भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

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तृतीय: निष्यन्द: ४१५ वह एक आणव मल से उपहित होकर—'विज्ञानाकल' बन जाता है । वह दो आणव मलों से उपहित होकर—'प्रलयाकल' बन जाता है और वह तीन आणव मलों से उपहित होकर—'सकल' बन जाता है । 'असौ भगवान् स्वमायाशक्त्याख्येन अव्यभिचरितस्वातन्त्र्यशक्तिमहिम्ना स्वात्म- नैव आत्मानं संकुचितमिव अवभासयन् विज्ञानाकलः, प्रलयाकलः सकलश्च संपद्यते ॥' १ अतः जीवत्व भी एक भ्रान्तिमूलक उपाधि है । सत्य तो 'शिवत्व' है । जीवत्व शङ्कराचार्य की दृष्टि के समान मिथ्या भी नहीं है क्योंकि स्वयं शिव ही जीव है । होता यह है कि सृष्ट्युन्मुख भगवान् शुद्धाध्वा में वर्तमान होकर अपनी शक्तियों द्वारा माया को विक्षुब्ध करके— (क) 'कलातत्त्व' को किञ्चित्कर्तृत्व में परिवर्तित करके (ख) 'विद्या तत्त्व' को किञ्चिद् अवबोध में परिवर्तित करके (ग) 'राग तत्त्व' को किञ्चिद् अभिलाषा में परिवर्तित करके (घ) 'काल तत्त्व' को भूत, भविष्य, वर्तमान के खण्डित एवं संकुचित काल खण्डों में विभक्त करके स्थित कालावच्छेद में परिवर्तित कर देता है । (ङ) 'नियति तत्त्व' को कर्तृत्वावच्छेद में परिवर्तित कर देता है । 'कला तत्त्व' शिव के सर्वकर्तृत्व को किञ्चिद् कर्तृत्व में बदल देता है और सुख- दुःख एवं मोह के आवरण उत्पन्न कर देता है शिव का जीवत्व-ग्रहण केवल 'निजस्वरूप गोपनकेलि' मात्र है । २ अतः स्पष्ट है कि स्वरूप गोपन की क्रीड़ा के अभिनय के लिए संशय भूमिका पर स्वेच्छा से स्थित शिव के लिए यह पाशव भूमिका छोड़कर संशयों का उच्छेद करना तो अत्यन्त सरल है क्योंकि यह संशयावृत पशु भूमिका उसने अपनी स्वेच्छा से गृहीत किया है अतः यह सत्य नहीं है अपितु भट्टकल्लट के मतानुसार 'अप्रतिष्ठ' (आधार शून्य, निराधार एवं अयाथार्थ) है किन्तु पाशवभूमिका का त्याग न करने पर यह 'संशय' 'अनन्त' समुद्रवत् दुस्तर भी है तथापि 'गुरुभारती' की शक्ति से यह 'अगाध' (अनन्त समुद्र) तरना अत्यन्त सरल है । इसी दृष्टि से वृत्तिकार कहते हैं— 'अगाधो ह्यप्रतिष्ठोऽनन्तः ॥' कारिकाकार कहते हैं—'अगाध संशयांभोधिसमुत्तरणतारिणीम्' । वृत्तिकार का प्रधान संदेश—वृत्तिकार 'अगाधसंशयाम्भोधि' की व्याख्या के संदर्भ में 'अगाध' की व्याख्या में जो उसका अर्थ—'अप्रतिष्ठ' करते हैं उसके पीछे उनका शैव सम्प्रदाय के 'बन्धन' एवं 'मुक्ति' के स्वरूप पर प्रकाश डालना है जो कि निम्नानुसार है— शैवदर्शन में 'बन्धन' नामक कोई यथार्थवस्तु है ही नहीं— न मे बन्धो न मोक्षो में भीतस्यैता विभीषिकाः । प्रतिबिम्बमिदं बुद्धेर्जलेष्विव विवस्वतः ॥ ३ १-२. वामदेव भट्टाचार्य—'जन्ममरणविचारः' । ३. विज्ञानभैरव ।