भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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परिचय एवं पृष्ठभूमि ६१ मपि संकोचं गुणीकृत्य चित्प्राधान्येन स्फुरति कदाचित् संकोचप्रधानतया । चित्प्राधान्य- पक्षे सहजे प्रकाशमात्रप्रधानत्वे विज्ञानाफलता प्रकाशपरामर्शप्रधानत्वे तु विद्याप्रमातृता ।' भगवती चिति के दो रूप—(१) चित्प्राधान्य, (२) संकोचप्राधान्य । भगवती चिति $\rightarrow$ चित्प्राधान्य $\rightarrow$ विज्ञानाकल (प्रकाशप्रधान) । $\quad\quad\quad\quad\quad\downarrow$ प्रकाश-विमर्श $\rightarrow$ दोनों का प्राधान्य $\rightarrow$ विद्या तत्त्वाश्रित प्रमातृता । —प्रत्यभिज्ञाहृदयम् । (१) 'पदार्थदर्श' (आगमानुष्ठान) के अनुसार—मूलवाक् चितिशक्ति है— 'चिच्छक्तिरेव पराख्या चैतन्याभासविशिष्टतया प्रकाशिकामाया निष्पन्दा परावागि- त्यर्थः ॥' (२) लक्ष्मीधरी टीका (सौ०ल०) के अनुसार—गुणत्रय की साम्यावस्था 'परा' है और उसकी वैषम्यावस्था 'पश्यन्ती' है—'एकापरेति सत्वरजस्तमोगुणसाम्यरूपो तदन्या पश्यन्ती अन्यतरगुणवैषम्यरूपो' । विश्लेषण—सांख्य की स्थूल प्रकृति को जो कि जड़ है उसे चैतन्यघन एवं शिव की चिदानन्दस्वरूपा 'परावाक्' कहना समीचीन नहीं है । इच्छा, ज्ञान, क्रिया आदि पारमात्मिक शक्तियाँ संकुचित होकर सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण बन जाती हैं— 'स्वाङ्गरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या । मायातीये ते एव पशोः सत्वं रजस्तमः ॥ ('ईश्वरप्रत्यभिज्ञा') । सांख्य की प्रकृति अशुद्ध है । शुद्ध प्रकृति में इच्छादिक शक्तियाँ स्थित रहती हैं किन्तु सांख्य की प्रकृति में नहीं । योगसूत्र के व्यासभाष्य में तो कहा गया है कि गुणों का परमरूप कभी दृष्टिगत नहीं होता । दृष्टिगत रूप माया की भाँति तुच्छ होता है— 'गुणानां परमं रूपं न दृष्टिपथमृच्छति । यतु दृष्टिपथं प्राप्तं तन्मायेव सुतुच्छकम् ॥' मूल महाप्रकृति 'परावाक्' के निकट अवश्य है । परमेश्वर की सृजन-प्रक्रिया में अन्यनिरपेक्षता ही 'प्रतिभा' एवं 'परावाक्' है— यही 'प्रतिभा देवी' है । यही चित्स्वरूपा, स्वरसोदिता 'परावाक्' है । शब्द की चरमावस्था ही 'परावाक्' है । 'मध्यमा' $\rightarrow$ ┌ स्थूल मध्यमा │ 'तन्त्रालोक' (३ आ०) ॥ │ सूक्ष्म मध्यमा │ 'पश्यन्ती' $\rightarrow$ ┌ स्थूल प० └ पर मध्यमा │ (इच्छा शक्ति का रूप │ सूक्ष्म प० └ = पश्यन्ती) └ पर प० व्याकरणागम—वाणी के मात्र ३ रूप हैं— (१) अनादिनिधन शब्दब्रह्म 'पश्यन्ती'—सोमानन्दपाद में 'शब्दपरब्रह्माद्वयवाद' का खण्डन करके 'ईश्वराद्वयवाद' का मण्डन किया है ।

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