स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ४०७ 'पूर्णाहन्ता' एवं 'चक्रेश्वरत्व' – त्रिकदर्शन का उच्चतम प्राप्तव्य एवं उसकी पूर्णतम उपलब्धि 'पूर्णाहन्ता' एवं 'चक्रेश्वरत्व' है— स्पन्दशास्त्र—(१) 'स्पन्दकारिका' यदा त्वेकत्वसंरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ । नियच्छन् भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥ (तृ०१५१)१ प्रत्यभिज्ञा शास्त्र—(२) 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' – (आचार्य क्षेमराज) 'तदा प्रकाशानन्दसारमहामन्त्रवीर्यात्मक पूर्णाहन्तावेशात् । सदा सर्वसर्गसंहारकारिनिजसंविद्देवता चक्रेश्वरता प्राप्तिर्भवति ॥२ तब प्रकाशानन्दसार, महामन्त्रवीर्यात्मक, पूर्ण अहन्ता के साथ अभेद होने से सदा, सब प्रकार की सृष्टि एवं लय करने वाली अपनी संवित् शक्तियों पर प्रभुत्व स्थापित हो जाता है । अहन्ता और मन्त्र—यही 'अहन्ता' समस्त मन्त्रों के उदय एवं विश्रान्ति का स्थान है । इसके बल से ही भिन्न-भिन्न प्रयोजनों की सिद्धि होती है अतः इसे महती 'वीर्यभूमि' कहा गया है । 'स्पन्दशास्त्र' में भी कहा गया है कि ३–'उस निरावरण चिद्रूपबल को अधिष्ठित करके 'मन्त्र' सर्वज्ञत्व आदि सामर्थ्य से युक्त होकर (अनुग्रह आदि स्वाधिकार में प्रवृत्त होते हैं यथा देहधारियों में इन्द्रियाँ) ..... 'तदाक्रम्य.... शिवधर्मिण । 'प्रकाश' अर्थात् नील, सुख आदि की आत्मा में विश्रान्ति या लय 'अहंभाव' दया 'पराहन्तापरामर्श' कहा गया है । समस्त अपेक्षाओं के निरुद्ध होने पर वही 'विश्रान्ति' (तृप्ति) 'स्वातन्त्र्य' 'मुख्य कर्तृत्व' एवं 'ऐश्वर्य' कहा जाता है—४ 'प्रकाशस्यात्मविश्रान्तिरहम्भावो हि कीर्तितः । उक्ता च सैव विश्रान्तिः सर्वापेक्षानिरोधतः ॥ स्वातन्त्र्यमथ कर्तृत्वं मुख्यमीश्वरतापि च ॥' 'नित्योदित समाधि' के समुपलब्ध हो जाने पर चिदानन्दघन समस्त मन्त्रों की प्राणरूपा, पराभट्टारिका अहन्ता (अकृत्रिम स्वात्म चमत्कार) से योगी अभिन्न हो जाता है और तब कालाग्नि से लेकर शान्त्यतीता चरम कला पर्यन्त विश्व के विचित्र सृष्टि एवं प्रलय करने वाली संवित् शक्तियों का ऐश्वर्य प्रस्तुत परमयोगी को प्राप्त होता है । यह सब शिवस्वरूप ही है ।५ 'अहन्ता' क्या है? अहन्ता अकृत्रिम स्वात्मचमत्कार है— 'अहन्ता अकृत्रिमः स्वात्मचमत्कारः ॥'६ महामन्त्रवीर्य रूप पूर्णाहन्ता में आवेश का अर्थ है—देह, प्राण आदि के निमज्जन (विलय) से पराहन्ता पद की प्राप्ति द्वारा देहादिकों एवं नीलादिकों का भी उसी रस में डूबने से तन्मयीकरण ॥ 'विभु की मायाशक्ति द्वारा भिन्न-भिन्न बाह्य एवं आभ्यन्तर १. स्पन्दकारिका (तृ०१५१) २-६. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।