स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१६ स्पन्दकारिका कल्हण ने 'बन्धन को फूस का निर्मित मुझौसा जैसा मिथ्या कहा है— 'शालीनपलालपुरुषोऽवति यः कृशानुः । दग्धाननश्चटकपेटकभीतिदानैः ॥' जिस प्रकार किसान लोग अपनी फसल की रक्षा करने के लिए घास-फूस का एक आदमी बनाकर खड़ा कर देते हैं और उसे जानवर आदमी समझते हुए भयभीत होकर खेतों से भाग जाते हैं किन्तु हाथी उससे भयभीत होकर नहीं भागता क्योंकि पलाल पुरुष भला हाथियों का क्या बिगाड़ सकता है? इसी प्रकार पञ्चकञ्चुक, वासना, अनात्म पदार्थ, इन्द्रिय, उनके विषय, माया एवं अज्ञान एवं तज्जन्य बन्धन किसी अज्ञ प्राणी को तो भयभीत कर सकते हैं किन्तु किसी स्वरूपावस्थित योगी का क्या बिगाड़ सकते हैं? जैसे सूर्य ही जल के मध्य प्रतिबिम्ब के रूप में उल्टा भासित होता है उसी प्रकार परिमित विषय वाली बुद्धि ही 'मैं बद्ध हूँ, मैं मुक्त हूँ'—आदि आकारों में परिणत होती रहती है—इससे चिदात्मा का—मेरा क्या बनता-बिगड़ता है?— 'प्रतिबिम्बमिदं बुद्धेर्जलेष्विव विवस्वतः ।'¹ बन्धनोपहित चेतना 'जीव' कहलाती है तथा बन्धनमुक्त 'शिव' कहलाती है, पहला 'पशु' कहलाता है दूसरा 'पशुपति' (पति) कहलाता है। दोनों में मूलतः भेद नहीं है— स्वांगरुपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते 'पति' । मायातो भेदिषु क्लेश कर्मादि कलुषः 'पशुः' ॥² अर्थात् ऐश्वर्यदशायां प्रमाता विश्वं शरीरतया पश्यन् 'पतिः' पुंस्त्वभावस्थायां तु रागादिक्लेशकर्मविपाकाशयैः परीतः 'पशु' ।³ जो समस्त विश्व को अपने शरीर के रूप में देखकर उसे अपने से अभिन्न मानता है उसे 'पति' एवं जो उसे अपने से भिन्न मानकर माया द्वारा भेददृष्टि के कारण रागादिक्लेशों से कर्मविपाक के वात्याचक्र में फँस जाता है उसे 'पशु' कहा जाता है । शिवसूत्रकार की दृष्टि—शिवसूत्रकार का कथन है कि बन्धन कोई मौलिक एवं नित्य वस्तु नहीं है और न तो निरपेक्ष स्वतन्त्र सत्ता ही है प्रत्युत् यह एक स्वारोपित मिथ्या कल्पना है—अज्ञान है—मल है अज्ञता है—'ज्ञानं बन्धः' (१।२) वरदराज कहते हैं—अज्ञानमिति तत्राद्यं चैतन्यस्फाररूपिणि । आत्मन्यनात्मताज्ञानं ज्ञानं पुनरनात्मनि ॥ देहादावात्ममानित्वं द्वयमप्येतदाणवम् । मलं स्वकल्पितं स्वस्मिन्बन्धः स्वेच्छाविभाजतः ॥⁴ शङ्कराचार्य की बन्धन-दृष्टि एवं त्रिक-दृष्टि में भी भेद है । त्रिक दृष्टि में 'बन्धन' भी शिव की आत्मगोपन जन्य, स्वेच्छा-निष्पादित एवं रसात्मिकी क्रीड़ा है १. विज्ञानभैरव । २. प्रत्यभिज्ञाकारिका (उत्पलदेव) । ३. प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति । ४. शिवसूत्रवार्तिक ।