संसारी' बन जाता है— 'तथा सर्वकर्तृत्व-सर्वज्ञत्व-पूर्णत्व-नित्यत्व-व्यापकत्व शक्तयः तथाविधश्च अयं शक्तिदरिद्रः संसारी उच्यते ॥'६ किन्तु वही अपनी संकुचित शक्तियों के ऊपर आरोपित संकोचावरण हटा लेने पर शिव बन जाता है— 'स्वशक्तिविकासे तु शिव एव ॥'७ सारांश यह कि—पुर्यष्टकत्व संसारित्व एवं बन्धन का कारण है।
१. शिवसूत्रविमर्शिनी (३।२)। २. तन्त्रसद्भाव । ३-४. स्पन्दकारिका । ५. स्पन्दसन्दोह ६-७. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (१०) ।