भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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६० स्पन्दकारिका शिव ┌─────────────────┴─────────────────┐ प्रकाशांश (चिद्भाव) ────────────────── विमर्शांश (आनन्दभाव) │ सामरस्य → वाक चतुष्टय (१) अम्बिका + शान्ता → ‘परावाक्’ । (२) वामा + इच्छाशक्ति — पश्यन्तीवाक् । (३) ज्येष्ठा + ज्ञानशक्ति → मध्यमावाक् । (४) रौद्री + क्रियाशक्ति → बैखरी वाक् । सृष्टि सृष्टि ब्रह्म ┌────┴────┐ ┌────┴────┐ ┌────┴────┐ नाद सृष्टि बिन्दु सृष्टि शाब्दी सृष्टि आर्थी सृष्टि पर ब्रह्म शब्द ब्रह्म (‘शब्दब्रह्मणि निष्णातः परंब्रह्माधिगच्छति ॥’) ॥ ‘जगत’ = शब्द का विवर्त है— ‘विवर्ततेऽर्थभावेन जगतः प्रक्रिया यथा’ । (१) इच्छाशक्ति → का पश्यन्ती वाक् के रूप में रूपान्तरण । (२) ज्ञानशक्ति → का ज्येष्ठा वाक् के रूप में रूपान्तरण । (३) मध्यमावाक् → का ऋजु रेखा के रूप में रूपान्तरण । (४) क्रिया शक्ति → का रौद्री के रूप में रूपान्तरण । (५) बैखरीवाक् → का विश्वविग्रह (विश्ववपु के रूप में रूपान्तरण) (‘परमाकला’ द्वारा परमशिव की सिसृक्षात्मिका स्फुरणा-दिदृक्षा सम्बंधी औत्सुक्य → ‘अम्बिका’ का रूप धारण करना और उसी रूप में ‘परावाक्’ का अभिधान प्राप्त करना) । पशुपति की शक्तियाँ— ‘ज्ञान’ ‘क्रिया’ ‘माया’ स्वातंत्र्यात्मा चिति पशु की स्थिति में ↓ ↓ ↓ शक्ति का रूपान्तरण सत्वगुण रजोगुण तमोगुण ↓ गुणत्रयात्मक ‘चित्त’ ‘स्वातंत्र्यात्मा चितिशक्तिरेव ज्ञानक्रियामायाशक्तिरूपा पशुदशायां संकोचप्रकर्षात् सत्वरजस्तमःस्वभावचित्तात्मतया स्फुरति’ । ‘स्वांगरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या । माया तृतीये ते एव पशोः सत्वं रजस्तमः ॥ (प्रत्य० हृदयम्) ‘चित्त’ = भगवती । ‘न चित्तं नाम अन्यत्किंचित् अपितु सैव भगवती तत् । तथा हि सा स्वं स्वरूपं गोपयित्वा यदा संकोचं गृह्णाति तदा द्वयी गतिः, कदाचित् उल्लसित-

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