स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 54, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि ५३ १. शब्दराशि समुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् । कलाविलुप्तविभवो गतः सन् सपशुः स्मृतः ॥१ २. स्वरूपावरण के लिए शाब्दीशक्तियाँ उत्तरदायी हैं— 'स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिता' ३. 'क्रियाशक्ति' ही अज्ञात होने की दशा में बंधन का कारण है किन्तु ज्ञात होने पर सिद्धियाँ प्रदान करती हैं— 'सेयं क्रियात्मिकाशक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी । बंधयित्री स्वमार्गस्था ज्ञाता सिद्ध्युपपादिका ॥२ आत्मा पर चढ़े हुए पञ्चावरण एवं वाग्योग— अन्नमयकोश । 'स्पन्दकारिका' प्राणमय कोश । में 'शब्दराशि मनोमय कोश । समुत्थस्य...पशुः विज्ञानमय कोश । स्मृतः' (४५. वि०स्पन्द) आनन्दमय कोश । कहकर शब्द को मल एवं पशुत्व का कारण माना गया है । आत्मा (५ चहर-दीवारो की कारा में बन्द बद्धात्मा) । (१) अ० कोश की शुद्धि—आसन । तप । प्राणायाम । तत्त्वशुद्धि । (२) प्रा० कोश की शुद्धि—बंध । मुद्रा । प्राणायाम । (३) मनो० कोश की शुद्धि—जप । त्राटक । तन्मात्रा साधना । ध्यान । (४) वि० कोश की शुद्धि—सोऽहं की साधना, स्वर संयम, ग्रंथिभेद आत्मानुभूति । (५) आ० कोश की शुद्धि—नाद-साधना, बिन्दु-साधना, कला । प्रकाशांशरूपरौद्री + विमर्शांशरूप क्रिया का योग—'बैखरीवाक्' = 'रौद्रीशक्ति' ।। 'परावाक्' = चित्शक्ति ।—(पदार्थदर्श) । बैखरी वाक्-विखर (शरीर)— अर्थात् शरीरोद्भवा, शरीरेन्द्रियपर्यन्त चेष्टासंवादिका वाणी बैखरी है—'विखरः शरीरं तत्र भवा तत्पर्यन्तचेष्टासंपादिका इत्यर्थः ।। (ई०प्र०वि०वि० १।५) १.-२. स्पन्दकारिका ।